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ISSN 2292-9754

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02.05.2018


ऋतुराज बसंत

काश कोई वक़्त का पहिया थमा देता
तो ऋतुराज बसंत अलविदा ना होता

कोकिलों की कुहुक, भ्रमरों की गुंजार
आमों की मंजरियाँ, टेसुओं की बहार
धरती का यौवन कभी कम ना होता
काश कोई वक़्त का पहिया थमा देता
तो ऋतुराज बसंत अलविदा ना होता

नव पल्ल्व, नव उमंग, नव जीवन,
स्फूर्ति, जोश, मादकता से भरा मन
प्रीत और मनुहार कभी ख़त्म ना होता
काश कोई वक़्त का पहिया थमा देता
तो ऋतुराज बसंत अलविदा ना होता

कोमल कोंपलें और सुगन्धित हवाएँ,
ओढ़ी पिली चुनरियाँ मन को बहकायें
फागुन का रंग कभी मद्धम ना होता
काश कोई वक़्त का पहिया थमा देता
तो ऋतुराज बसंत अलविदा ना होता


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