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ISSN 2292-9754

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05.22.2014


शंकर शेष के नाटकों में राजनीतिक चेतना
(कालजयी, पोस्टर तथा एक और द्रोणाचार्य के विशेष संदर्भ में)

Shankar Sheshमनुष्य का सबंध किसी न किसी रूप में राजनीति से रहता है। समाज और साहित्य का विकास भी उस समय की राजनैतिक परिस्थितियों से होता रहा है। तात्कालिक राजनैतिक परिस्थितियाँ साहित्य को भी काफी प्रभावित करती हैं। पिछले दो तीन दशकों में राजनीति तथा नाटक के बीच घनिष्ठता रही है। आज अधिकांश सत्ताधारी राजनैतिक लोग अपनी स्वार्थसिद्धि में लगे हुए हैं। राजनैतिक भ्रष्टाचार, बनते बिगड़ते मूल्य, सरकारी योजनाएँ, राजनैतिक नेताओं की चरित्रहीनता आदि का यथार्थ चित्रण आज के नाटकों में नाटककारों द्वारा किया गया है। शंकर शेष ने भी अपने नाटकों के माध्यम से वर्तमान समय की राजनीति के दोहरे चरित्र, शोषण शक्तियों का प्रशासन के साथ तालमेल, शिक्षाजगत में फैला भ्रष्टाचार आदि समस्याओं को उजागर किया है। हमारे राजनेता जानबूझकर समाज में फैली समस्याओं को ज्यों का त्यों रखना चाहते हैं ताकि उनकी राजनीति चमकती रहे। शंकर शेष ने अपने नाटकों में राजनीति के इस चरित्र को बखूबी निभाया है। राजनैतिक वातावरण में व्यक्ति को अपने सुख साधन छोड़कर जनता के सुखों का ध्यान रखना होता है। लेकिन अजीब विडंबना है कि राजनेता हमेशा अपने सुख मे लीन रहते हैं। अपने इस सुख को निरतंर बनाये रखने के लिए वे सभी राजनेता आम चुनावों में तरह-तरह के हथकंडे अपनाते रहते हैं। उन्हें अपनी खुशहाली का ख़्याल रहता है। जनता के सुख-दुख से उनका कोई सरोकार नहीं रहता।

शंकर शेष ने अपने नाटकों में आज़ादी के बाद वर्तमान शासन में मनुष्य की व्यक्तिगत सत्ता को चित्रित किया गया है कि वास्तव में सत्तारूढ़ शासक का अवसरवाद ही शेष रह गया है, जहाँ आम व्यक्ति की कोई सुनवाई नहीं होती है। “आज राजनीति हमारी मानसिकता बन गई है, मध्ययुग में जिस प्रकार धर्म की अतिव्याप्ति ने अनुभव और जीवन के वास्तविक रूप को ढक लिया था, उसे विकृत और पहचानहीन बना दिया था।’’1 इसी विकृति का प्रभाव समकालीन व्यक्ति पर भी पड़ा। राजनीतिक धरातल पर ठगा हुआ स्तब्ध बुरी तरह निचुड़ा हुआ आम आदमी सत्ता व्यवस्था, शासन के अन्याय, अत्याचार और आंतक से अनिवार्य युद्ध की भूमि में फँसा दिया गया।

शंकर शेष के नाटक समय और समाज की विडंबनाओं, लोकतंत्र के सही ढाँचे और प्रक्रिया को आज के यथार्थ से जोड़कर देखते हैं। आज हम राजनीति के प्रति कितना भी आस्थावादी नज़रिये रखें लेकिन राजनीति ने सदैव आम आदमी के साथ खिलवाड़ किया है। आज जो सपना भारत के आज़ाद होने के बाद देखा था कि सभी सुखी होगें, कोरी कल्पना साबित हुआ। आज भी भूख से तड़पते लोग सड़कों पर मर रहे हैं और दूसरी तरफ राजनेता अपनी वैभवपूर्ण ज़िंदगी जीने के लिए राजनीति को एक मार्ग के रूप में अपनाना शुरू कर दिया है। सत्ता प्राप्ति के लिए बड़े-बड़े वायदे, दावों के ज़रिये राजनेता जनता को सपने दिखाने का काम कर रहे हैं। लोकतंत्र ने आम आदमी में भरोसा जगाया किन्तु उस भरोसे का आज खून हो रहा है। आज सत्ता प्राप्ति के लिए आम आदमी के दम पर राजनीति करने वाले लोग जनता की भावनाओं से साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। आज आम मनुष्य की नियति शोषण तंत्र का अंग बनकर रह जाने की हो गई है।

शंकर शेष के नाटकों में हम देख सकते है कि आज की राजनीति का चरित्र कितना दुरुह, और क्रूर हो गया है। जनता को क्षेत्रवाद, जातिवाद में फँसाकर आज का राजनेता जनता की सेवा न करके सत्ता और कुर्सी की सेवा करने में लगे हुए हैं। शंकर शेष ने इन सभी को अपनी संवेदना का अंग बनाकर अपने नाटकों में उसकी गहन पड़ताल की है। रजनी कोठारी भारतीय राजनीति के चरित्र को उजागर करते हुए कहती है- “भारतीय राजनीति की यह प्रवृति है कि समझौते और सहमति की खातिर यहाँ बातें गोल-मोल रखी जाती है।’’2 शंकर शेष के नाटक राजनीति के इस रहस्यवाद के मूल में जो भयानक जन शोषण निहित है उसे सूक्ष्मता से पहचाना है। सामंती मानसिकता और आम आदमी के नाम पर शोषण के दमन चक्र ने मानव जीवन को खोखला कर दिया है।

आज़ादी के बाद सामाजिक समता, आर्थिक खुशहाली और राजनीतिक खुशहाली की जगह भ्रष्टाचार और घोर निराशा ने समकालीन मनुष्य की संवेदना को झकझोर दिया। आम आदमी को सत्ता की कुव्यवस्था से सामना करना ही पड़ा। शंकर शेष के नाटकों मे इसकी गूँज साफ सुनी जा सकती है।

शेकर शेष का ‘कालजयी’ नामक नाटक में राजनैतिक विडंबनाओं के साथ सामन्ती सोच को जगह मिली है। इस नाटक में शासक वर्ग की कामुकता तथा भोग विलास की प्रवृति को उजागर किया गया है। जो आज के राजनेताओं की पोल खोलते हैं। नाटक में पुरबी नामक पात्र द्वारा कालजयी के प्रेम प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करने पर वह सख्त स्वर में कहता है- “तुम मत भूलों की मैं इस देश का राजा हूँ, तुम पर बलात्कार करने का मुझे पूरी सुविधा और अधिकार है और लोग जानते हैं कि मैं इस अधिकार का उपयोग बिना हिचकिचाहट के करता हूँ।’’3 यहाँ कालजयी जैसे नेता के लिए प्रेम जैसी पवित्र भावना केवल वासना का का पर्याय है। नाटक में दिखाया गया है कि सत्ता को केवल अपने सुख के लिए उपयोग करना ही राजा का धर्म होता है। सामन्ती मानसिकता ने प्रजातंत्र को लूटतंत्र में तब्दील कर दिया है। अगर गलती से प्रजा के मन में इस लूटतंत्र के ख़िलाफ़ बगावत करने की सूझती भी है तो चालाक राजा उसे दबाने की कोशिश करता है। वह प्रजा के विद्रोह को कुंठित करने के लिए अपने सहयोगी मृत्युंजय से कहता है - “मृत्युंजय जैसे ही प्रजातंत्र के विचार लोगों के मन में आए युद्ध की घोषणा कीजिए। लोग प्रजातंत्र वगैरह सब भूल जाएँगें। घृणा और युद्ध का वातावरण रखना ही एकमात्र उपाय है।’’4 नाटक में कालजयी प्रजा पर निरन्तर अत्याचार करता रहता है। जनता के बदलते तेवर से वह खुद भी डरा सहमा रहता है। उसके सहयोगी को भी लगता है कि अत्याचार के प्रति उठ खड़े विद्रोह को ज़्यादा दिनों तक दबाना किसी खतरे से कम नहीं है। हस्तिदन्त एँव मृत्युंजय कहते हैं - “वहाँ का प्रयोग भी किया तो वह देश एक व्यक्ति की भाँति उठ खड़ा होगा, उसे छेड़ना महाकाल को छेड़ना होगा।’’5

नाटककार मानते हैं कि अत्याचारों से प्रतिकार की भावना बढ़ती है। उन्होंने लोकतंत्र में भरोसा दिखाया है। यह दिखाने की कोशिश की है कि विद्रोह के प्रति लोगों में राजनीतिक चेतना का प्रसार भी हो रहा है। नाटक में आचार्य के दो विश्वासपात्र कहते है – “यदि देश को बचाना है तो सबसे पहले आपके हाथ काटना ज़रूरी है। कालजयी अब हमें केवल प्रजातंत्र चाहिए। हमें जनता का राज्य चाहिए। हम आपकी भाषा अच्छी तरह समझते हैं।’’6 इस प्रकार कालजयी नाटक में नाटककार की नज़र सगंठित जनशक्ति पर गई है। तानाशाही शासक को समाप्त करने का एकमात्र उपाय है जनसमाज को राजनीतिक दृष्टि से जागरूक करना तथा शासक वर्ग की गलत शासन-नीतियों के ख़िलाफ़ संर्घष करना। लोकतंत्र को जीवित करने का आह्वान करते हुए वे अपने शिष्य सत्यकेतु से हिंसात्मक लड़ाई लड़ने की जगह सब्र-सन्तोष के साथ नीतिपूर्वक लड़ने को कहते हैं, क्योंकि उनके अनुसार - “क्रान्ति कागज़ों पर नहीं होती। सैनिक सत्ता के मुँह से प्रजातंत्र निकाल लेना उसी प्रकार है, जैसे भूखे सिंह के मुँह-दाँत उखाड़ लेना। पर उपाय है लोक संग्रह करो, लोगों के मन में जो असंतोष है, उसे प्रजातंत्र का दर्शन दो।’’7 नाटक में लोकतंत्र में बढ़ते असंतोष तथा निराशा के साथ उम्मीदों की बौछार भी की गई है। नाटक में राजनेताओं के चरित्र तथा उनकी कार्यशैली पर कटाक्ष किया गया है। सामतंवादी मानसिकता से त्रस्त जीवन का चित्रण तथा ऐसे पात्रों का सृजन जो आम व्यक्ति को उसकी आत्मशक्ति से परिचित कराए वह सामंतवादी मानसिकता से उबरने के लिए तैयार करे। नाटक में पूँजीवादी मानसिकता तथा धर्म के आधार पर की जाने वाली राजनीति को भी सामने रखा है। सत्ता पर आसीन मठाधीश लोग धर्म की आड़ में अर्थोपार्जन के लिए राजनीति को एक हथियार के रूप में प्रयोग में लाते हुए झिझक भी महसूस नहीं करते हैं।

शंकर शेष के राजनीतिक दृष्टि से आम जनता को जागरूक बनाने हेतु उनका ‘पोस्टर’ नामक नाटक बहुत महत्वपूर्ण है। भारत की अधिकतर आबादी गाँवों में बसती हैं। सरकारी योजनाएँ गाँवों में आज तक नहीं पहुँची है। शहरी जीवनयापन में तथा ग्रामीण जीवन शैली में काफी अतंर देखने को मिलता है। ग्रामीण परिवेश और उसके अन्दर उस जीवन की पीड़ा, दुख, दर्द तथा आधुनिक शिक्षा के अभाव का सटीक चित्रण पोस्टर नामक नाटक में मिलता है। नाटक में शोषण की विविधताएँ मौजूद हैं। हमारी शिक्षा व्यवस्था अभी गाँवों तक नहीं पहुँची है। अपने निजी स्वार्थ के लिए गाँव के भोले लोगों को वहाँ के ज़मींदार, पूँजीपति वर्ग, राजनेता जानबूझकर उनको शिक्षा के प्रकाश से दूर रखते हैं।

नाटककार ने आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले मजदूरों आदिवासियों की पीड़ा तथा दुख को प्रमुखता से रखा है। पूँजीवादी वर्ग तथा शासक के गठजोड़ से आदिवासियों का शोषण होता है। उन्हें हर कदम पर यह अहसास दिलाया जाता है कि उनकी नियति में ही शोषण लिखा है। नाटक में पटेल जंगल की वस्तुएँ ज़्यादा तोड़ लेता है। वह अधिकारियों को खुश करने के लिए शराब की पार्टी देता है किन्तु वे उसे कुछ हटकर पेश करने को कहते हैं पटेल कहता है साहब - “जंगल में और किया ही क्या जा सकता है.. इस पर सरकारी अधिकारी तपाक से बोलता है जंगली माल तो चखा जा सकता है।’’8

नाटक में दिखाया है शोषक तबके पूँजीवादी ताकतों से हाथ मिलाकर जंगल में आदिवासियों का किस प्रकार शोषण करते हैं। शोषणकारी शक्तियाँ प्रशासन से मिलकर दमितों-वंचितों को झुककर रहने को विवश करती है। आज भी पटेल जैसे स्वार्थी तत्वों की कमी नहीं जो हमारे समाज में अपने स्वार्थ के लिए राजनीति को भी एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं।

इन दिनों आदिवासियों की योजनाओं को अमलीजामा पहनाने के लिए सरकार तथा स्वंय सेवी संस्थाएँ बहुत से काम कर रही है। सरकार योजना तो बनाती है किन्तु वह योजना उन तक नहीं पहुँच पाती। नाटककार मध्यप्रदेश के एरिये में रहकर सरकार द्वारा खोली गई संस्थाओं को करीब से देखा तथा उसके असली रूप को नाटक के माध्यम से जनता के सामने रखा। अजीब विडंबना है कि सरकार जो राशि आदिवासियों के हितों के लिए भेजती हैं उस राशि का बड़ी मात्रा में दुरुपयोग होता है। वह राशि उन तक नहीं पहुँच पाती है। आज देश को आज़ाद हुए 65 साल से ज़्यादा हो गये किन्तु आज भी यह आदिवासी समुदाय विकास की तमाम घोषणाओं के बावजूद अपने आदिमयुगीन ढर्रे पर जीने को विवश है, लाचार है। विकास के लिए सरकारें योजनाएँ तो बनाती है किन्तु वह योजना इन तक पहुँच नहीं पाती है। कुछ हद तक पहुँच भी पाती है तो ‘पटेल’ जैसे लोग अपने निजी स्वार्थ के लिए प्रशासन से गठजोड़ करके उस आंवटित पैसे को खुद खा जाते हैं। पोस्टर नामक नाटक में साथी -1 तथा कीर्तनकार के परस्पर संवादों में इस राजनीतिक असंगति पर प्रकाश पड़ता है-

“साथी-1 : सुना है, सरकार ने इन आदिवासियों के कल्याण के लिए ट्रायबल वेलफेयर डिपार्टमेण्ट खोला है, जो पिछले तीस साल से चल रहा है।

कीर्तनकार : चल ही नहीं....बड़े ठाठ से चल रहा है।

साथी-1 : तो यह कब तक चलता रहेगा, महाराज?

कीर्तन : जब तक ट्रायबल के पिछवाड़े से लँगोटी नहीं उतर जाती, तब तक यह डिपार्टमेण्ट बेखटक चलेगा, भगत।’’9

नाटककार आदिवासी क्षेत्रों तथा वहाँ के विकास को बहुत करीब से देखा है। केन्द्र सरकार की योजनाएँ उन तक सही ढंग से पहुँच नहीं पाती है। इन्होंने आदिवासी क्षेत्रों में रहकर इस बात को नाटक के माध्यम से उठाया। आधिकारिक जानकारी के आधार पर नाटक में तथ्यों को रखा है। सत्तावादी राजनीति के शिकार आदिवासी लोग होते हैं। शिक्षा रोज़गार तो दूर की बात यहाँ जीवन की मूलभूत सुविधाएँ भी नहीं पहुँच पाती है।

मुख्यधारा के समाज ने आदिवासियों के साथ हमेशा से छल किया है। अपने अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए इस समाज के सपनों को मुख्यधारा के समाज ने कुचल दिया। इन सब कारणों से इस समाज में असंतोष और विद्रोह के स्वर तेज़ होते गये। इनमें भी अब राजनीतिक चेतना का प्रसार होने लगा है। आज वह अपने हक और अधिकारों के प्रति सचेत होता हुआ दिखलाई पड़ रहा है। नाटक में इन्हीं सब परिस्थितियों का चित्रण किया गया है। नाटक में अनजाने शहर में अपने साथ लाया गया पोस्टर आदिवासी मजदूरों की जीवन में क्रांतिकारी परिर्वतन ला देता है। जब वह पोस्टर सभी जगह चिपका मिलता है तो मजदूरों का मालिक तिलमिला जाता है। वह हक़ीक़त को जानने का प्रयास करता है। वह अपने मजदूरों से पूछता है— “बोलो कौन लाया यह पोस्टर? किसने कहा यहाँ चिपकाने को? बताओ, हरामज़ादो, नहीं तो खाल उघेड़कर रख दूँगा, तुम्हारी। पोस्टर लगाते हैं साले। बताओ, कौन नेता घुस आया है इस गाँव में? कौन बरगला रहा है तुम लोगों को?’’10

पटेल को लगता है कि मजदूरों में अब राजनीतिक जागरूकता आ रही है वो अब संगठित होने लगे है। वे शोषण की हदों का डटकर मुकाबला करने को तैयार हो रहे हैं। अब यह राजनीतिक चेतना दूर तक भी जा सकती है। उसे डर लगता है कि इनमें से कहीं कोई नेता न उत्पन्न हो जाए। वह अदंर से नरमी खाता क्योंकि अब उसे लगता है कि पोस्टर में लिखी बातों से लोगों के मन में डर दूर होने लगा है। वे अपने अधिकारों को जानने लगे है। इस कारण से वह दबे स्वर में कहता है— “मैं जानता हूँ कि तुम लोगों को अड़चन है, महँगाई बढ़ रही है। ज़्यादा से ज़्यादा मैं पच्चीस पैसे बढ़ा सकता हूँ। इससे ज़्यादा एक दमड़ी भी नहीं। अगर मंजूर हो तो जाकर उस नेता से कहो कि वह इलाका छोड़कर चला जाए, वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।’’11 ताकतवर लोगों से निपटने के लिए वे सभी पोस्टर में लिखी बातों से क्रांतिकारी हो उठते है।

नाटककार ने नाटक में यह दिखाने का प्रयास किया है कि आज के समाज में शोषित तबकों को निरतंर दबाया जा रहा है। आदिवासी मजदूर अपने हक तथा अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं है। जब उन्हें अपनी ताकत का अहसास होता है तो वह बड़ी से बड़ी सत्ता को उलटने की क्षमता रखते हैं। समाज में असमाजिक तत्व हमेशा अराजकता फैलाते हैं। नाटककार की संगठित जनशक्ति के प्रति आस्था है। जनता की शक्ति के आगे ताकतवर शोषणकारी शक्तियाँ भी अपने आप को असहाय महसूस करती है। पोस्टर नाटक में इस सच्चाई को उजागर किया है कि एकजुट होकर लड़ने से सदैव सफलता की उम्मीद बँधी रहती है। पोस्टर नामक नाटक अवसरवादी राजनीति, भ्रष्टतंत्र तथा आम आदमी की राजनीति के प्रति बढ़ती उदासीनता के साथ ही जनमानस में सत्ता के विरुद्ध तीखा तीव्र आक्रोश तथा राजनीति के प्रति उदासीनता रखने वाले समाज को जगाने का प्रयास भी करता है। नाटक में शोषणकारी शक्तियों के विरुद्ध संगठित विरोध का समर्थन किया गया है।

नाटककार ने लोकतंत्र के महत्व को पहचाना है। लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था प्रकट की है। नाटक में किर्तनकार लोगों को अपने हक तथा अधिकारों के प्रति सचेत होने को कहता है। वह मानता है कि लोकतंत्र में हम सब बराबर है। कोई छोटा बड़ा नहीं है। हताश निराश लोगों के मन में लोकतंत्र में भरोसा जगाने का काम करते हुए वह कहता है—

“कीर्तनकार तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे चारों ओर नादिरशाही मची है।

यह मत भूलो कि तुम एक स्वतन्त्र देश के वासी हो.......

साथी-1 जहाँ प्रजातन्त्र है,यानी डेमोक्रेसी है।

साथी-2 वाणी का स्वातन्त्र्य है...फ्री प्रेस है।

साथी-1 जहाँ सबको जीने का समान अधिकार है......

साथी-2 जहाँ प्रत्येक व्यक्ति कानून की दृष्टि में बराबर है।’’12

कुल मिलाकर कह सकते है कि कालजयी की तरह पोस्टर नाटक में भी राजनीतिक चेतना का तीव्र प्रवाह है। इन नाटकों में आज़ादी के बाद की विसंगितियों, विडंबनाओं के साथ लोकतंत्र के प्रति अविश्वास को नाटक के माध्यम से हमारे समक्ष रखा है। लोकतंत्र के लक्ष्य को अच्छी तरह से पहचाने का प्रयास नाटक में किया गया है।

आधुनिक शिक्षा जगत में फैले भ्रष्टाचार का भी शंकर शेष ने अपने नाटकों मे ज़िक्र किया है। गाँव के लोग आज भी मूलभूत शिक्षा से कोसो दूर है। आज के राजनेताओं के साथ धनाढ्य वर्ग के लोगों ने भी आम जनता को शिक्षा से दूर रखने की हेतु कई षडयंत्र रचते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि शिक्षा के अभाव में आम आदमी सामाजिक तथा राजनीति दोनों स्तरों पर पिछड़ता चला गया।

शंकर शेष ने ‘एक और द्रोणाचार्य’ नामक नाटक में शिक्षा जगत में बढ़ते राजनैतिक दबाव का वर्णन किया है जिसके चलते नौजवान पीढ़ी का भविष्य अधंकारमय हो गया। नाटककार ने शिक्षकों की उदासीनता पर तीखा कटाक्ष किया है। वह शिक्षक आर्थिक राजनैतिक दबावों के चलते हार मान लेते है। पौराणिक कथा का सहारा लेकर वह आज की व्यवस्था के चारण बन जाने वाले अध्यापक की त्रासदी को नाटक के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान की है। नाटक में आज की व्यवस्था में शिक्षक वर्ग में तेजी से पनप रही सुविधिजीवी प्रवृति के कारण व्यवस्था से जुड़ने की विसंगति, जिससे जाने-अनजाने देश की भावी पीढ़ी का भविष्य अन्धकारग्रस्त हो जाता है, का अकंन किया गया है। शिक्षा जगत में पक्षपातपूर्ण रवैये का उजागर किया गया है। नाटक में आचार्य द्रोण एवं एकलव्य की बातचीत में आचार्य की पूर्वाग्रस्तता स्पष्ट झलक रही है—

“द्रोणाचार्य : ठीक ही किया था (विराम) शास्त्रों के अनुसार मेरी विधा केवल ब्राह्मणों और क्षत्रियों के लिए है।

एकलव्य : लेकिन योग्यता और प्रतिभा?

द्रोणाचार्य : इन दोनों से व्यवस्था बड़ी है’’।13

आज के परिवेश में छात्र न्याय, भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम सब खोखली बातें लगती है। नाटक में इस बात को उजागर किया गया है कि आज का शिक्षक भ्रष्ट व्यवस्था के आगे लाचार है तथा व्यवस्था के हाथों बिकने को अभिशप्त भी है। आज की उच्च शिक्षा व्यवस्था में राजनीति का प्रवेश एक बड़ी समस्या के रूप में उभरा है। इस राजनीतिक घुसपैठ ने शिक्षा में धांधली, भ्रष्टाचार को ज़्यादा बढावा दिया है। इस तरह स्वार्थ और राजनीति के इस खेल में पिसने वाले छात्र-वर्ग का अन्धकार ग्रस्त एवं उदेश्यहीन जीवन को दिखाकर कर इसके लिए दोषी-राजनीतिज्ञों, शिक्षक-वर्ग एवं तटस्थ की भूमिका धारण करने वाले समाज से जवाब माँगा है।

इस प्रकार शंकर शेष के नाटकों में राजनीति को अपने नाटकों का प्रमुख आधार बनाया है। राजनीति में अवसरवादिता, धर्म के राजनीतिकरण, खोखले नारों, नेताओं की व्यभिचारिता और गाँधीवादी मूल्यों मे आई गिरावट, नेताओं की हक़ीक़त पर अपने नाटकों के पात्रों के ज़रिये नाटककार ने ज़बरदस्त कटाक्ष किया है। इन नाटकों में राजनीति के दबावों को स्वीकार किया गया है। राजनीतिक व्यवस्था के खोखले ढांचे की पोल खोलने का प्रयास किया गया है। लोकतन्त्र की वर्तमान व्यवस्था पर आक्रमण करने के साथ साथ उन्होंने लोकतन्त्र के प्रति आस्था भी बनाए रखी है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि राजनीतिक चेतना की दृष्टि से शंकर शेष के नाटकों का साठोत्तर हिन्दी नाट्य साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान है।

संदर्भ-सूची
1. विचारधारा और साहित्य - प्रो. नित्यानंद तिवारी, संपा. राज कुमार शर्मा, पृ.123
2. भारत में राजनीति - रजनी कोठारी, पृ. 222.
3. कालजयी - शंकर शेष, पृ. 24
4. कालजयी - शंकर शेष, पृ. 21
5. कालजयी - शंकर शेष, पृ.18.
6. कालजयी - शंकर शेष,पृ. 26.
7. कालजयी - शंकर शेष,पृ.33.
8. पोस्टर - शंकर शेष, पृ. 54-55.
9. पोस्टर – शंकर शेष, पृ. 23.
10. पोस्टर - शंकर शेष, पृ. 41.
11. पोस्टर - शंकर शेष, पृ. 43.
12. पोस्टर - शंकर शेष, पृ.18.
13. एक और द्रोणाचार्य - शंकर शेष, पृ. 50.

पुष्पा मीना
शोधार्थी, हिन्दी विभाग
दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली-110007.


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