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03.15.2009
 

कब तक
प्रताप नारायण सिंह


कब तलक भुस ढेर सा यूँ ही सुलगते जाएँगे
कायरों सा चोट खाते और बिलखते जाएँगे

राजपथ पर रंगरलियों सा समां काफ़ी नही
शत्रु के सीने में कब, बन डर उतरते जाएँगे

अब गलीचों के बिना चलने की आदत डाल लो
कल ज़मीं की ताप से छाले उभरते जाएँगे

ज़ख़्म पर जो लग रहे फिर ज़ख़्म, अब तरजीह दो
सब्र के साए में पक नासूर बनते जाएँगे

अहमियत बस खेल सारा जब तलक है चल रहा
अंत में राजा औ प्यादा साथ रक्खे जाएँगे

क्या फ़र्क पड़ता है अगर साँसों की गिनती घट गयी
ज़िंदगी गर ना रही लफ़्ज़ों में जीते जाएँगे


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