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ISSN 2292-9754

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07.02.2016


सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की काव्य-चेतना

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की रचनाएँ नयी संभावनाओं की तालाश है। विशेष तौर पर उनकी कविताएँ जड़ अवधारणाओं, मृत सिद्धांतों और थोथे मताग्रहों के पाखंड को खंड–खंड करती हुई समाज को सच्ची दिशा दिखा पाने में सक्षम हैं। सर्वेश्वर के साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर अनेक शोध कार्य हुए हैं, लेकिन सर्वेश्वर की कविताओं पर सामाजिक सरोकार की दृष्टि से कोई काम नहीं हुआ है। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना नयी कविता में मुक्तिबोध के बाद सबसे प्रगतिशील कवि रहे हैं, लेकिन अभी तक हिंदी साहित्य में उनकी पहचान प्रगतिशील कवि के रूप में कम और अस्तित्ववादी कवि के रूप में ज़्यादा रही है।

साधारण तौर पर नयी कविता, हिंदी कविता में प्रयोगवाद के बाद विकसित नए मूल्यों एवं नए शिल्प की पैरवी करने वाली नवीन धारा को कहा जाता है। अज्ञेय द्वारा सम्पादित "तारसप्तक"(१९४३), "दूसरा सप्तक"(१९५१), "तीसरा सप्तक"(१९५९) ने नयी कविता आन्दोलन को आगे बढ़ाया। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद "दूसरा सप्तक" के प्रकाशन से पता चलता है कि प्रयोगवादी साहित्यिक मूल्यों और विचारों का रूपांतरण नयी कविता के रूप में हुआ। प्रयोगवादी कविता में विलक्षणता के नाम पर जो अजीबोग़रीब शिल्पगत प्रयोग हुए थे, नयी कविता में ऐसे प्रयोगों में थोड़ी कमी आई है लेकिन यहाँ भी शिल्प और बुद्धि पक्ष प्रधान और भावना पक्ष गौण रहा है। तारसप्तक के कवि-आलोचक गजानन माधव मुक्तिबोध का आरोप है कि "दूसरा सप्तक" में पहले सप्तक की तरह "सामाजिक क्रान्ति के प्रति निष्ठा, मनुष्य की उन्नायनशीलता के प्रति विश्वास और आस्था दृष्टिगोचर"1 नहीं होता है। "दूसरा सप्तक" के कविताओं में आधुनिक भावबोध के नाम पर लघुमानववाद, कुंठावाद, क्षणवाद, दुखवाद, व्यक्ति स्वातंत्र्य, समाज निरपेक्ष वैयक्तिकता, अलगाव, पराजय, पलायन, उदासीनता, अकेलेपन की पीड़ा, मृत्यु, वेदना, घुटन, निराशा, भय, शंका, भोगा हुआ यथार्थ, इतिहास मुक्तता आदि अनेक प्रवित्तियाँ प्रचलित हैं। साथ ही पश्चिमी आधुनिकतावादी, प्रतीकवादी, बिम्बवादी, प्रभाववादी और रूपवादी आंदोलनों और सिद्धांतों की तर्ज़ पर रचनाएँ होती रहीं। इसके साथ इलियट, लारेंस, स्पेंडर, पास्तरनाक, काफ्का, कामू, दोस्तोवस्की, सात्र, फ्रायड, एडलर और युंग की भी चर्चा होती रही। यह सिलसिला "तीसरा सप्तक"(१९५९) में भी जारी रहता है।

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना नयी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर रहे हैं। "तीसरा सप्तक" में कवि रूप में स्थान पाने पर इनकी चर्चा ज़ोर पकड़ती है। जिस समय से सर्वेश्वर के व्यवस्थित काव्य जीवन का आरम्भ होता है, उस समय ज्यां पाल सात्र के अस्तित्ववादवादी तथा फ्रायड के मनोविश्लेषणवादी जीवन-दृष्टि की निराशाजनक परिणति ने हिंदी के रचनाकारों में परंपरा के प्रति अश्रद्धा उत्पन्न कर दी। यह अश्रद्धा दिशा–दृष्टिहीन होने के कारण रचानाकारों में स्वार्थवादिता, अस्तित्वहीनता, खोखलापन, नपुंसक आक्रोश और बंध्या खीझ जैसी कुंठाएँ जन्म दे रही थी। नए कवियों के संदर्भ में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने "तारसप्तक के कवियों की सामाजिक चेतना" में स्वीकार किया है- "उनकी चेतना पर समकालीन संकट का दबाव बढ़ रहा था। परिणामत: उनकी कविताओं में भी दमित इच्छा, कुंठा, हताशा, क्षोभ, आदि का स्वर मिलने लगा।"2 इसके बावजूद सर्वेश्वर तीसरे सप्तक के ऐसे कवि थे जो निराशा और क्षय को स्वीकृति देने को तैयार नहीं थे। उनका रचनाकार अपने युग की जड़ पारंपरिक चेतना के ख़िलाफ़ आवाज़ तेज़ करता है। "तीसरा सप्तक" में प्रकाशित कविता "सूखे पीले पत्तों ने कहा" में वे कहते हैं-

"लेकिन उनसे कौन कहे
प्रगति, पिछलग्गूपन नहीं है
और जीवन आगे बढ़ने के लिए
दूसरों का मुँह नहीं ताकता।"3

सर्वेश्वर में परिवेशगत सजगता अपने समकालीनों से अधिक पैनी व तीव्र है। रघुवीर सहाय और सर्वेश्वरदयाल सक्सेना सरीखे प्रमुख कवि, जो कि अज्ञेय से अपनी निकटता के दौर में भी सामाजिक रूप से जागरूक कविता लिख रहे थे, जल्दी ही अज्ञेय के प्रभामंडल से बाहर आ गये।

सर्वेश्वर की काव्य-यात्रा को उनके सामाजिक चेतना का क्रमिक विकास कह सकते हैं। कवि में सामाजिक सरोकार का विकास उर्ध्वगामी स्तर पर हुआ है। सर्वेश्वर की काव्य-यात्रा सन् १९४९-५० से शुरू होती है। उनके प्रथम काव्य संग्रह "काठ की घंटिया"(१९५९) में १९४९ से १९५७ तक की कवितायेँ संकलित हैं। आरंभिक रचनाओं में सर्वेश्वर के रोमानी रुझान और अस्तित्ववाद की झलकें मिलती हैं, लेकिन उसके समानांतर लोकजीवन की कवितायेँ भी लिखते हैं। "प्रेम नदी का तीरा", "बंजारे के गीत", "चरवाहे का युगल गान", "सुहागिन का गीत", "युग जागरण का गीत" और "संध्या का श्रम" पहले संग्रह में संकलित ऐसी कविताएँ हैं जिनमें लोकलय की मिठास सुरक्षित है। लोकचेतना से सम्पन्न मार्मिक पंक्तियाँ "संध्या का श्रम" कविता में है-

"बोलो मत डूबी रहने दो,
उसे अपने काम में –
देखो पसीना
सितारों-सा छलक आया है,
संध्या के इस श्रम ने
तुम्हें भी बुलाया है।
अपने-अपने घर में
श्रम के दिए बालो।"4

निराशा और अनास्था के दौर में लिखी गयी इस कविता में ताज़गी और अछूतापन दिखलाई पड़ता है और बाद की कविताओं में कवि ख़ुद को शोषित-प्रताड़ित जनता से जोड़ते हैं। सर्वेश्वर की विचारधारा को समझने के लिए आलोचक नन्द किशोर की यह टिपण्णी महत्त्वपूर्ण है – "सर्वेश्वर में अस्तित्ववाद और लोकवाद के बीच अंतर्विरोध है। शुरू में यह अन्तर्विरोध ढका रहता है, लेकिन धीरे-धीरे यह तीव्र होता है और ऐसा प्रतीत होता है कि अंत में लोकवाद क्रांतिवाद का रूप लेकर अस्तित्व के प्रभाव को समाप्त कर देता है।"5 सर्वेश्वर की साहित्य साधना निरंतर प्रगतिशील रही। उनके चौथे काव्य संग्रह "गर्म हवाएँ" में अस्तित्व-चेतना नहीं के बराबर है। जिस समय शासन सत्ता के "भेडिये" और "तेंदुए" निरीह जनता को अपना शिकार बना रहे हों, उस समय कवि सात्र और फ्रायड में आत्मलीन नहीं रह सकते। वे मशाल जलाकर जनता के साथ खड़े होंगे। इस संग्रह में वे खुद को यथार्थ के निकट बतलाते हुए घोषणा करते हैं –

"अब मैं कवि नहीं रहा
एक काला झंडा हूँ।
तिरपन करोड़ भौहों के बीच मातम में
खड़ी है मेरी कविता।"6

यहाँ कवि सच्चे अर्थों में सामाजिक सरोकारों से रिश्ता बनाते है, जिसका आगे की कविताओं में विकास हुआ है। "जंगल का दर्द" नामक संग्रह तक आते- आते कवि की चेतना में दर्द या व्यथा पैठ कर जाती है। यह अस्तित्ववादी दर्द न होकर क्रांतिकारी दर्द है, व्यवस्था के वहशीपन का दर्द। सर्वेश्वर की काव्य-यात्रा इस बात की गवाही देती है कि कवि का यथार्थबोध और समाजबोध निरंतर परिपक्व होता गया है। वस्तुत: सर्वेश्वरदयाल की काव्य-यात्रा एक स्पष्ट रेखा है।

डॉ. रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक "नयी कविता और अस्तित्ववाद" में यह स्थापित किया है कि नयी कविता में अस्तित्ववाद का गहरा प्रभाव है। इसी क्रम में वे अस्तित्ववाद से प्रभावित अज्ञेय, धर्मवीर भारती, जगदीश चतुर्वेदी, इत्यादि कवियों के साथ सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का भी नाम लेते हैं। डॉ. शर्मा की यह स्थापना सर्वेश्वर की आरम्भिक कविताओं के संदर्भ में है। बाद की कविताओं में कवि की उर्ध्वगामी प्रगतिशील चेतना को लक्षित करते हुए डॉ. रामविलास शर्मा कहते हैं- "सातवीं और आखिरी क़िस्म में वे रचनाये हैं जो पुराने छायावाद, उत्तरकालीन छायावाद आदि- आदि से मुक्त हैं, रूमानी परम्परा से सम्बद्ध होते हुए भी मौलिक हैं, हिंदी छायावाद के लिए नयी हैं। बच्चे जिस तरह से सपने देखते हैं, यथार्थ संसार को जिस तरह से सपने में मिला देते हैं, वैसे ही कल्पना सर्वेश्वरदयाल की अनेक कविताओं में है। यह यथार्थ को मोहक आवरण से ढकने वाली कविता नहीं है, यथार्थ से खेलने वाली, उसे सर के बल उलटकर देखने वाली काव्य के लिए सार्थक कल्पना है।"7 स्पष्ट है कि "छायावादी कल्पना" और सर्वेश्वरदयाल की "नयी यथार्थवादी एवं काव्य के लिए सार्थक कल्पना" में बुनियादी अंतर है। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का सरोकार समाजधर्मी था।

सन्दर्भ–सूची

1. मुक्तिबोध, गजानन माधव, "छायावाद और नयी कविता", नेमिचंद्र जैन (सं), "मुक्तिबोध रचनावली-5", राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण,1985, पृष्ठ-312
2. प्रसाद, डॉ राजेंद्र, "तारसप्तक के कवियों की सामाजिक चेतना", वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली,1987, पृष्ठ- 11
3. सक्सेना, सर्वेश्वरदयाल, "सूखे पीले पत्तों ने कहा", अज्ञेय(सं), "तीसरा-सप्तक", भारतीय ज्ञानपीठ, काशी,1959, पृष्ठ-350
4. सक्सेना, सर्वेश्वरदयाल, "संध्या का श्रम ", वीरेंद्र जैन(सं), "सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ग्रंथावली- 1", वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2004, पृष्ठ-62
5. नंदकिशोर, "कविता की मुक्ति", वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, द्वितीय संस्करण, 1996, पृष्ठ-62
6. सक्सेना, सर्वेश्वरदयाल, "गर्म हवाएँ", वीरेंद्र जैन(सं), "सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ग्रंथावली-1", वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली,प्रथम संस्करण, 2004, पृष्ठ-307
7. शर्मा, डॉ रामविलास, "नई कविता और अस्तित्ववाद", राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला छात्र संस्करण,1993, पृष्ठ-75

पूर्णिमा रजक
सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग
सावित्री गर्ल्स कॉलेज, कोलकाता
पता- 54/1, एल, एन, आटा रोड
चाम्पदानी, हुगली-712222
मो. 09681942058
ई-मेल – purnimarajak20@gmail.com
Purnima Rajak
Assistant Professsor in Hindi
Savitri Girl's College
Date of Birth - 03,NOV,1976
Mb- 09681942058
E-Mail: purnimarajak20@gmail.com


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