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ISSN 2292-9754

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10.11.2014


ये गीत परिवेशगत आस्था एवं दायित्वबोधी संवेदना से संपृक्त हैं
आचार्य भगवत दुबे

गीत-संग्रह – ‘अँजुरी भर प्रीति’
गीतकार - रजनी मोरवाल
प्रकाशक - बोधि प्रकाशन, जयपुर
मूल्य - १७५ रुपये

गीत, कविता का अनुभूतिजन्य एवं भावना प्रधान, वह रूप है जिसमें कवि की वैयक्तिक अभिरुचियाँ, परिवेशगत संस्कार एवं उसके समष्टिगत राग-विराग पूरे उन्मेश के साथ छन्दोबद्ध लयात्मक प्रवाह में तरंगित होते हुए अंकित होते हैं। इन गीतों की लोकप्रियता बहुत व्यापक होती है।

आजकल रचनाकर छंदों से जी चुराने लगे हैं एवं छंद को त्यागकर कविता के नाम पर नीरस गद्य परोसने लगे हैं। समकालीनता एवं प्रगतिशीलता के नाम पर हमारी छंदानुशासित रागात्मक चेतना को आहत किया जा रहा है। यदि छंद के निष्ठावान उत्साही शब्द-साधक न होते तो साहित्य की पीठिका से गीत कब का पदच्युत होकर विलुप्त हो गया होता। ख़ैरियत है कि छंद की साधना करने वाले गीतानुरागियों ने अपने प्रेमाश्रु अथवा पीड़ाश्रु सींचकर गीत की बेलि को सूखने नहीं दिया है। हमारे यहाँ प्रेम एवं आह्लाद में तो गाया ही जाता है अपितु पीड़ा का भी अनुगायन किया जाता है।

सुश्री रजनी मोरवाल छंद की सुधी सारस्वत साधिका हैं जो गीतधर्म का पूरी निष्ठा के साथ निर्वाह कर रही हैं। समीक्ष्य कृति “अँजुरी भर प्रीति” कवयित्री रजनी मोरवाल की तीसरी गीत कृति है। इसके पूर्व भी रजनी के दो गीत-संग्रह ‘सेमल के गाँव से’ एवं ‘धूप उतर आई’ प्रकाशित एवं प्रशंसित हो चुके हैं। प्रो. नरेश दाधीच ने ठीक ही लिखा है कि “रजनी मोरवाल की काव्यात्मक अभिव्यक्ति, भविष्य की सुनहरी आशा जगाती है।”

प्रस्तुत कृति के अनेक गीतों में प्राणीमात्र की स्वाभाविक रागानुभूति एवं विरहणी पीड़ा को कवयित्री ने बड़ी संजीदगी एवं भाव प्रवणता के साथ अभिव्यक्ति दी है –

“राह तुम्हारी तकते-तकते
कितने मौसम बीत गये

भूल गई शृंगार बदन का
सुध-बुध अपनी बिसराई
उलझे-उलझे केश देखकर
पतझड़ की ऋतु शरमाई

चूड़ी, काजल, बिन्दी, हल्दी
औ’ झूलों के गीत गये”

आज भूमंडलीकरण, बाज़ारवाद के कारण पनपे भ्रष्टाचार, छल, कपट पाखंड एवं राजनैतिक दोगलेपन ने हमारे पारंपरिक संस्कारों एवं नैतिक मूल्यों में इतनी गिरावट ला दी है कि आपसी प्रेम, भाईचारे एवं सामाजिक सद्भाव के रिश्तों को तार-तार कर दिया है। इन आहत करने वाले परिदृश्यों को रजनी मोरवाल ने यथार्थ के धरातल पर बड़ी सहजता एवं पारंपरिक सपाटबयानी के साथ अंकित किया है –

“प्रीति के रिसने लगे सब बंध
गढ़ लिए हैं कागज़ी संबंध

दायरों में कैद रिश्तों की घनी डोरी
बंधनों से मुक्त होकर रह गई कोरी
लग रहे थोथे सभी अनुबंध

भूख, गरीबी, बेरोज़गारी, बालश्रम की समस्या, बिगड़ते पर्यावरण एवं विनाशकारी प्रदूषण जैसी समस्याओं पर भी रजनी मोरवाल ने ज़िम्मेदारी के साथ अपनी गीतमी रचना धर्मिता का निर्वाह किया है। जीवन के झंझावातों में भी कवयित्री आशा एवं ढृढ़ संकल्प के साथ उदासी एवं निराशा के अंधकार को चीरने के लिए आस का दीपक जलाने का आह्वान करती हैं। गीतांश देखिए –

“हर तरफ़ बिखरी उदासी / आस का दीपक जलाओ
स्याह रातों के अँधेरे / मौन के साथी बने हैं
जुगनुओं की रोशनी से / क्यों सितारे अनमने हैं
यामिनी के द्वार पर / बारात तारों की सजाओ”

इन गीतों में प्रतीक विधान तो ठीक है किन्तु उक्तिवैचित्र्य का अभाव है बिम्बात्मक अभियोजना भी साधारण है फ़िर भी छांदस निष्ठा परिवेशगत आस्था एवं दायित्वबोधी संवेदना से संपृक्त इन गीतों की उजास समाज में नई ऊर्जा का संचार करेगी।

मैं कवयित्री रजनी मोरवाल के गीतानुराग एवं उनकी सृजनशीलता की सराहना करता हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि साहित्य जगत में कृति “अँजुरी भर प्रीति” प्रशंसा प्राप्त करेगी।

महामंत्री ‘कादम्बरी’
पिसनहारी मढ़िया के पास
जबलपुर- ४८२००३ (मध्य प्रदेश)
मो. ०९३००६१३९७५


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