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08.06.2007
 
जो लोग मरते थे कभी जज़्बात के लिए
आर.पी. घायल

जो लोग मरते थे कभी जज़्बात के लिए
वो लोग क्यों मरने लगे हमज़ात के लिए

जलने लगीं है बस्तियाँ नफ़रत की आग में
हम ख़ुद ही गुनहगार हैं हालात के लिए

सहमी हुई सर साँस से, धड़कन से पूछिये
हर आदमी है ताक़ में आघात के लिए

सोने की फ़ुर्सत है नहीं इन्सां को आजकल
अब तो तरसते लोग हैं इक रात के लिए

इस दौर में बदलाव का आलम तो देखिये
हम तो तरस के रह गये दो बात के लिए

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