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ISSN 2292-9754

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12.27.2018


भिक्षां देहि

(माँ-भारती अपने पुत्रों से भिक्षा माँग रही है: समय का फेर!)

रीत रहा शब्द कोश,
छीजता भंडार,
बाधित स्वर, विकल बोल
जीर्ण तार-तार।
भास्वरता धुंध घिरी,
दुर्बल पुकार।
नमित नयन आर्द्र विकल,
याचिता हो द्वार-
'देहि भिक्षां,
पुत्र, भिक्षां देहि!'
*
डूब रहा काल के प्रवाह में अनंत कोश,
शब्दों के साथ लुप्त होते
सामर्थ्य-बोध।
ज्ञान-अभिज्ञान युक्तिहीन,
अव्यक्त हो विलीन।
देखती अनिष्ट वाङ्मयी, शब्दहीन।
दारुण व्यथा पुकार -
'भिक्षां देहि, पुत्र!
देहि में भिक्षां'
*
अतुल सामर्थ्य विगत,
शेष बस ह्रास!
तेजस्विता की आग,
जमी हुई राख
गौरव और गरिमा उपहास
बीत रही जननी, तुम्हारी, मैं भारती,
खड़ी यहाँ व्याकुल हताश
बार-बार कर पुकार -
'देहि भिक्षां,
पुत्र, भिक्षां देहि'!
*
शब्द-कोश संचित ये
सदियों ने ढाले,
ऐसे न झिड़को, व्यवहार से निकालो.
काल का प्रवाह निगल जाएगा
अस्मिता के व्यंजक, अपार अर्थ, भाव दीप्त,
आदि से समाज-बिंब
जिसमें सँवारे।
मान-मूल्य सारे सँजोये, ये महाअर्घ
सिरधर, स्वीकारो!
रहे अक्षुण्ण कोश, भाष् हो अशेष -
देवि भारती पुकारे
'भिक्षां देहि!
पुत्र, देहि भिक्षां!'
*
फैलाये झोली, कोटि पुत्रों की माता,
देह दुर्बल, मलीन भारती निहार रही.
बार-बार करुण टेर -
'देहि भिक्षां,
पुत्र, भिक्षां देहि!'


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