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11.05.2007
 
तर्जुमानी जहान की, की है
आर.पी. शर्मा ’महरिष’

तर्जुमानी जहान की, की है
इस तरह हमने शाइरी की है

अंधी गलियों में भटके जब जब हम
फ़िक्र-नौ ने निशांदेही की है

सबको बख्शा है हौसला हमने
नाख़ुदाई, न रहबरी की है

ख़ुद ग़मों से निढाल होकर भी
हमने औरों की दिलदिही की है

जो हमें एक सूत्र में बांधें
उन प्रयासों की पैरवी की है

उससे सीखेंगे खुशबयानी हम
इक परिंदे से दोस्ती की है

हमने पाई जहाँ झलक ‘महरिष’
आदमीयत की आरती की है


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