अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.05.2016


ज़माना मुझको आँखों पर

ज़माना मुझको आँखों पर बिठाता ‘सर’ समझता है
ये तू है जो न जाने क्यूँ मुझे कमतर समझता है

उसे दिल जान से मैं चाहती हूँ पूजती भी हूँ
जिसे तू कुछ नहीं बस रंग चुटकी भर समझता है

मैं तुझको देवता मानूँ यही कारण है तू मुझको
हमेशा धूल पैरों की या फिर चाकर समझता है

बड़े अरमान से मैंने तुम्हें अपना बनाया था
ये क्या मालूम था के तू मुझे बिस्तर समझता है

उसे जाने दो अपनी राह करने दो वो जो चाहे
वो आदम जात है जो खाके बस ठोकर समझता है

ये मेरा चित्त है जिसमें कि दोनों साथ रहते हैं
अभी अल्लाह-ओ-अकबर तो अभी हर-हर समझता है


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें