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01.18.2009
 
किसी कविता को पहले बेज़ुबां होते नहीं देखा
आर.पी. घायल

किसी कविता को पहले बेज़ुबां होते नहीं देखा
कभी शब्दों के जंगल में उसे खोते नहीं देखा

कहानी बात करती थी बुज़ुर्गों की तरह पहले
कभी तनहाइयों में भी उसे सोते नहीं देखा

सुरों का पैरहन पहने हुए जो गीत होते हैं
सुरीले कंठ से उनको जुदा होते नहीं देखा

जहाँ जज़्बात की ख़ुशबू मिली होती है मिट्टी में
किसी को बीज नफ़रत का वहाँ बोते नहीं देखा

गुलों को शाख़ से मैनें अलग होते तो देखा है
मगर कांटों को शाख़ों से अलग होते नहीं देखा

किसी की चाहतें 'घायल' सभी पूरी नहीं होतीं
इसे जो जान लेता है उसे रोते नहीं देखा

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