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12.14.2018


हिंदी की महिला कहानीकारों की मानवीय संवेदना

‘संवेदना’ शब्द-साहित्य और मनोविज्ञान में भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। साहित्य में संवेदना का प्रयोग साधारणत: मन:स्थितियों, भावों अर्थात प्रेम, घृणा, दुःख, क्रोध, हास्य, व्यंग्य तथा सहानुभूति आदि के लिए होता है। मनोविज्ञान में संवेदना से अभिप्राय “मानव के जीवन अनुभवों एवं मनुष्य के भावों का उद्वेग से है, उत्तेजना से है, जिसे हमारी ज्ञानेंद्रियाँ ग्रहण करती हैं। मनोविज्ञान के क्षेत्र में साहित्य में प्रयुक्त होने वाली संवेदना के समानार्थक शब्द संवेग और भावना शब्द है। भावना क्षणिक होती है, क्योंकि मानवीय ‘संवेदना’ तथा ‘अनुभूति’ की एक सूक्ष्म प्रक्रिया है। कथाकार जिन सामाजिक परिस्थितियों में रहता है, उनका प्रभाव उसके संवेदनशील मन होकर कथाकार की संवेदना को प्रेरित करता है। कहानीकार के मन-मस्तिष्क में जो संवेदना उत्पन्न होती है, वे उस भावना को समझते हैं, क्योंकि मस्तिष्क में जो कुछ भी चलता है, उसके भावावेगमय प्रदर्शन को ही भावना कहते हैं”1 साहित्यकार अपनी भावभिव्यक्ति से दुःख-सुख का अहसास तो करवाता ही है, किसी की पीड़ा को देखकर उसके दुखी होने का भाव ही संवेदना को व्यक्त करता है।

मनोविज्ञान कोश में संवेदना का अर्थ- ‘भावना एवं अनुभूति’ से है। इस संदर्भ में गैरेट ने कहा है कि “संवेदनाएँ भावनाओं और अनुभूतियों से इस रूप में भिन्न हैं कि ये परस्पर अधिक तीव्रता से बदलती रहती हैं, जबकि भावना सुख से दुखित होकर दुखजन्य भाव में बदलती है। संवेदनाओं के विपरीत अधिकांश भावनाएँ संपूर्ण शरीरतंत्र को प्रभावित करती हैं और सिर्फ़ दुर्लभ रूप में ही एवं इंद्रियाँ तक सीमित रहती है।”2 इस प्रकार मनोविज्ञान में संवेदना और मन:स्थितियों, इंद्रियज्ञान और ऐन्द्रिय अनुभूतियों का भावबोध होता है।

मनोविज्ञान एवं साहित्य में ‘संवेदना’ शब्द के मूल अर्थों को स्पष्ट करते हुए डॉ. नगेंद्र ने कहा है- “संवेदना का अर्थ है ज्ञानेंद्रियों द्वारा प्राप्त अनुभव तथा ज्ञान, किंतु आज समांतर शब्द का प्रयोग सहानुभूति के अर्थ में होने लगता है, किंतु मनोविज्ञान में अब भी इस शब्द का प्रयोग सहानुभूति मूल अर्थ में होता है। इस अर्थ में यह किसी बाह्य उत्तेजना के प्रति शरीर यंत्र की सर्वप्रथम सचेतन प्रतिक्रिया होती है, इसी के फलस्वरूप हम अपने परिवेश के संबंध में ज्ञान प्राप्त करते हैं। संवेदना के लिए किसी-न-किसी उत्तेजक की आवश्यकता होती है, और उसके संबंधित गुण ही हममें संवेदना को जगाते हैं, इस दृष्टि से अनुभूति एवं भाव प्रणव व्यक्ति की संवेदना अधिक जागृत होती है। एक साधारण-सी घटना, जिसकी और सामान्य व्यक्ति का ध्यान भी आकर्षित न हो, संवेदनशील व्यक्ति के मन में भावनाओं को उत्पन्न कर सकती है। इस प्रकार साहित्यिक संदर्भ में संवेदनशीलता मन की प्रतिक्रिया की शक्ति ही है, जिसके द्वारा संवेदनशील व्यक्ति दूसरे किसी व्यक्ति के सुख-दुख को समझकर तादात्म्य कर लेता है।”3

माननीय संवेदना से हमारा तात्पर्य – विस्तार, गहराई और सघनता से है। कहानीकार अपनी संवेदना को समयानुसार ढाल उसे नए रूप में प्रस्तुत करता है। कहानीकार अज्ञेय ने मानवीय संवेदना के विषय में अपना मत देते हुए कहा है- “मानव समाज, केवल किसी एक युग का समाज नहीं है। देशकाल की रंगत लाने वाले लोकाचारों-व्यवहारों-मुहावरों यहाँ तक कि संबंधों में विषयगत या बाहरी यथार्थ में सभी उपकरणों के नीचे, पर गहरे में मानव-समाज, की एक दूसरी पहचान मिल सकती है।”4 मानवीय संवेदना युगनुरूप बदलती रहती है। मानव समाज, परिस्थिति के अनुरूप उसके भाव बदलते रहते हैं।

हिंदी कथा-साहित्य में कहानीकारों ने मानवीय संवेदना को अपनी कहानियों में विविध रूपों में उभारने का प्रयास किया है। इन महिला कथाकारों ने अपनी कहानियों में मध्यवर्गीय जीवन के अच्छे-बुरे अनुभवों को पारिवारिक विसंगति, प्रेम, संबंध, निर्भीकता, तनाव, निराशा, द्वंदव, संत्रास और स्पष्टवादिता परिवेश के प्रति संघर्ष करते पात्रों की मानवीय संवेदना के भावों और पीड़ा को उकेरा गया है।

आज रिश्तों में प्रेम, सद्‌भाव की जगह स्वार्थ और छल कपट ने ले ली है। किसी भी रिश्ते को समझने, पाने के लिए नहीं अपितु अपने निजी या भविष्य में क्या इसका अर्थ सार्थक होगा, उस पर विचार किया जाता है। आज प्रेम शक़्ल-सूरत को न देख कर अपने हित के लिए किया जाता है। नायिका मणि ने कहानी ‘बीते हुए’ में मणि प्यार को अपने निजी स्वार्थ के लिए छोड़, बाद में पछतावा लिए घूमती-फिरती दिखाई पड़ती है- “प्रेम न उद्याम वेग है, न आत्मविस्मृति या तल्लीनता के चरण क्षण। छककर चूर नि:स्पंदन पड़ी काया के सिरहाने तकिया बढ़ाते हाथ प्रेम हैं। ठिठुरती ठंड में गर्म खाने के लिए ठिठुरती, प्रतीक्षारत निगाहें हैं प्रेम, गहन दुख के क्षणों में आँखों के झिलमिलाते आँसुओं के बीच विश्वास सी जिसकी छवि कौंध जाए.... वही इसका पात्र है।”5 प्रेम के बदलते रूप की चर्चा की है। इंद्रजीत का मणि के प्रति आकर्षण था। मणि इंद्रजीत को केवल एक मित्र के रूप में मानती है। उसके प्रेम को कभी नहीं अपनाती। इंद्रजीत का एकतरफ़ा प्रेम उसे बहुत सालता है। मणि को लाइफ़ से सब कुछ बहुत परर्फ़ेक्ट चाहिए था। इंद्रजीत को अपने क़ाबिल न मानते हुए उसका प्रेम उसे वापस लौटा देती है। मणि कुछ समय बाद जब इंद्रजीत से मिलती है तो उसकी सफलता देख अपने आप को कोसती रहती है। लेखिका मधु कांकरिया ने पात्र इंद्रजीत की संवेदना को व्यक्त किया है। आधुनिक स्तर में प्रेम का महत्व ही नहीं रहा है। आज के युग में प्रेम केवल खेल बन कर रह गया है। स्वार्थ पूरा तो प्रेम ख़त्म।

कहानी ‘दो अंधेरे’ में कौशल्या की मानसिक संवेदना को व्यक्त किया गया है। कौशल्या मध्यवर्गीय परिवार से है। पति और परिवार तक सीमित कौशल्या का जीवन जब अभिशाप बन जाता है। पति दिनेश कौशल्या के साथ-साथ अन्य स्त्री के प्रेमपाश में अपना जीवन बिता रहा है। कौशल्या को जब इस बात का आभास होता है, तो वह अपने आप को असुरक्षित महसूस कर अपनी पीड़ा को अभिव्यक्त करते हुए कहती है – “तुमने मेरा विश्वास तोड़ दिया दिनेश, तुमने मुझे छला! क्या मैंने तुम्हें प्यार नहीं दिया, क्या मैंने तुम्हें अपना शरीर नहीं दिया? मैं कष्टों में भी मुस्कुराती रही, थोड़े में ही संतुष्ट रही, उसका बदला तुमने मुझे इस प्रकार दिया।”6 स्त्री पति को ही अपनी पूरी दुनिया मान बैठती है। पति ही उसका आत्मविश्वास चकनाचूर कर दे तो, वह कहाँ जाए। कौशल्या दिनेश के साथ अपना जीवन नहीं बिता सकती। प्रेम जब घुटन में परिवर्तित हो जाए तो संबंध-विच्छेद करना ही उचित होता है।

‘औरत जात’ कहानी में नारी की कुंठा को अभिव्यक्त किया गया है। आधुनिक युग में स्त्री और पुरुष दोनों ही जॉब करते है। पुरुष अपनी हीनता के कारण नारी को संदेह की दृष्टि से देखता है, जिसके कारण जीवन में कड़वाहट आ जाती है। राजीव अपने मित्र सक्सेना की बातों में आकर अपनी पत्नी मधु पर शक़ कर उसे अनाप–शनाप बोलता है। राजीव की दृष्टि में “जो औरत घर से बाहर जाती है और नौकरी करती है, उसका इस-उससे मिलना भी होता है। नौकरी के कुछ अपने दबाब भी होते है। दफ़्तर की अपनी एक व्यवस्था होती है। वहाँ एक बॉस भी होता है। उसकी भी कुछ माँगें होती है। फिर हर किसी को प्रमोशन भी चाहिए और भी कितनी छोटी-बड़ी बातें होती हैं जो बॉस की मरज़ी के बिना नहीं होती। बॉस की मरज़ी का ध्यान तो रखना ही पड़ता है। उसे ख़ुश भी रखना होता है। अब बॉस कैसे ख़ुश होगा? फिर अगर सामने कोई ख़ूबसूरत युवा औरत हो तो?”7 राजीव अपनी पत्नी मधु से बहुत प्रेम करता है। दोस्तों को कहने पर अपनी पत्नी के बारे में ग़लत सोचता है। राजीव की शारीरिक एवं मानसिक वेदना को व्यक्त किया गया है। आज व्यक्ति दोहरा जीवन जी रहा है। स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के संबंध के सहारे ही अपना पूरा जीवन नहीं जी सकते। संबंधों के प्रति लोगों का हर पल नज़रिया बदल रहा है। व्यक्ति को जहाँ ख़ुशी मिल रही है। वह उसी का होकर रहे जाता है। कहानी ‘यह सच है’ मैं नायिका दीपा एक रिश्ते में बँध अपना पूरा जीवन नहीं जी सकती। दीपा को अपने पहले प्रेम से वो ख़ुशी नहीं मिली। संजय के प्रति दीपा का बढ़ता आकर्षण उसे उसकी और हर पल धकेल रहा है। दीपा ने अपने आपको समाज और परिवार की बेड़ियों से दूर कर रखा है। दीपा अपने अनुसार जीवन जीना चाहती है। मन में कोई निराशा यह पछतावा ले रोना नहीं चाहती और कहती है- “जानते हो, विवाह से पहले कोई लड़की किसी को इन सबका अधिकार नहीं देती। पर मैंने दिया इसलिए नहीं कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ, बहुत-बहुत प्यार करती हूँ विश्वास करो संजय, तुम्हारा, मेरा प्यार ही सच है। निशीय का प्यार तो मात्र छल था, भ्रम था, झूठ था।”8 दीपा अपने पहले प्रेम से संतुष्ट न हो कर अपने दूसरे प्रेमी के प्रति अपनी निष्ठा को व्यक्त करते हुए दिखाई देती है। दीपा निशीय के प्रति व्याकुलता और संवेदना व्यक्त करते हुए अपनी पीड़ा के क्रम को रखती है। निशीय का प्रेम केवल उसे छलावा ही लगता है।

संबंधों में बोझिलपन आने से रिश्तों का रूप ही बदल गया है। मध्यवर्गीय परिवार में व्यक्ति केवल अपने बारे में ही सोचता-विचारता रहता है। परिवार का अर्थ ही बदल गया है। परिवार जहाँ एकता का प्रतीक माना जाता था। अब हिस्सों में बँटकर रह गया है। परिवार का हर कोई सदस्य अपने हित से संबंधित कार्य करता है। परिवार की किसी को आवश्यकता नहीं रह गई है। पति-पत्नी के संबंध में भी दोहरी मानसिकता की विसंगति आ गई है। सब के सब अपना-अपना ही रट लगाए हुए है। लेखिका मालती जोशी ने पत्नी की दयनीय स्थिति का चित्रण किया है। पति के चले जाने के बाद घर-गृहस्थी का बोझ उठाते हुए वह टूट-सी गई है। कहानी ‘सती’ में पति के मरने के बाद घर-बाहर दोनों तरह से औरत का मरना हो जाता है। बाहर तो फिर भी औरत को कम सुनाया जाता है लेकिन घर वाले उसे तिल-तिल मरने के लिए मजबूर कर देते है। लेखिका मालती जोशी ने विधवा नायिका कांता की वेदना को व्यक्त किया है “आदमी मर गया इसका मन नहीं मरा।”9 कांता की सास उस पर दिन-रात अपशकुनी होने का ताना दे प्रताड़ित कर ही रहती है। कांता इस पीड़ा को झेल-झेल कर अधमरी सी गई है। घर-परिवार अब उसके रास्ते का रोड़ा बनते जा रहे है। पति क्या गया जीने की सारी अभिलाषाएँ और उम्मीद भी ले गया। कांता अपनी बेबसी के आगे रोती हुई कहती है- “सच कहती हूँ अगर इन बच्चों का साथ न होता तो मैं कुएँ में कूद जाती। जो लोग औरत को ज़िंदा जला देते हैं, उनको तो सरकार सज़ा देती है, पर जो लोग उसे ज़िंदगी भर जलाते रहते हैं, उनके ख़िलाफ़ क्यों को कोई क़ानून नहीं बनता?”10 स्त्री की दारूण स्थिति का अंकन किया गया है।

आधुनिक युग में स्त्री-पुरुष जहाँ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं, वहीं अपनी अपनी ज़िम्मेदारियों को एक दूसरे पर भी थोप रहे है। स्त्री-पुरुष आज के समय में दोनों ही नौकरी कर रहे है, जब-तक ज़िम्मेवारी नहीं है तब-तक जीवन सुख में बीत रहा है। घर-परिवार की ज़िम्मेदारी बढ़ते ही दोनों एक-दूसरे पर झल्लाने लगते है। कहानी ‘इशताता’ में लेखिका सूर्यबाला ने इसी समस्या को दिखाया है। नायिका मीना और रौनक ने एक-दूसरे को पसंद करके ही शादी की थी। मीना और रौनक की बेटी की ज़िम्मेवारी जैसे ही पड़ी वैसे ही घर-परिवार में कलह होने लगे। रौनक केवल बाहर की ही ज़िम्मेदारियों को निभाता। घर-परिवार को केवल मीना ने ही संभाल रखा था। मीणा भी घर-बाहर की ज़िम्मेदारियों को पूरा करते-करते सी थक गई थी। मीना और रौनक एक-दूसरे से बात कम लड़ाई ज़्यादा करते थे। मीना रौनक से तंग आकर अपने मन की वेदना को व्यक्त करते हुए कहती है- “शादी के बाद से अब तक अपना किया ही तो भुगत रही हूँ।”11 मीना कहीं ना कहीं अपने जल्द में लिए निर्णयों से दुखी थी। मीना नौकरी, परिवार, बाहर एवं बेटी की ज़िम्मेदारियों को पूरा करते-करते परेशान हो गई थी। रौनक उसकी किसी बात पर ध्यान नहीं देता था। परिवार में प्यार की जगह कड़वाहट और रोष उत्पन्न होने लगा थी। रौनक कहीं भी मीना की सहायता करने को तैयार नहीं था। घर के काम करने की बात आती तो रौनक के पास बहानों की कमी नहीं थी- “मेरे ऑफिस की इमरजेंसी, मीटिंग, वर्कशॉप आदि के नाम पर झूठ-सच बोल कर अपना पिंड छुड़ाकर मुझे आगे कर देते हो।”12 मीना रौनक के व्यवहार से दुखी हो जाती है। मीना दिन-रात समस्याओं जूझते रहने के कारण अपने आप को कोसती रहती है। लेखिका सूर्यबाला ने स्त्री-पुरुष दोनों के संबंधों में कड़वाहट की वेदना को प्रस्तुत किया है। काम-काजी महिलाओं के जीवन आयी समस्याओं को दिखाया गया है। कहानी ‘क्षय’ में आर्थिक समस्या से पीड़ित नायिका कुंती की वेदना को प्रकट किया गया है। घर में बड़ी होने के कारण पूरे परिवार की देखभाल कर रही है। पिता, भाई और परिवार के लिए दिन-रात अपने आपको झोंक रही है। पिता का गिरता स्वास्थ्य और भाई की पढ़ाई का बोझ झेलते-झेलते टूट सी गई है। कुंती की अपनी ज़िंदगी शुरू होने से पहले ही ख़त्म सी हो गई है- “उसके बराबर की और लड़कियाँ कितनी मौज करती हैं। घूमना-फिरना, सैर-सपाटे, हँसी-मज़ाक... उसके जीवन में तो यह दूर-दूर तक भी नहीं हैं।...क्या कभी भी नहीं होगा? क्या उसका सारा जीवन यूँ ही निकल जाएगा? जितना रुपया वह कमाती है, उसमें कितने ठाट से रह सकती हैं। पर वह तो जानती ही नहीं कि ठाट क्या होता है, मौज क्या होती है।”13 कुंती को अपना जीवन बोझ लगने लगता है। परिवार की आर्थिक-व्यवस्था को ठीक करते-करते अपनी इच्छाओं का गला घोंट रही है। जीवन जीने के प्रति उसकी इच्छा ख़त्म-सी हो गई है। लेखिका मनु भंडारी ने कुंती की समस्या को चित्रित किया है। आर्थिक तंगी के कारण बढ़ती परेशानियों को दिखाया गया है।

समाज में बढ़ती बेरोज़गारी के कारण युवा परेशान हो रहे है। समझ में नहीं आ रहा है कि जीवन कौन-सी दिशा में जा रहा है। युवा पीढ़ी अपने को ग़लत कार्यों में अपना जीवन ख़त्म करती जा रही है। कहानी ‘चांदनी के फल’ में लेखिका नमिता सिंह ने युवक-युवती की बढ़ती समस्याओं का चित्रण कर उनकी पीड़ित संवेदना को दिखाया है। नौकरी न मिलने के कारण युवा पीढ़ी अपने आप को नष्ट करने पर आमादा होती जा रही है। कारण तबादला होने के कारण वह अनेक समस्याओं से जूझती हुई दिखाई देती है- “उसका मन ख़ुशी से झूम उठा। ऐसा लगा कि वह थोड़ी देर के लिए सबको भूल गई है- उसका कॉलेज, विमल भाई, वह कली गेस्ट हाउस का कॉटेज- इस अंधेरे अंजान रास्ते ने उसे ज़िंदगी का कौन-सा रहस्य समझा दिया? क्या दे दिया उसे अचानक? कौन कहता है। कि वह इधर-उधर भटक रही है- कि वह बढ़ा रही है कि वह अकेली है उसके पास अथाह भंडार है। समुद्र लहरा रहा है। उसके चारों और वह कितना कुछ कर पाती है। अपनी झोली में...।”14 ज़िंदगी से निराशा, अर्थहीनता और तनाव भरा जीवन की वेदना को व्यक्त किया है। व्यक्ति अपने कार्य के प्रति उतना सजग नहीं है, जितना दूसरे के काम को बिगाड़ने में। दो भाइयों के बीच उत्पन्न ईर्ष्या और द्वंदव को प्रकट करती लेखिका नासिरा शर्मा ने कहानी ‘विरासत’ में आगे बढ़ने की लालसा को दिखाया गया है। हिम्मतशाह और बल्लन दोनों अपने-अपने कार्य के प्रति समर्पित है। हिम्मतशाह बल्लन को उसके कार्य में हाथ बटाने के उद्देश्य से अपने साथ लेकर जाना चाहता है। बल्लन उसके साथ जाने से मना कर देता है- “फ़ायदा है... बहुत फ़ायदा है जब समझो तब ना! मैंने वहाँ किसी को नहीं बताया कि हम जात के फ़कीर हैं, पेशे से तकियादार हैं.... मैं कब्र खोदता हूँ। मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता। मैंने सबको बताया है कि मैं वाजिद अलीशाह का परपोता हूँ... शाही खानदान से हूँ।”15 व्यक्ति अपने स्तर को क़ायम रखने के लिए अपनी पहचान, कार्य सब कुछ छुपाता-फिरता है। अपने फ़ायदे के लिए दूसरे का बना बनाया व्यापार ठप करने से भी नहीं हिचकिचाता।

कहानी ‘नई नौकरी’ में लेखिका ने पारिवारिक समस्या के कारण नायिका रमा अपनी नौकरी से समझौता कर पति की मनमानियों का शिकार बनती है। पति सशक्त है तो वह पत्नी को घर की चारदीवारी में ही निहित रखना चाहता है। पत्नी का घर से बाहर निकलना उसे बेहद अखरता है। पत्नी घर के कार्य करें तो उसे बहुत अच्छा लगता है। पत्नी घर से बाहर निकलने के लिए कहती तो उसकी आत्मा भटकने लगती है। पति कुंदन रमा को घर के कार्यों में ही व्यस्त रखता है। रमा स्कूल में इतिहास की अध्यापिका है। कुंदन ने अपने नए घर के सारे कार्यों का बोझ रमा के कंधे पर ही छोड़ रखा है। रमा पति की बेपरवाही से नाराज़ है, तो है पर वह ज़्यादा कुछ नहीं कहती। कुंदन अपनी ज़्यादतियाँ लगातार उस पर थोपता जा रहा है। रमा सहज हो सब सहती है। रमा अपनी नौकरी पर इतना ध्यान नहीं दे पाती जितना देना चाहिए। रमा अपनी ज़िम्मेवारियों को पूर्ण रूप से न निभा पाने के कारण निराश हो जाती है और आक्रोश में पति कुंदन से नौकरी से इस्तीफ़ा देने के लिए कह देती है। पति ख़ुश हो जाता है। रमा को उकसाते हुए उसकी बात का समर्थन करते हुए कहता है- “छोड़ो भी यार, वैसे भी क्या रखा है एशिएँट हिस्ट्री पढ़ाने में। चोलवंश, चेदिवंश के बारे में न भी जानेंगे तो कौन-सी ज़िंदगी हराम हो जाएगी।... मेरा संतोष, तुम्हारा संतोष नहीं है, मेरी तरक्क़ी, तुम्हारी तरक्क़ी नहीं है?...”16 रमा पति के विचारों से सहमत नहीं है। पति शुरू से ही अपने अधिकार मनमाने रूप से थोपता रहता था। रमा नौकरी करती थी। अपनी अस्तिव स्थिर करने के लिए। पति की दलीलें को खारिज करते हुए अपनी अलग पहचान बनाना चाहती थी। रमा अपने अस्तित्व को बुलंदियों पर लेकर जाना चाहती थी। कुंदन अपनी महत्वाकांक्षाओं के आगे किसी की भी नहीं सुनते थे। दबाब से या छल से रमा को ऊपर उठने नहीं देना चाहता था। रमा अपने आप से ही लड़ती-झगड़ती रहती और सोचती- “रमा को लगा जैसे कुंदन उसे पीछे छोड़कर आगे निकल गया है...बहुत आगे। जैसे वह अकेली रह गई है।”17 रमा जीवन के उस पड़ाव पर अपने आपको स्थिर नहीं कर पा रही है। वेदना और छटपटाहट के कारण संबंधों में असंतोष की भावना उत्पन्न हो गई है। रिश्तों में आर्थिक तंगी के कारण परिवार का साथ छुटता चला जा रहा है। परिवार का अर्थ ही बदल गया है। परिवार का हर सदस्य केवल अपने बारे में सोचने लगा है। माता-पिता के लिए उनके पास न तो समय है और न प्यार। केवल मजबूरियों का रोना ही रह गया है। कहानी ‘एक सार्थक एहसास’ में माता-पिता की ज़िम्मेदारी को बोझ के रूप में माना है। परिवार में ज़िम्मेवारियों को कोई नहीं उठाना चाहता है एक दूसरे पर थोपना चाहते है। बड़ा भाई अपनी आर्थिक व्यवस्था के कारण पिता को साथ नहीं रखना चाहता है। छोटा भाई अपनी समस्याओं का वास्ता दे पिता को अपने साथ न रखने की पीड़ा को व्यक्त करते हुए कहता है – “दादा मेरा ढाई कमरे का मकान है। दोनों को लेकर कहाँ रहूँगा बताओ? कहाँ तो तीन-चार सौ रुपये महीना दवा-दारू का भेज सकता हूँ।”18 संबंधों में आत्मीयता ख़त्म होती जा रही है। पिता को कोई भी नहीं रखना चाहता। बच्चों के पास अपने परिवार को पालने की क्षमता तो है पर पिता को साथ रखना मुश्किल है। माता-पिता के प्रति कर्तव्य अब बोझ लगने लगा है। लेखिका ने माता-पिता की संवेदनाओं को आहत होते दिखाया है।

आधुनिक युग में व्यस्तता बढ़ जाने से संबंधों के प्रति ध्यान देना भूल गए है। व्यक्ति आत्मसुख की ओर ज़्यादा ध्यान देने लगे है। जिससे मानवीय संबंधों में बदलाव आ गया है। संबंधों में बदलाव के कारण संवेदना में भी परिवर्तन आने लगा है। कहानी ‘बूंद का हक’ में लेखिका मेहरून्निसा परवेज़ ने बहन-भाई के संबंधों में आयी कड़वाहट को दिखाया गया है। बहन अपने ससुराल में निरंतर परेशान होने के कारण अपने भाई के यहाँ चली आती है। भाई बहन की ज़िम्मेदारियों से दूर भागते हुए उस पर ध्यान नहीं देता। बहन के साथ अभद्र व्यवहार कर उसे कष्ट पहुँचाता रहता है। लेखिका नायिका की स्थिति को व्यक्त करते हुए कहती है- “भैया उससे बात करना तो दूर, उसके साए से भी भागने लगे थे। हमेशा घर में ग़ुस्से में आकर तोड़-फोड़ कर अपना रोष व्यक्त करते।”19 भाई अपने कर्तव्य से विमुख हो अपने स्वार्थ में ही लिप्त है। भाई-बहन के संबंधों में संवेदना के स्थान पर असंतोष की भावना आ गई है। आज के युग में मानवीय संबंध अर्थ ही पर आधारित हो गए है। वही ‘वर्दी’ कहानी में माँ की संवेदना को दिखाया गया है। माँ अपने बच्चे के लिए क्या-क्या सपने बुनती है। पति पत्नी को गुलाम बनाकर रखना चाहता है। पत्नी पति के पूछे बिना कुछ नहीं कर सकती। पति की तानाशाही इतनी बढ़ गई है कि बच्चे और पत्नी के सपने भी चूर-चूर हो गए हैं। एक दिन आशा ने अपने बेटे की इच्छा पूरी करने के लिए उसे कुछ रुपये दिए। पति रमाशंकर के डर के कारण वह सारा दोष अपने भाई पर मढ़ देती है और कहती है- “भय्या के भेजे ग्यारह रुपये थे जो मेरे पास, उसी में से मैंने दिए थे। मुझे क्या पता था यह रंग लायेगा।”20 आशा बेटे के सामने कुछ नहीं बोलती। बेटा माँ के डरने से बेटे के मन में क्रोध उत्पन्न होता जाता है। माँ को समझाता है पर माँ सब कुछ जानने के बाद भी शोषण की वेदना को सह रही है। पति के ज़रूरत से ज़्यादा सख्त होने के कारण रिश्तों में ईर्ष्या और जलन की भावना उत्पन्न हो गई है। रिश्तों में पलायन की स्थिति उत्पन्न होने से संबंध कड़वाहट उत्पन्न हो जाती है। कहानी ‘गोमा हँसती है’ में लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने नारी की वेदना को व्यक्त किया है। सुग्रीव अपनी पत्नी और बेटी को बिना बताए कहीं चला जाता है। सुग्रीव साधु का जीवन जीने लगता है। पत्नी और बेटी अकेले जीवन-यापन करती है। सुग्रीव काफी समय व्यतीत होने के बाद उसी गाँव में दोबारा शंतानंद साधु के रूप में आता है। गाँव के लोग और बेटी अपने पिता को पहचान लेते है। पत्नी पति को पहचानने से मना कर अपनी वेदना को व्यक्त करते हुए कहती है- “मंगना बेटी, तू यहाँ... घर में कितना काम फैला है। पर इस गाँव के आदमी तो बाबरे ठहरे, जो भी साधु आता है, उसे ही तेरा पिता...”21 पति-पत्नी की बेबाकी को देख हैरान हो जाता है। पति पत्नी और बेटी को निसहाय छोड़ अपने सुख के लिए साधन जुटाने के लिए चला जाता है। पत्नी बेटी की ज़िम्मेवारियों से मुँह मोड़ उन्हें संकट में छोड़ जाता है। राजनीति के चक्रव्यूह में जो एक बार फँस गया। व्यक्ति लाख प्रयास कर ले। उस दलदल से अपने आप को मुक्त नहीं कर सकता। ‘फैसला’ कहानी में रणवीर राजनेता है। गाँव के लिए झूठे आश्वासन दे अपने आप को सफल नेता मानता है। रणवीर ज़्यादा पढ़ा-लिखा नहीं है। पत्नी बसुमती उससे अधिक बुद्धिमान है। चुनाव के समय रणवीर नेता के रूप में सफल रहता है। पत्नी को गाँव का प्रधान बनाने में भी उसकी कोशिशे रंग लाती है। नाम के पत्नी को प्रधान के पद पर आसीन करता है। रणवीर सारे फ़ैसले ख़ुद ही लेता है। गाँव में जब-जब पंचायत रखी जाती है,तो बसुमती को बुलाया जाता है। परिवार में पति एवं देवर उसे वहाँ न जाने की हिदायत देते हैं। रणवीर बसुमती को बार-बार समझाने की कोशिश करते हुए कहता है- “पंचायती चबूतरे पर बैठती तुम शोभा देती हो? लाज-लिहाज मत उतारो। कुल परंपरा का ख़्याल भी नहीं रहा तुम्हें? औरत की गरिमा आड़-मर्यादा से ही है। फिर तुम क्या जानो गाँव में कैसे-कैसे धूर्त हैं।”22 रणवीर ने केवल नाम के लिए ही बसुमती को प्रधान के पद के रूप में बिठा रखा है। बसुमती को भारतीय नारी एवं परंपरा की दुहाई देते हुए क़ैद कर रखा था। बसुमती भी घर की सुख-शांति के लिए चुपचाप रहती। बसुमती कुछ कहना भी चाहती तो ख़ामोश कर दिया जाता है- “हम हैं तो सही। अब तक भी तो करते रहे हैं। तुम्हें क्या ज़रूरत है बहाने की?”23 रणवीर अपनी पत्नी बसुमती को घर की चारदीवारी तक ही सीमित रखने को कहता है। बसुमती रणवीर से ज़्यादा पढ़ी-लिखी है। रणवीर की बढ़ती तानाशाही से अब परेशान होने लगी है। गाँव की औरते लगातार अपनी परेशानियों के लिए बसुमती के पास आती हैं। बसुमती का मन व्याकुल हो उठता है। जिन औरतों ने मुझे चुनाव में जिताया था। वह अपनी समस्याएँ किसके पास लेकर जाएँ। बसुमती को गाँव की औरतें और बूढी काकी बार-बार झकझोरती हुई नज़र आती है – “हरदेई गिड़गिड़ा रही थी, कहती थी कि रणवीर भइया नहीं समझेंगे मेरी पीर। तुम औरत हो भाभी, मेरा दुख समझो, न्याय करो। पति की लाम की नौकरी है, छुट्टी अब दो साल बाद ही मिल पाएगी, पूरे सात साल निकल गए इसी तरह।”24 बसुमती का दिल दहल गया। हरदेई की बातों से। बसुमती कुछ करना चाहती है। पति और परिवार ने उसके हाथ बाँध रखे हैं। रणवीर से हरदेई की परेशानियों को बता कुछ करने की इच्छा रखती है। पति रणवीर बसुमती को अपमानित कर व्यंग्य कसता है- “सुन ले! और समझ ले अपनी औक़ात! मजबूरी में खड़ी करनी पड़ी तू! मैं दो-दो पदवी नहीं रख सकता था एक साथ। सोचा था, पत्नी से अधिक भरोसेमंद कौन...।”25 बसुमती को पति रणवीर की धूर्तता पर आक्रोश उत्पन्न हुआ। रणवीर पत्नी के साथ इतना बड़ा छल किया है। मन से सारी की सारी भावनाएँ रिसती जा रही है। पति पत्नी में विश्वास की डोर ख़त्म होती जा रही है। रणवीर अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति का साधन मुझे बनाया। बसुमती अपने आपको समझा नहीं पा रही है। गाँव की औरतें भी उसके बारे में उल्टा-सीधा बोल रही हैं। पात्र ईसुरिया अपनी वेदना को व्यक्त करते हुए कहती है- “अच्छा होता वसुमती, हम अपना वोट काठ की लठिया को दे आते, निरजीव लकड़ी को। उठाए उठती तो। बैरी पर वार तो करती। अतिचालों के विरोध में पड़ती। पर तनवीर की दुल्हन, तुम तो बड़े घर की बहू ही रहीं। पिरमुख जी की पत्नी। घूंघट में लिपटी पुतरिया-सी चलती रहीं, आँखें मूँद के।”26 बसुमती के लिए गाँव की औरतों के मन में इतना ज़हर भर गया। बसुमती की आत्मा उसे धिक्कारती रहती। पति राक्षस से कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी। बसुमती भीतर ही भीतर अपने आप को कोसती रहती है।

समग्रत: कहा जा सकता है कि इन महिला कहानीकारों ने अपनी कहानियों में मानवीय संवेदनाओं को अनेक माध्यमों से दिखाने का प्रयास किया है- कभी नारी दांपत्य जीवन में आई समस्याओं के कारण घुटन, कडवाहट, बैचनी और स्वार्थ से अपना जीवन तहस-नहस कर लेती है तो कभी आर्थिक परेशानियों के कारण अपने को दोषी मान शोषण सहती रहती है। संबंधों को संभालते-संभालते जीवन जीना ही भूल जाती है। परिवार में नारी की आशाओं-इच्छाओं के नाम पर केवल उसे हमेशा दबाया ही जाता है। कर्तव्य और आधिकार के चक्रव्यूह में उसे फँसा कर उसका शारीरिक-मानसिक शोषण किया जाता है। संवेदना का स्वरूप ही बदलते ही मानवीय संवेदनाओं का रूप ही बदल गया है। व्यक्ति जहाँ परिवार के साथ ही अपना हित समझता था अब केवल अपने लिए ही जीवन जीता है।

संदर्भ:

1. आई.ए.रिचर्ड्स-प्रिंसिपल ऑफ़ लिट्रेरी क्रिटिसज़्म, पृ.१०१
2. हेनरी ई.गैरट-जनरल साइकोलोजी,पृ.१७३
3. डॉ. नगेन्द्र-मानविकी पारिभाषिक कोश [साहित्य-खंड],पृ.१२४
4. अज्ञेय- मेरी प्रिय कहानियाँ, पृ.१०
5. मधु कंकरियाँ- बीतते हुए,पृ.७५
6. उषा प्रियवंदा- दो अँधेरे,पृ.७७
7. कमल कुमार –औरत जात,पृ.४९
8. मालती जोशी – सती, पृ.११
9. वही,पृ.१३
10. सूर्यबाला-माइ नेम इशताता,पृ.२
11. वही-पृ.२
12. मन्नू भंडारी –क्षय,पृ.२०
13. नमिता सिंह-चाँदनी के फल,पृ.५२
14. नासिरा शर्मा-विरासत,पृ.७६
15. मन्नू भंडारी –नई नौकरी,पृ.३६३
16. वही-पृ.३५८
17. मालती जोशी –एक सार्थक अहसास –पृ.५०
18. मेहरुन्निसा परवेज- बूंद का हक,पृ.१२९
19. ममता कालिया –वर्दी.पृ.१२५
20. मैत्रेयी पुष्पा- गोमा हंसती है-पृ.६४
21. मैत्रेयी पुष्पा –फैसला,पृ.१७
22. वही, पृ.१७
23. वही, पृ.२०
24. वही, पृ.२०
25. वही, पृ.२१
26. वही, पृ.२१


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