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ISSN 2292-9754

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01.23.2019


उस दौर से इस दौर तक : समीक्षा

उपन्यास का शीर्षक: उस दौर से इस दौर तक
(चार पीढ़ियों की संघर्षपूर्ण गाथा)
प्रथम संस्करण: (2018)
ISBN NO: 978-93-85325-19-9
लेखक: डॉ. मनोज मोक्षेंद्र
प्रकाशक: राज पब्लिशिंग हाउस,
पुराना सीलम पुर (पूर्व), दिल्ली—110031
कुल पृष्ठ संख्या: 185
पुस्तक का मूल्य: 495/-रुपए
उपन्यासकार का संपर्क-सूत्र: drmanojs5@gmail.com

उपन्यासकार डॉ. मनोज मोक्षेंद्र हिंदी कथा-साहित्य में अत्यंत सक्रिय लेखक हैं। उन्हें हम किसी पूर्ववर्ती कहानी की लीक से नहीं जोड़ सकते हैं, न ही यह घोषित कर सकते हैं कि वे किसी ‘वाद’ या ‘सोच’ से प्रभावित होकर अपना कथानक बुनते हैं। जो कुछ समाज में घटित हो रहा है, उसे ही वे अपनी दिलचस्प भाषा-शैली में पेश करते हैं। बहरहाल, मोक्षेंद्र की कहानियाँ अपने-आप में बेमिसाल होती हैं। प्रचार-प्रसार तथा मंचों से दूर रहने के बावजूद, मोक्षेंद्र के पाठकों और चहेतों की संख्या बेशुमार है। साहित्यिक प्रपंचवाद और साहित्यिक मठाधीशों से परहेज़ करने वाले इस कथाकार की इंटरनेट मीडिया पर उपस्थिति से भी भारी संख्या में लोग अवगत हैं। हम उन्हें पिछले पच्चीस वर्षों से हिंदी कथा साहित्य में एक विशिष्ट लेखक के रूप में पढ़ते आ रहे हैं।

अस्तु, मोक्षेंद्र अपनी कविताओं, नाटकों, व्यंग्यों के साथ-साथ अपनी कहानियों में भी जीवन के विविध पक्षों पर लगातार लिखते रहे हैं। उनके पिछले पाँच कहानी-संग्रहों में हमने देखा है कि उनकी पैनी दृष्टि समाज में फैली विभिन्न कुवृत्तियों, कुरीतियों, दुर्व्यवस्थाओं, अंधविश्वासों तथा मनुष्य और समाज के लिए हानिकर बातों पर रही है। यहाँ यह कहना समीचीन होगा कि उनकी रचनाधर्मिता हमेशा सोद्देश्य रही है। किसी लक्ष्य से अनुप्राणित होकर ही वे अपनी लेखनी को सक्रिय करते हैं।

यहाँ हम उनके इसी वर्ष प्रकाशित उपन्यास “उस दौर से इस दौर तक” की अंतर्वस्तु और कथानक पर प्रकाश डालना चाहते हैं। यह उपन्यास सत्ताईस अध्यायों में विभक्त है और प्रत्येक अध्याय का एक उपयुक्त शीर्षक है जो संबंधित अध्याय की कथा-सामग्री पर प्रकाश डालता है। यदि हर अध्याय को अलग-अलग पढ़ा जाए तो वह अपने-आप में एक पूर्ण कहानी लगती है।

उल्लेख्य है कि इस उपन्यास का कथानक एक वृहत कालखंड को स्वयं में समाहित करता है। स्वतंत्रता-संघर्ष के उत्तरवर्ती काल से लेकर आज तक के दौर तक बदलते जीवन के विभिन्न प्रतिरूपों को वर्णित करने में उन्हें विशेष सफलता मिली है। बदलते इंसानी फ़ितरत को उन्होंने बख़ूबी हमारे सामने रखा है। स्वतंत्रता की बलि-वेदी पर जो पीढ़ी अपना सर्वस्व लुटा चुकी है, उसका आशानुरूप प्रतिदान उसकी आने वाली संततियाँ देने में पूरी तरह विफल रही हैं। वे संततियाँ आपत्तिजनक बातों में संलग्न होकर आज़ादी के रणबांकुरों द्वारा शिद्दत से कमाई गई आज़ादी को व्यर्थ गँवा चुकी हैं। जो चुनिंदा रणबांकुरे आज़ादी के कुछ दशकों के पश्चात वयोवृद्धि हो गए, उनकी हालत और भी शोचनीय हो गई है। स्वातंत्र्योत्तर काल की किंकर्तव्यविमूढ़ पीढ़ी ने उनके श्रम के पुरस्कार के तौर पर उन्हें क्या दिया है—इस पर गहनता से विचार करने की आवश्यकता है। रक्तसंबंधियों से विछोह, अपने ही घर से निष्कासन, वृद्धों में अपने भविष्य की चिंता, वृद्धावस्था के कष्टकर दौर में विधुरों और विधवाओं की दुर्दशा आदि ऐसे सवाल हैं जिन पर बहुत कम कथाकारों ने लिखा है।

उपन्यास के अनुशीलन से यह स्पष्ट है कि लेखक कोई चार पीढ़ियों के बीच आए वैचारिक परिवर्तनों को रेखांकित करना चाहता है जिसमें वे पूरी तरह सफल भी हैं। पर, इतना ही कहना पर्याप्त नहीं होगा। क्योंकि काल के प्रत्येक अग्रगामी क़दम के बढ़ने के साथ-साथ, इंसानी जज़्बात मरते जा रहे हैं। हर क़दम पर अहसास होता है कि हम मशीन हैं और हम सिर्फ़ ऐसे ही काम करेंगे जिससे यह मशीन चलती रहे और पूरी क्षमता से यह हमारी भौतिक ज़रूरतें पूरी करती रहे। असल बात यह है कि जज़्बात तो ख़त्म हो चुके हैं। इस उपन्यास में यांत्रिक मनुष्यों द्वारा जज़्बातों की नृशंस हत्या पर मोक्षेंद्र भावविभोर होकर चर्चा करते हैं और बार-बार पीड़ा से कराह उठते हैं। उपन्यासकार की दृष्टि में इस मानव समाज में गत सात-आठ दशकों से जो बदलाव आए हैं, उनसे दुनिया का भला क़तई नहीं हुआ है। इस संबध में उसका कहना है—

“बड़ी द्रुतता से इस परिवर्तनशील समाज के बारे में मैं यह नहीं कहता कि सनातनी प्रवृत्तियों के ख़िलाफ़ खड़े होने के कारण नवीनता कोई बुराई है; पर, इसे अतीत के अनुभवों के साथ सामंजस्य में अंगीकार किया जाना चाहिए और यह नहीं माना जाना चाहिए कि जो भी नई बातें आ रही हैं, वे पुरानी से बेहतर ही होंगी तथा उन्हें आत्मसात किया ही जाना चाहिए। इसलिए, मेरा पूरा जोर इस बात पर है कि इस उपन्यास के पाठक आत्ममंथन करें तथा किसी एक जीवनशैली का, चाहे वह आयातित हो या स्वयं द्वारा विकसित, वरण करने से पहले कई बार सोचें। यदि यह मान लिया जाए कि किसी व्यक्ति की जैविक गतिविधियाँ उस तक ही सीमित रहती हैं तो यह पूर्णरूपेण गलत है। प्रत्येक मनुष्य का जीवन दूसरों को एक दिशा तथा एक प्रकार की गतिशीलता प्रदान करता है जो अग्रगामी भी हो सकती है और पश्चगामी भी। अस्तु, अभिशप्त आधुनिकता के इस दौर में इन सभी बदलावों के बीच राष्ट्रीयता, मानवीयता और नैतिकता को धूमिल होने तथा हितकारी सांस्कृतिक तत्वों को मृत होने से बचाने की भरसक क़वायद की गई है।”

लेखक इस महत्वपूर्ण उपन्यास में एक बड़े पारिवारिक-सामाजिक फलक पर चिंतन करता है। मानव समाज में और ख़ासतौर से स्वातंत्र्योत्तर हिंदुस्तान में कुकुरमुत्ते की तरह कई अवांछित बातें विकसित हुई हैं। इनसे समाज का स्वस्थ ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो चुका है। मानवीयता के अपरदन के कारण यह समाज एक निर्जीव कंकाल की तरह होकर रह गया है। स्त्री-पुरुष के संबंध के बारे में मोक्षेंद्र जितना खुलकर इस उपन्यास में बोलते सुने जा रहे हैं, वैसा उन्मुक्त स्वर इस विषय पर किसी लेखक द्वारा अभी तक नहीं सुना गया है। आपत्तिजनक स्त्री-पुरुष संबंधों के बारे में इतना खुलकर बोलने वाला लेखक कहाँ मिलता है? अब तो क़ानून भी दांपत्य नैतिकता और निष्ठा की हत्या करने पर तुला हुआ है। समाज को खुल्लम-खुल्ला भोगवादी बनाने पर तुला हुआ है। स्त्री और पुरुष को यौन-व्यवहार में पूर्ण स्वच्छंदता देने का मतलब है कि सभ्यता-संस्कृति को विनाश की ओर ले जाना और सामाजिक ढाँचे को पूरी तरह ध्वस्त कर देना। लोकप्रिय हो चुके लिव-इन-रिलेशन और समलैंगिकता जैसे दो ‘फ़ैशन’ मौजूदा पारिवारिक व्यवस्था पर भीषण कुठाराघात कर रहे हैं। यौन-तुष्टि और धनोपार्जन ही नई पीढ़ी का लक्ष्य रह गया है। प्यार में गंभीरता और पवित्रता तो देखने को नहीं मिलती है। इसी वजह से देह-व्यापार भी दिनचर्या का हिस्सा बनता जा रहा है जिसे कमोवेश क़ानून की स्वीकृति मिल चुकी है। बहरहाल, अब इसे देह-व्यापार कहना भी उचित नहीं लगता क्योंकि इसमें दोनों पक्षों की मिलीभगत और रज़ामंदी होती है; यह व्यापार नहीं रह गया है, बल्कि मौज-मस्ती का सुलभ स्रोत बनकर रह गया है।

मोक्षेंद्र इस उपन्यास में बड़े प्रयत्नलाघव के साथ मानव-समाज द्वारा कुसंस्कारों को खिला-पिलाकर संपोषित करने वाले तत्वों को भरपूर दुत्कारते हैं। अब वह कुसंस्कार चाहे अँग्रेज़ी शिक्षा द्वारा आई हो या अँग्रेज़ी शैली से अपनाए गए जीवन में बदलावों द्वारा। लेखक दांपत्य जीवन में आए अविश्वास और स्वार्थपरता पर भी घड़ों आँसू बहाता है तथा परिवार में अनुशासन के विलोपन पर दुःखी हो जाता है। सामाजिक सेहत के लिए जहाँ पति-पत्नी में विश्वास-रोपण एक आवश्यक तत्व है, वहीं परिवार में केंद्रीकृत अनुशासन के अभाव में पारिवारिक एकजुटता और अखंडता ख़तरे में आ गई है। लेखक स्त्रियों की स्वेच्छाचारिता पर भी आक्रोश से भरा हुआ है। प्रकृति के नियमों के अनुसार कोमलांगी स्त्री का स्वच्छंद रहने का मतलब है, उसे असुरक्षित बना देना। यही सत्य है और इस सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता। किसी स्त्री का जितना सहिष्णु और उदार पुरुष-साथी होगा, वह उतनी ही सुरक्षित होगी और मानव-सुलभ अधिकारों का उपभोग कर पाएगी। उपन्यास का नायक रंजनदास इसका जीता-जागता प्रमाण है। अधिकार देने का ढिंढोरा पीटकर स्त्री-समाज को सशक्त बनाने की जो नौटंकी आज खेली जा रही है, वह तो बस एक सियासी चाल है।

इस उपन्यास में हम देखते हैं कि लेखक ने प्रेम की तो परिभाषा ही बदल डाली है। प्रेम के स्थूल और मांसल रूप पर उसका नज़रिया विद्रोहपूर्ण है। अभौतिक और आत्मिक प्रेम ही, जिसमें शरीर न शामिल हो, वह साधन है जिससे समाज की महत्वपूर्ण इकाई, जिसे हम परिवार कहते हैं, अपना स्थायित्व बनाए रख सकता है। यहाँ परिवार की संकल्पना भी अलग ढंग से की गई है; पारंपरिक संकल्पना से अलग, किसी आश्रम या वृद्धाश्रम को भी पारिवारिक इकाई के रूप में मान्यता देने की वकालत लेखक करता है। जहाँ विश्वास, आस्था, सहानुभूति, परस्पर निर्भरता और पारस्परिक साहचर्य हो, वहाँ परिवार के होने की कल्पना उचित लगती है। अब परिवार में वैवाहिक संबंध द्वारा स्त्री-पुरुष के साथ-साथ रहने की जो परंपरा है तथा जिस आधार पर किसी इकाई को परिवार माना जाता है, वह विशेषता तो उपन्यास में वर्णित श्रवण वृद्धाश्रम में भी उपलब्ध है। विधुर और विधवा आपस में विवाह-संबंध स्थापित करके एक सुखद भावी जीवन की कल्पना इस उपन्यास में की गई है। अपने-अपने घरों से अपने ही बहू-बेटों द्वारा निष्कासित वृद्धों के भावी जीवन के निर्वाह के लिए विवाह एक समाधान हो सकता है जिसके जरिए उन उद्दंड बहू-बेटों को सबक भी दिया जा सकता है।

यहाँ लेखक परित्यक्त स्त्रियों, मुस्लिम परिवार में बहुपत्नी-विवाह के दुष्परिणामों को झेलने वाली औरतों, बलात्कृता, विवाहपूर्व गर्भवती हुई लड़की और दत्तक पुत्रियों की समस्याओं पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है। स्त्री-शोषण का एक पहलू यह भी है कि एक स्त्री ही दूसरे स्त्री के शोषण का कारण बनती है और गर्लफ़्रेंड बनकर पुरुष के साथ रहने वाली लड़की का कभी भला नहीं हो सकता। गर्लफ़्रेंड-ब्वॉयफ़्रेंड का आधुनिक फ़ैशन सिर्फ़ यौन-तुष्टि के लिए ही ज़ोर पकड़ता जा रहा है। उपन्यासकार पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियों की बढ़ती काम-पिपासा पर काफ़ी तंज़ कसता है। ऐसी समस्याओं को केंद्र में रखकर उपन्यासकार अपने पाठकों से इनके समाधान के लिए आग्रह भी करना चाहता है।

लेखक बेशक धर्म-निरपेक्ष है तथा वह धार्मिक आडंबरों की जमकर मखौल उड़ाता है। वह किसी ख़ास धर्म और मज़हब का पक्ष लेते हुए उसके बारे में कोई ख़ास संदेश देना नहीं चाहता है। इस उपन्यास में धर्म की दख़लंदाज़ी कई बार होती है क्योंकि, जैसा कि वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में स्वतः प्रमाणित है, धर्मांधता और मज़हबी उन्माद ने पूरी दुनिया को ख़तरे में डाल रखा है। लेखक किसी भी धर्म को मानवता के ख़िलाफ़ सिर उठाने की इजाज़त नहीं देता है। यदि धर्म से किसी की हित-साधना हो सकती है तो यह अनुमत्य है। लेकिन अगर मज़हबी कट्टरता से सिर्फ़ विप्लव और आतंक फैलता है तो इसे सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती है। उपन्यास का मुख्य पात्र रंजन, धर्म की दख़लंदाज़ी को तभी तक स्वीकार करता है, जब तक कि इससे उसका या किसी व्यक्ति का या पूरे समाज का हित होता है। रंजन इस उपन्यास का प्रमुख पात्र है तथा वह आदर्श समाज का ऐसा पुरुष-पात्र है जिससे सिर्फ़ सामाजिक हित की ही अपेक्षा की जा सकती है। लेखक समाज के हर पुरुष से रंजन जैसा बनने की अपेक्षा करता है; तभी अनेकानेक समस्याएँ सुलझ सकती हैं। वह भावुक, प्रकृति-प्रेमी और कोमल-हृदय व्यक्ति है जिसे स्वयं के बजाय दूसरों की ज़्यादा चिंता है, कम-से-कम उनकी चिंता तो वह हमेशा करता है जो कमज़ोर, विकलांग, दलित और शोषित हैं जिसका प्रमाण वह अपने ऑफ़िस में रहते हुए दे चुका है। बहरहाल, लेखक उसके माध्यम से पुरुष-विमर्श के लिए बौद्धिक समाज को आमंत्रित करना चाहता है। उसके सद्गुण ही उसकी कमज़ोरियाँ बन जाते हैं जिनका अनुचित लाभ स्त्रियों का एक संगठित समूह उठाता है। दकियानूस स्त्रियों का एक पूरा समूह, जिसमें उसकी पत्नी भी शामिल है, उसके और उसकी अच्छाइयों के विरुद्ध खड़ा है।

जहाँ तक उपन्यास में समाहित अंडरटोन का संबंध है, इसका केंद्रीय भाव अत्यंत प्रभावशाली, प्रेरक और सकारात्मक है जो जीवन को सोद्देश्य और समाजोचित ढंग से जीने का संदेश देता है। उपन्यासकार पूरे मानव-समाज की बेहतरी के लिए अकेला बांग देकर अंधी-बहरी जनता को जगाता हुआ नज़र आ रहा है। भाषा सुगठित और प्रांजल है। कथानक का विस्तार सोची-समझी रणनीति के अनुसार किया गया है और उपकथाओं के तंतुओं से बुना गया है। बुनावट में कहीं भी ढीलापन नहीं है। पाठकों के लिए वह विभिन्न स्थलों पर सबक और उपदेश देता हुआ भी नज़र आता है। पात्रों के मनोविज्ञान को भली-भाँति निरूपित करते हुए, वह उनके स्वभाव को रूपायित करता है। दरअसल, इस उपन्यास में मुख्य धारा से भटका हुआ एक पूरा समाज है जिसे दिशा-निर्देशित करने की कोशिशों के तहत एक सशक्त कहानी से रू-ब-रू कराया गया है। बेशक, लेखक अंततोगत्वा इस राष्ट्रीय समाज को बार-बार चेताने की पुरज़ोर कोशिश कर रहा है। जितनी बड़ी-बड़ी बातों और समस्याओं को यहाँ उजागर किया गया है, उस दृष्टि से यह उपन्यास बहुत ही छोटा है। निस्संदेह, मोक्षेंद्र ने इस उपन्यास में गागर में सागर भरने में बड़ी सफलता हासिल की है। इस बात की प्रशंसा तो ख़ुद पाठक ही करेंगे।

इस उपन्यास के बारे में हमें लेखक की भी राय ले लेनी चाहिए जो इस प्रकार है- यह उपन्यास इतिहास-सम्मत स्वतंत्रता-संघर्ष के एक उत्तरवर्ती कालखंड से आरंभ होकर वर्तमान तक आकर समाप्त तो हो जाता है; किंतु, भविष्य के लिए चिंतन का एक विस्तीर्ण परास भी छोड़ जाता है। उपन्यास के अनुशीलन से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि इसमें अभिकल्पित पात्रों और घटनाओं के प्रतिरूपों से हमारा साबका भविष्य में भी पड़ता रहेगा। हाँ, अब यह हमारे ऊपर है कि हम उन्हें अपने सामाजिक परिवेश में स्वीकार करते हैं या यह सोचकर उन्हें एक सिरे से ख़ारिज़ कर देते हैं कि इनसे हमारी सामाजिक समरसता और संस्कृति तहस-नहस हो जाएगी। हमें उनके बारे में गंभीरता से सोचने की ज़रूरत भी है। बहरहाल, इसमें चित्रित कुछेक पात्रों की तरह हमारी भावी संततियों को बनना होगा और समाज पर नकारात्मक प्रभाव छोड़ने वाले ज़्यादातर पात्रों को दरकिनार करना होगा। हमारे समाज में नासूर की तरह फैल रही उन प्रवृत्तियों और आचरणों की भर्त्सना भी करनी होगी जिनकी वज़ह से हमारी सामाजिक सेहत लगातार गिरती जा रही है।

कोई 300 पृष्ठों में सिमटे इस उपन्यास का कथानक वास्तव में बहुत विशाल है। इतने बड़े कथानक को इतने छोटे आकार में प्रस्तुत कर देना एक अद्भुत प्रयास है। लेखक कई-एक जटिल उपकथाओं को जोड़कर जो कहानी बुनता है, उसमें न तो कहीं दुरूहता है न ही अबोधगम्यता। उपकथाओं के तंतु मुख्य कथानक के साथ अविलगेय ढंग से जुड़े हुए हैं। बहरहाल, यहाँ यह टिप्पणी करनी भी ज़रूरी है कि यदि लेखक चाहता तो इतने बड़े कथानक पर कम से कम तीन खंडों में इस उपन्यास को प्रस्तुत कर सकता था। पर, उसने ऐसा नहीं किया। बजाय इसके उसने समयाभाव की पाठकीय समस्या का निदान करते हुए इसे बेहद दिलचस्प तरीक़े से इतने छोटे आकार में पेश किया। लेखक धन्यवाद का पात्र है।

(समाप्त)समीक्षक: प्रतीक श्री अनुराग,
प्रधान संपादक. 'वी-विटनेस',
नई दिल्ली/लखनऊ/वाराणसी।


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