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04.29.2012

आशा बर्मन की प्रथम पुस्तक "कही-अनकही" के संदर्भ में

आशा बर्मन की प्रथम पुस्तक "कही-अनकही" के संदर्भ में:-

Kahi Ankahi

प्रियानुजा हे आशा बर्मन।
सदा सौख्ययुत् होवे क्षण-क्षण।।
1
"कही-अनकही" नामक सुन्दर,
प्राप्त हुआ है काव्य-संकलन।
हर कविता मोहक प्रसून है,
पुस्तक मानो कविता-कानन।
व्यक्त हुआ है सहज भाव से,
कवियित्री का शुचि अन्तर्मन।।
2
भाषा सुन्दर सुलभ सुहानी,
कहता है हर शब्द कहानी।
पत्नी, माता, मित्र, सेविका,
व्यक्त हुई है कहीं पे नानी।
नारी के सब रूप हैं इसमें,
कहीं प्रफुल्लित कहीं पे उन्मन।।
3
है संदेश भरा जीवन का,
इसकी हर कविता है सुन्दर।
गीत, अगीत, मुक्त कविता है,
विविध रसों के बहते निर्झर।
भले सुन चुका हूँ मैं इनको,
झाँक रहा सर्वत्र नयापन।।
4
मेरी बात मान कर, मेरी
इच्छा को फलवती बनाया।
कविताओं को एकत्रित कर,
लाकर है एक ठाँव बिठाया।
शुभकामना समेत बधाई,
शुभ हो तुमको प्रथम प्रकाशन।।
5
जो हो गई प्रकाशित जग में,
कविता कभी नहीं मरती है।
कवियों के तन मर - मर जाते,
कविता किन्तु अमर रहती है।
लिखती रहो सुष्ठु कवितायें,
जब तक है जीवन में जीवन।।

ओकोई 19.1.2012
              अनुजावत् श्रीमती आशा बहिन जी ! सस्नेह नमस्ते।
            आपका प्रथम काव्य-संकलन "कही-अनकही" प्राप्त हुआ। पढ़कर प्रसन्नता का पारावार लहरा उठा। इस शुभ अवसर पर हम दोनों ( आदेश-दम्पति) की बधाई स्वीकार कीजिये। कविता लिखना आपका पैतृक गुण भी है। आपकी गणना टोरोंटो की प्रतिनिधि काव्य - सर्जकों में की जाती है। अतएव आपके काव्य-संकलन की आवश्यकता थी। आपकी काव्य-साधना के पीछे आपके पतिदेव का भी प्रचुर सहयोग है। तदर्थ वे भी सराहना के पात्र हैं। ईश्वर से प्रार्थना है कि आप दोनों स्वस्थ एवं दीर्घायु हों तथा इसी प्रकार हिन्दी के सेवा कार्य में संलग्न रहें। टोरोंटो में हिन्दी - सर्जक समाज में व्याप्त संकीर्णताओं का निराकरण करना हम सबका कर्तव्य है। कवि की दृष्टि में न कोई छोटा होता है न कोई बड़ा। कवि सबका मित्र होता है, हितेच्छु होता है। वह जन-मंगल में ही स्वमंगल का अनुभव करता है। आप सब में मैंने इस प्रकार की सद्भावनाओं की व्याप्ति की अनुभूति की है। अतः भावावेश में आपसे कह गया। दीप्ति जी ने यद्यपि कवितायें अधिक नहीं लिखी हैं परन्तु जो भी लिखी हैं, वे श्लाघ्य हैं। अब केवल श्रीमती शैल शर्मा के काव्य-संकलन की प्रतीक्षा है। जहाँ तक मेरा अपना प्रश्न है मैं जीवन भर लिखते रहने के उपरान्त भी वह कुछ नहीं कह पाया हूँ, जो कहना चाहता हूँ। मेरी पूजा लगभग समाप्त होने पर आ गई है, अब आसन उठाना शेष है। मेरा एक पद हैः-

अब व्यर्थ में ही निज समय को मत गँवाइये।
पूजा समाप्त हो चुकी, आसन उठाइये।

आप से यही कहना है कि निरन्तर लिखती रहिये। आप सृजन के क्षेत्र में सफलता के क्षितिज छुयें, यही हमारी शुभकामना है। अरुणा बहिन जी तथा साहित्य - परिसर के सभी कवियों को मेरा नमन प्रदान कीजिये।

शुभेच्छु
आदेश-दम्पति


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