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03.02.2008
 

दुखिया सब संसार
डॉ. राजेश कुमार


संत कबीरदास ने कहा है कि सारा संसार सुखी है, क्योंकि वह खाता है और सोता है जबकि वे खुद दुखी हैं, क्योंकि वे जागते और रोते हैं। इतने सालों तक तो किसी को पता नहीं चल पाया कि वे क्यों जागते थे और अगर जागते भी थे, तो गनीमत थी, लेकिन रोते भला क्यों थे? अलग-अलग आलोचकों, विद्वानों, टीकाकारों आदि ने इस बारे में भिन्न-भिन्न मत व्यक्त किए हैं, क्योंकि ऐसा ही किए जाने की परंपरा है। कुछ लोगों का कहना है कि वे लोगों की पीड़ा को लेकर जागते और रोते थे, उधर कुछ रहस्यवादियों ने खोज निकाला है कि वे अपने आराध्य से बिछुड़ने के गम मे जागने-रोने का काय-क्रम संपन्न करते थे, वगैरह-वगैरह। लेकिन मुझे अभी पिछले दिनों सत्य का बोध हुआ, जब हमारे यहाँ विभागीय पदोन्नित समिति (जिसे राष्ट्रभाषा अंग्रेजी में डी.पी.सी. के नाम से जाना जाता है) की बैठक हुई। मुझे आशा थी कि मुझे भी पदोन्नित मिल जाएगी, लेकिन वह चेयरमेन के चहेते चापलूस चाटुकारों (अनुप्रास की छटा का आनंद लीजिए) को समय-पूर्व पदोन्नित देकर और मुझे ठेंगा दिखाकर चली गई।

ऐसा नहीं है कि मैं बहुत आत्मसम्मानी हूँ और चापलूसी आदि कर्मों से दूर रहता हूँ, पर मात्रा और गुणवत्ता में उनकी चापलूसी मेरी चापलूसी से उत्तम कोटि की रही और वे बाजी मार ले गए और मैं हाथ मलता रह गया। उदाहरण के लिए, मुझे बाद में पता चला कि जिनकी तरक्की हुई, वे रोज अध्यक्ष महोदय की धर्म की पत्नी के चरणों में सिजदे के लिए जाते रहे, जबकि मैं फोन से ही उनका हालचाल पूछ लेता था। वे अध्यक्ष महोदय की पुत्री के विवाह में बर्तन धोते रहे, जबकि मैं लोगों में ठंडे-गरम पेय की ट्रे ही घुमाता रह गया, वगैरह-वगैरह। तो इन्हीं कमियों से मैं चूक गया और वे बाजी ले गए। अब चाहे कारण जो भी रहे हों, लेकिन मुझे इसका बहुत दुख हुआ। मुझे रातों को नींद आना बंद हो गया और मैं चद्दर में मुँह छिपाकर रोता रहता। इसी बीच मुझे इलहाम हुआ कि संत कबीर के जागने और रोने का कारण भी यही रहा होगा। इससे बड़ा भला और क्या कारण हो सकता है! वे संत थे और तरक्की लेकर महासंत जैसा कोई पद पाना चाहते होंगे। डी.पी.सी. बैठी होगी और वाजिब कारणों से(?) महासंत की पदोन्नित उनके बजाय मीराबाई को मिल गई होगी। इसलिए वे जागते और रोते थे:

सुखिया सब संसार, खावै और सोवै।

दुखिया दास कबीर जागै और रोवै।।

 

अब जो हुआ, सो हुआ, यह सोचकर मैंने तय किया कि उन लोगों को तो बधाई देनी ही चाहिए, जिनकी तरक्की हुई है। कहीं ऐसा न हो कि वे मेरे मन की ईर्ष्या को भाँप लें और खामखां उनकी खुशी दुगुनी हो जो। सो मैं चेहरे पर नकली खुशी का नकाब ओढ़े लोगों के पास गया।

सबसे पहले मैं अपनी महिला सहयोगी के पास गया। दरअसल, अन्य मामलों में चाहे जो भी हो स्थिति हो, तरक्की के मामले में महिलाओं के साथ पुरुषों की कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। सुधी पाठकों को (और पाठिकाओं को भी) यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि अन्य बातें समान होते हुए भी, अन्य बातें असमान होने के कारण तरक्की के मामले में महिलाएँ पुरुषों से बाजी मार ले जाती हैं। और उनको भी दोष क्या दिया जो, इसका कारण भी अपना पुरुष वर्ग ही है। इसे आप चाहें, तो महिलाओं का सशक्तिकरण कह सकते हैं।

मैं जब उनके कमरे में दाखिल हुआ, तो उनकी रूप-छटा बिल्कुल बदली हुई थी। न तो नख-शिख ही मेक-अप से चाक-चौबंद था और न वस्त्र ही शरीर को भड़काऊ ढंग से प्रस्तुत करने की दृष्टि से पहने गए थे। चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं और केश-राशि बिखरी हुई थी। ऐसा प्रतीत होता था, मानो वे किसी मातम में आई हैं (यह उपमा भी शायद ठीक न बैठे, क्योंकि अब तो मातम में भी मेक-अप और साड़ी-गहनों की चर्चा की अनुमति शास्त्रों ने दे दी है)। मैं बधाई देना तो भूल गया, पूछ बैठा, “मैडम, सब ख़ैरियत तो है? परिवार में सब राजी-खुशी तो है?”

उसने सूनी आँखें मेरी ओर उठाईं और काफी देर तक मुझे पहचानने की कोशिश करने के बाद जाने सफल होने या असफल होने पर फीकी-सी मुस्कान मेरे सामने फेंककर बोली, “हाँ, ठीक ही है। आप कैसे हैं?”

मैं तो जैसा हो सकता था, वैसा ही हूँ। पर आपने यह क्या हाल बना रखा है? मैं तो आपको पदोन्नित के लिए बधाई देने आया था और सोच रहा था कि आपसे कुछ मिठाई वगैरह खाई जाए।

हैं, कैसी पदोन्नित! उसने मायूसी से कहा, मानो सब कुछ लुटाकर बैठी हो, “पहले तो कुछ काम-वाम था नहीं, बस एक-आध चिट्ठी टाइप करो, बॉस से बतियाओ और घर जाने की तैयारी करो। लेकिन अब तो इतना काम आ गया है कि सिर उठाने की फुर्सत भी नहीं मिलती। पहले तो बॉस के पास घड़ी-घड़ी जाने का मौका मिलता रहता था, पर अब तो बहाने खोजने पड़ते हैं। और वो मरी जो मेरी सीट पर जा बैठी है, वो तो पूछने से पहले ही कह देती है कि बॉस कह रहे हैं कि बाद में बुलाएँगे और वो बाद है कि कभी आता ही नहीं।

मैं क्या कहता, चुपचाप उनकी दुखगाथा सुनता रहा। मन को तसल्ली जरूर हुई कि चलो तरक्की होने के बाद भी यह खुश नहीं है। और लगाओ, बॉस के फेरे लिपिiस्टक लगाकर!

मौका देखकर मैं वहाँ से बाहर निकला, तो दूसरे सहयोगी मिल गए। उन्हें तरक्की के साथ बाहर स्थानांतरण मिला था। उनके चेहरे पर तनाव था और होशोहवास उड़े हुए-से थे। बिल्कुल सुस्त, मरियल-सी चाल में चिंता में डूबे चलने की प्रक्रिया में रेंग-से रहे थे। मैंने टोक दिया, “क्यों साहब, तरक्की मिल गई, तो अब हमारी तरफ देखते भी नहीं!

उन्होंने चौंककर मेरी और देखा। बोले, “नहीं जी, ऐसी कोई बात नहीं है। और ये तरक्की भी कैसी तरक्की! सी श्रेणी के शहर में फेंक दिया है। तनख्वाह में दो हजार रुपये कम हो गए हैं। चार बच्चे यहाँ पढ़ाई कर रहे हैं। सत्र पूरा होने से पहले उन्हें ले जा नहीं सकता। वहाँ अकेले रहना पड़ेगा, एक और गृहस्थी बसानी पड़ेगी और आप जानते ही हैं कि अकेले आदमी के भी खर्चे तो सारे ही होते हैं। समझ में नहीं आता कि क्या करूँ! अध्यक्ष महोदय के पास गया था निवेदन करने कि बच्चों का सत्र पूरा होने तक तो यहीं रहने दें, पर वे तो कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। छूटते ही कहते हैं - तो छोड़ दो पदोन्नित। क्या करूँ, समझ में नहीं आता...

मैं चिंता में पड़ गया। उन्हें बधाई दूँ या उनके साथ संवेदना प्रकट करूँ? लेकिन उन्होंने मुझे इस संकट से उबार लिया। अच्छा चलूँ, स्थानांतरण के लिए अग्रिम राशि लेनी है।यह कहकर वे एक ओर को रेंग लिए और मैं इस बात से खुश होता हुआ चल दिया कि अच्छा ही हुआ कि मुझे ऐसी तरक्की नहीं मिली, वरना अपनी भी साँप-छछुंदर वाली गति हो गई होती।

आगे अन्य सहकर्मी का कमरा था। न वे महिला थे और न उनका स्थानांतरण हुआ था, तो उन्हें तरक्की की बधाई देने में परेशानी नहीं होगी, यह सोचकर मैं उनके कक्ष में घुसा। वे वस्तुत: अपने सिर के बाल नोच रहे थे। मेज पर रखा फोन बज रहा था, और वे उसे शत्रु की नजर से देख रहे थे। मेज पर कागज बिखरे हुए थे और फाइलों का अंबार लग चुका था। उनका हाल देखकर भी मैं बधाई देने की बात भूल गया और पूछा, “क्या बात है, सिर दुख रहा है क्या?”

अरे, सिर तो तब दुखे, जब ये दफ़तर वाले सिर को गर्दन पर बचा रहने दें। उन्होंने बड़े गमगीन अंदाज में कहा।

क्यों, क्या हुआ, सब ख़ैरियत तो है। तरक्की के बाद तो आपको खुश होना चाहिए। कई लोगों को लाँघकर आपको तरक्की मिली है। अमाँ यार, कुछ मिठाई वगैरह खिलाओ, काम की परेशानियाँ तो लगी ही रहती है।

अरे काम की परेशानियों से कौन डरता है,” उन्होंने मायूसी से कहा, “पर काम भी तो तरतीब से होना चाहिए कि नहीं! तरक्की देकर नए पद का काम दे दिया है और पुराना काम भी वापस नहीं लिया। इधर का देखो, तो वहाँ का छूट जाता है और वहाँ के काम पर ध्यान दो, तो इधर का पिछड़ जाता है। कुछ कहो, तो बोलते हैं कि तरक्की के साथ काम की जिम्मदारियाँ तो बढ़ती ही हैं। अच्छी तरक्की है भई,” फिर कुछ सोचकर बोले, “तुम अच्छे रहे भई कि न तरक्की मिली न ये सारा सिरदर्द! तरक्की क्या है, जी का जंजाल है। ऐसा सरकारी दफ़तर में ही होता है। सुविधाएँ दो मत और काम पर काम बढ़ाते रहो और ऊपर से आउटपुट चाहिए आला दर्जे की!

मेरी समझ में नहीं आया कि उनको क्या कहूँ। लेकिन तभी हमारे एक और सहयोगी कक्ष में दाखिल हुए और उन्होंने मुझे असमंजस से उबार लिया। उनकी भी तरक्की हुई थी। बातों को नया रुख देने की गरज से मैंने कहा, “भई, तरक्की के लिए ढेरों बधाइयाँ!

मैंने सोचा था कि वे धन्यवाद देंगे और मैं कहूँगा कि मियाँ सूखे धन्यवाद से काम नहीं चलेगा, कुछ चाय-पानी का इन्तजाम करो, पर उसने भी मुझे इसका अवसर नहीं दिया। बोला, “अरे, कहाँ की तरक्की, भाई! तरक्की से पहले जो काम कर रहे थे, वही अब भी कर रहे हैं। बस नाम की तरक्की है। जहाँ हो, वहीं लगए रहो, पत्थर की तरह। अरे, तरक्की होती है, तो नया कमरा मिलता है, फोन मिलता है, निजी सहायिका मिलती है, चपरासी मिलता है। यहाँ तो कुछ भी नहीं है। जैसे थे, वैसे ही हैं - जैसे ता घर रहे, वैसे रहे बिदेस। अब ऐसी तरक्की को क्या शहद लगाकर चाटें?”

मेरे पास उनकी बातों का कोई जवाब नहीं था। इतना जरूर था कि इन लोगों से मिलने के बाद अब मुझमें और लोगों को तरक्की की बधाई देने की हिम्मत नहीं बची थी। यही इच्छा हो रही थी कि उनके साथ गले लगकर खूब रोऊँ। शायद उनका मन भी हल्का हो जो और मेरा भी।


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