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05.19.2012


चेहरों पर हों कुछ उजाले सोचता हूँ

 चेहरों पर हों कुछ उजाले सोचता हूँ
लोग हों खुशीओं के पाले सोचता हूँ

तन के कुछ काले जो होते दुःख नहीं था
लोग हैं पर मन के काले सोचता हूँ

ढूँढ लेता मैं कहीं उसका ठिकाना
पाँव में पड़ते न छाले सोचता हूँ

हो भले ही धर्म और मज़हब में झगड़ा
पर बहें न खूं के नाले सोचता हूँ

सावनी रुत है चपल पुरवाईया हैं
क्यों न छायें मेघ काले सोचता हूँ

’प्राण’ दुःख आये भले ही जिंदगी मैं
उमर भर डेरा न डालें सोचता हूँ


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