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05.22.2009
 

जिसने ताउम्र अँधेरा सहा है
पुरु मालव


जिसने ताउम्र अँधेरा सहा है
करके रोशन वो जग को चला है

हादिसे से घिरे क्या तुम्हीं हो?
देख लो घर मेरा भी जला है

यूँ ही हर सू नहीं ये चरागां
ख़ून मेरा दियों में जला है

दे रहा है सज़ा दर सज़ा तू
कुछ बता भी मेरा ज़ुर्म क्या है

हम जिसको कर सके ना बयां ’पुरू’
वो ग़ज़ल ने बख़ूबी कहा है


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