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07.14.2007
 

दुखों के दिन मेरे सुख में ही जिसके साथ गुज़रे हैं

आर.पी. घायल

दुखों के दिन मेरे सुख में ही जिसके साथ गुज़रे हैं

 उसी  की याद  में  हर दिन मेरे लम्हात गुज़रे हैं

 

मेरे खामोश अरमां  को सिखाया  बोलना जिसने

    उसी  की  ज़ुल्फ़ को छूकर  मेरे  नग़्मात गुज़रे हैं

 

 भी बातों में तल्खी तो  कभी जुंबिश निगाहों में

 इन्हीं हालात से  अब तक मेरे  हालात  गुज़रे हैं

 

किसी  गजरे के मुरझाये मिले हैं फूल जो  मुझको

उन्हीं  फूलों  की  ख़ुशबू  से मेरे जज्बात गुज़रे हैं

 

   ग़ज़ल मेरी मुहब्बत की बसी जिस गाँव मेंघायल

 उसी की  गलियों से होकर कई  हज़रात  गुज़रे  हैं



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