अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.05.2016


ऊँचे-ऊँचे महल बने

ऊँचे-ऊँचे महल बने, करके हमको बेघर-वीरान
लुटती रही ग़रीबी, ठाठ-अमीरी से होकर अंजान

रोटी का कुछ साथ दिया तो नमक-तेल ने अपने घर
उनके घर फैली तश्तरियाँ, सबमें एक-एक पकवान

चावल उनका आयातित है, चिकना-मीठा-ख़ूश्बूदार
हमने तो बस जैसे-तैसे, उपजाए हैं देशी धान

हमसे कोई मेल नहीं है, उनकी अपनी दुनियाँ है
उनकी अपनी गीत-गवनई, उनके अपने सुर औ’ तान

भूल हुई यह मदद उन्हीं से लेने जा पहुँचे हम, जो
रात गए चोरी कर लिखते सुबह रपट बनकर दीवान

अबसे पहले कभी न, मंदिर-मस्जिद में था बम फूटा
लोग बड़े ख़ुशदिल होकर, करते थे पूजा और अज़ान

किसके बदले कौन मरा, यह कैसी है बदले की आग
सब कुछ बदला और हो गया, एक अदद युग का अवसान


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें