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ISSN 2292-9754

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01.14.2016


जयशंकर प्रसाद की कहानियाँ- वर्तमान परिप्रेक्ष्य

हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में समान प्रतिभा रखने वाले छायावादी दौर के प्रयोगात्मक रचनाकार जयशंकर प्रसाद ने लगभग 70 कहानियाँ लिखी हैं, जो अपने काव्य रूपों की तरह ही असमान स्तर की हैं। इनकी कहानियों का मूल्यांकन प्रेमचन्द से तुलनात्मक रूप में न कर आलोचना की अलग परिपाटी बनाकर करनी चाहिए। इनकी कहानियाँ जहाँ प्रेम के उदात्त रूप एवं बलिदान को केन्द्र में लेकर चलती हैं, वहीं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बावजूद मानवीय भावभूमि से जुड़ी सामाजिक परिवेश की यथार्थता को बयां करती हैं। आज का दौर जहाँ पूँजी के विकेन्द्रीकरण एवं सूचना प्रसार का युग है, वहीं मूल्यों के विघटन की पीड़ा से भी युग जूझ रहा हैं। ऐसे समय में प्रसाद की कहानियों का विवेचन करना इस पीड़ा में मरहम लगाने के समान है।

प्रसाद की अधिकांश कहानियाँ देशप्रेम की भावना से ओतप्रेत है जहाँ त्याग और बलिदान की भावना सन्निहित है। आज हम अँग्रेज़ों की ग़ुलामी से तो मुक्त हो गए हैं, लेकिन भूमण्डलीकरण की नीतियों के कारण भारत आज भी पश्चिमी देशों का उपनिवेश बना हुआ है। यह यथार्थ है कि आज पूँजी के द्वारा पूरे विश्व को एकल करने की जो प्रक्रिया चल रही है, वह उत्पादों के लिए विश्व बाज़ार को हासिल करने और दुनियाँ के विभिन्न हिस्सों पर प्रभुत्व कायम करने की गतिविधियों से जुड़ी हुई है। इस ग़ुलामी से मुक्ति का कोई रास्ता दिखाई नहीं पड़ रहा है न त्याग और बलिदान जैसे मूल्य ही दृष्टिगत हो रहे हैं। ऐसे में प्रसाद की पुरस्कार, आकाशदीप, ममता, सालवती जैसी त्याग एवं बलिदान से भरी कहानियाँ ही घोर अंधकार में ज्योति का काम करती है। "पुरस्कार" कहानी में मधुलिका अपने व्यक्तिगत प्रेम की तिलांजलि देकर अपने राष्ट्र को विदेशी के हाथों जाने से रोकती है। वह सोचती है- "श्रावस्ती दुर्ग एक विदेशी के अधिकार में क्यों चला जाए? मगध का चिर-शत्रु! ओह! उसकी विजय कोशल नरेश ने क्या कहा था- "सिंह मित्र की कन्या।" सिंहमित्र, कोशल का रक्षक वीर, उसी की कन्या आज क्या करने जा रही है? नहीं नहीं, मधुलिका! मधुलिका! जैसे उसके पिता उस अंधकार में पुकार रहे थे। वह पगली की तरह चिल्ला उठी। रास्ता भूल गई।"

प्रसाद आर्थिक स्वतंत्रता को ही वास्तविक स्वतंत्रता मानते हैं, किन्तु आज हमें आर्थिक रूप से ही परतंत्र बनाया जा रहा है। "सालवती’ कहानी में सालवती के पिता कहते है – "आर्थिक पराधीनता ही संसार में दुख का कारण है। मनुष्य को उससे मुक्ति पानी चाहिए, मेरा इसलिए उपास्य है स्वर्ण।" वर्तमान भूमंडलीकरण के दौर में जहाँ पूरा विश्व ग्राम बनाने की योजना चल रही है, वहीं हमारे संसार से ग्राम नष्ट होता जा रहा है। हर गाँव, शहर की ओर बढ़ रहा है। गाँवों का डिजिटलाइज़ेशन हो रहा है, गाँवों की संस्कृति का विलोपीकरण हो रहा है। मॉडर्न टेक्नोलोजी गाँव और शहर के बीच की खाई को पाटती नज़र आ रही है। ऐसे परिप्रेक्ष्य में प्रसाद की कहानी ग्राम सहसा हमें ऐसे ग्रामीण बोध की याद दिला जाती है जो आज हमसे छूटता नज़र आ रहा है। कहानी में प्रसाद ने जिस तरीक़े से ग्राम सभ्यता की सहजता, उमंग, उत्सवप्रियता, रोचकता तो रेखांकित किया है, वह हमें सहज ही आकर्षित कर लेता है। वे लिखते हैं - "अंधकार गगन में जुगनू तारे चमक चमक कर चित्त को चंचल कर रहे हैं। ग्रामीण लोग अपना हल कंधे पर रक्खे, बिरहा गाते हुए, बैलों की जोड़ी के साथ, घर की ओर प्रत्यावर्त्तन कर रहे हैं।"

यह कहानी एक ओर जहाँ ग्रामीण बोध की कहानी है, वहीं दूसरी ओर समकालीन परिवेश के यथार्थ को अभिव्यक्त करने वाली पहली कहानी है जिसमें प्रसाद ने सामंतवाद की अमानवीयता प्रदर्शित की है। आज सामंत तो चले गए है, किन्तु उनका स्थान पूँजीपतिवर्ग ने ले लिया है। आज भी पूँजीपति वर्ग द्वारा किसानों का शोषण, मजदूरों पर अत्याचार, जबरन भूमि अधिकार जैसी अमानवीय घटनाएँ उन सामंतों के अत्याचार से कहीं बढ़कर है।

आज का दौर उपभोक्तावादी दौर है, जहाँ उपभोग ही सब कुछ है। हम पूँजी कमाने की होड़ में अंधी दौड़ लगा रहे हैं। सुख की कामना ही हमारा ध्येय है। ऐश्वर्य और वैभव के पीछे भागे जा रहे हैं। प्रसाद भी भाग रहे थे, किन्तु ऐश्वर्य और वैभव के पीछे नहीं बल्कि एक ऐसे संसार की ओर जहाँ श्रम के बाद विश्राम हो, शांति हो, जहाँ वैभव न हो प्रेम हो। प्रसाद की कहानी "समुन्द्र-संतरण’ ऐसी ही भावबोध की कहानी है, जहाँ अंत में धीवर बाला, राजकुमार को नौका में बैठाकर कहीं दूर ले जाती है। कहानी बयां करती है -

"धीवर बाला ने कहा, "आओगे?”

लहरों को चीरते हुए सुदर्शन ने पूछा - कहाँ चलोगी?

पृथ्वी से दूर जल राज्य में, जहाँ कठोरता नहीं, सीधा आत्मविश्वास है, वैभव नहीं, सरल सौन्दर्य है।"

आज हम वैभव के द्वारा पृथ्वी पर ही स्वर्ग बनाना चाह रहे हैं। मशीन के द्वारा पृथ्वी को आलीशान स्वर्ग बनाने की प्रक्रिया चल रही है। तकनीक हमें हर रोज़ बेहतर से बेहतर चीज़ ईजाद कर दे रही है और हम प्रतिदिन इस तकनीक का ग़ुलाम होते जा रहे हैं। प्रसाद अपनी कहानी स्वर्ग के खंडहर में कहानी के द्वारा अतिशय भोगवाद के संदर्भ में उसके अंत का अवसादपूर्ण संकेत देते है। कहानी का स्वर्ग आमोद-प्रमोद, विलास तथा अभिसार का केन्द्र है, जहाँ संसार के सर्वोत्तम सुख के प्रसाधनों को इकट्ठा करने की कोशिश की गई है, किन्तु यह कोशिश ही स्वर्ग को कारागार में तब्दील कर देती है। कहानी में प्रसाद लज्जा के मुँह से इसी मानव निर्मित स्वर्ग का विरोध दिखाया है। वे लिखते हैं- "पृथ्वी को केवल वसुन्धरा होकर मानव-जाति के लिए जीने दो, अपनी आकांक्षा के कल्पित स्वर्ग के लिए, क्षुद्र स्वार्थ के लिए इस महती को, इस धरणी को नरक न बनाओ, जिसमें देवता बनने के प्रलोभन में पड़कर मनुष्य राक्षस न बन जाए, शेख।"

आज की बाज़ारवादी मानसिकता हमें चीज़ों को पाने के लिए आकर्षित करती है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ केवल उत्पाद लेकर ही नहीं आ रही हैं, बल्कि उन उत्पादों को लेने के लिए ऋण भी मुहैया करा रही हैं। भोगवाद की आँधी ने हमें इस क़दर चपेट में ले लिया है कि हम वस्तुओं में सुख तलाशने लगे हैं। ऐसी परिस्थिति में हमें प्रसाद की कहानियों से सीख लेनी चाहिए जहाँ उनके पात्र हर भोग की वस्तुओं का तिरस्कार करती हैं, हर सुख सुविधाओं का निषेध करती हैं। "आकाशदीप’ कहानी में चम्पा बुद्धगुप्त के विवाह के प्रस्ताव को ही नहीं, राजरानी के पद को भी अस्वीकार करती है और जीवन भर उस दीप के निर्धन आदिवासियों की सेवा का वरण करती है। वह कहती है- "बुद्धगुप्त मेरे लिए सब भूमि मिट्टी है, सब जल तरल है, सब पवन शीतल है। कोई विशेष आकांक्षा हृदय में अग्नि के समान प्रज्वलित नहीं। सब मिलकर मेरे लिए एक शून्य है। प्रिय नाविक तुम स्वदेश लौट जाओ, वैभवों का सुख भोगने के लिए, और मुझे छोड़ दो इन निरीह भोले-भोले प्राणियों के दु:ख की सहानुभूति और सेवा के लिए।"

"ममता" कहानी में भी ममता शेरशाह के अपार स्वर्ण और ऐश्वर्य को तिरस्कारपूर्वक अस्वीकार कर देती है- "हे भगवान! तब के लिए! विषद के लिए! इतना आयोजन! परम पिता की इच्छा के विरुद्ध इतना साहस! पिताजी, क्या भीख न मिलेगी? क्या कोई हिन्दू भूपृष्ठ पर बचा रह जाएगा, जो ब्राहमण को दो मुट्ठी अन्न दे सके? यह असंभव है। फेर दीजिए, पिताजी, मैं काँप रही हूँ - इसकी चमक आँखों को अंधा बना रही है।"

इतना ही नहीं हुमायूँ को एक रात शरण देने के उपहार में जब अकबर ममता के लिए भवन बनवाना चाहता है तब ममता इस सुविधा को अस्वीकार कर स्वंय खंडहरों में चली जाती है। पुरस्कार कहानी में भी हम देखते हैं कि कहानी की नायिका मधुलिका अपनी ज़मीन की क़ीमत के रूप में महाराज द्वारा दिए गए स्वर्ण मुद्राओं को अस्वीकार करती है- "महाराज ने मधुलिका के खेत का पुरस्कार दिया, थाल में कुछ स्वर्ण मुद्राएँ। वह राजकीय अनुग्रह था। मधुलिका ने थाली सिर से लगा ली, किन्तु साथ ही उन स्वर्ण मुद्राओं को महाराज पर न्योछावर करके बिखेर दिया।"

पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव में आने से भारत में संयुक्त परिवार टूटकर एकल परिवार बना। ऐसे परिवार में या तो बच्चा घर पर अकेला रह जाता है या माँ-बाप के द्वारा अधिक दंड की क्रूरता झेलनी पड़ती है। बच्चे की ज़िन्दगी घर की चार दिवारी एवं खिलौने तक सीमित हो जाती है। इस झुण्ड समाज में जहाँ एक ओर बच्चे की मानसिकता से खिलवाड़ होता है, वहीं बूढ़े बुज़ुर्गों की स्थिति दयनीय बन जाती है। उन्हें पुराना फर्नीचर समझकर घर के कोने में ढकेल दिया जाता है या घर का कूड़ा समझकर फेंक दिया जाता है। प्रसाद ने अपनी कहानियों के माध्यम से इन संबंधों के मूल्यों को पहचाना है। आज अवमूल्यन होते संबंधो के दौर में उनकी कहानी "मधुआ’ और "छोटा जादूगर’ आज की चुनौतियों से टकराने का साहस देती है। "मधुआ’ कहानी में मधुआ के आ जाने से शराबी को परिवार बोध का एहसास होता है और वह शराब छोड़कर कर्म में प्रवृत्त हो जाता है। वह मधुआ को लेकर ज़मींदार के शोषण से मुक्त होकर कहीं दूर चला जाता है। प्रसाद लिखते है- "शराबी आश्चर्य से उसका मुँह देखता हुआ कल उठाकर खड़ा हो गया। बालक ने गठरी लादी। दोनों कोठरी छोड़कर चल पड़े।" "छोटा जादूगर" कहानी में भी एक 13-14 वर्ष का बच्चा जिसके पिता देश के लिए जेल में हैं और माँ बीमार है, वह अपना और अपनी माता का भरण-पोषण करने के लिए खेल दिखाकर अपनी जीविका चला रहा है। लेखक कहते भी हैं- "बालक को आवश्यकता ने कितना शीघ्र चतुर बना दिया। यही तो संसार है।" कहानी के अंत में छोटा जादूगर का खेल जम नहीं पाता क्योंकि उसकी माँ ने उसे जल्दी आने को कहा है कि उसकी घड़ी समीप है। लेखक जब छोटा जादूगर को लेकर उसके घर पहुँचता है तो वे पाते हैं कि छोटे जादूगर की माँ मर रही थी- "जादूगर दौड़कर झोपड़े में माँ-माँ पुकारते हुए घुसा। मैं भी पीछे था, किंतु स्त्री के मुँह से, "बे...’ निकलकर रह गया। उसके दुर्बल हाथ उठकर गिर गए। जादूगर उससे लिपटा रो रहा था। मैं स्तब्ध था। उस उज्जवल धूप में संसार जैसे जादू-सा मेरे चारों ओर नृत्य करने लगा।"

इस प्रकार हम देखते हैं कि किसी रचनाकार की प्रतिभा शत-प्रतिशत अपने युग की दासी नहीं होती। प्रसाद की कहानिय़ाँ युग चेतना सम्पन्न हैं। युग चेतना समयबद्धता भी है और समयातीत होने की प्रक्रिया भी। कालातीत हुए बिना कोई भी रचना कालजयी नहीं हो सका है। प्रसाद जी एक प्रबुद्ध एवं युग चेता रचनाकार थे। अतः उनकी कहानियाँ केवल तात्कालीन युग चेतना से आप्लावित ही नहीं, बल्कि आज भी हमारे लिए ताज़ा और समकालीन हैं।

रहीम मियाँ
एसिसटेंट प्रोफेसर
बानारहाट कार्तिक उराँव हिन्दी गवर्नमेंट कॅलेज
बानारहाट, जलपाईगुड़ी
फोन- 9832636020

संदर्भ ग्रंथ

1. जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियाँ – सं विजय मोहन सिंह
2. प्रसाद साहित्य में युग चेतना – डॉ. श्रीमती लीला देवी गुप्ता
3. हिन्दी कहानी का विकास – मधुरेश
4. हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास – रामस्वरूप चतुर्वेदी
5. नव उपनिवेशवाद और हिन्दी कहानी – संजीव कुमार
6. भूमंडलीकरण की चुनौतियाँ – डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा
7. ग्राम – जयशंकर प्रसाद
8. आकाशदीप - जयशंकर प्रसाद
9. ममता - जयशंकर प्रसाद
10. समुन्द्र – संतरण- जयशंकर प्रसाद
11. मधुआ - जयशंकर प्रसाद
12. पुरस्कार - जयशंकर प्रसाद
13. सालवती - जयशंकर प्रसाद
14. स्वर्ग के खंडहर में - जयशंकर प्रसाद


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