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05.19.2012


कोई न कोई चाहिए दुःख -सुख बँटाने में

कोई न कोई चाहिए दुःख -सुख बँटाने में
कोई अकेला रह नहीं सकता ज़माने में

वो समझता ही नहीं खुशियाँ परिंदों की
उसको आता है मज़ा उनको उड़ाने में

कितना मुश्किल होता है ए मेरे दोस्तो
जिद पे आया कोई भी बच्चा मनाने में

इतनी जल्दी वे कहाँ कहते हैं हाँ अपनी
दक्ष हैं जो लोग नित नखरे दिखाने में

जाने क्या थी बात उसमें हम न पाये भूल
यूँ तो कोशिश लाख की उसको भुलाने में

ऐसे भी हैं लोग दुनिया में बहुत सारे
जो बिता देते हैं उम्रें आजमाने में

'प्राण' मैं सोते हुए भी मुस्कराता हूँ
मेरे जैसा कौन होगा मुस्कराने में


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