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ISSN 2292-9754

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01.01.2015


तीरगी से रोशनी का हो गया

तीरगी से रोशनी का हो गया
मैं मुक़म्मल शाइरी का हो गया

देर तक भटका मैं उसके शह्र में
और फिर उसकी गली का हो गया,

सो गया आँखों तले रख के उसे
और ख़त का रंग फीका हो गया

एक बोसा ही दिया था रात ने
चाँद तू तो रात ही का हो गया?

रात भर लड़ता रहा लहरों के साथ
सुब्ह तक 'कान्हा' नदी का हॊ गया......!!!!


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