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ISSN 2292-9754

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01.26.2019


स्वयं अपने दीपक बनो

गर मार्ग हो दुर्गम,
आत्मविश्वास से सुगम करो,
आलंबन की बैसाखी त्यागकर,
जीवन-नौका के पतवार बनो॥

साहस धैर्य समर्पण जिज्ञासा,
सद्विचारों में अनुरक्त हों,
सद्कर्म सद्व्यवहार सद्वृत्ति,
सद्संगति सद्‌भाव उद्दीपित करो॥

स्वज्ञान के आलोक से जग में,
अधिमान स्थापित करो,
तिमिर के क्षितिज में मनुज,
तुम स्वयं अपने दीपक बनो॥

गर जीवन की धारा में,
परिस्थितियों के चक्रवात बनें,
असफलता बार-बार,
प्रहार तुम पर करे॥

विचलित न हो तुम,
अपने मग से,
चाहे जितना भी,
कुसमय प्रहार करे॥

गतिशील रहो सदैव,
नव-गंतव्य की ओर,
हृदय में सद्कल्पनाओं,
का आधार रहे॥

क्योंकि इस जीवन में,
अवसर असीम हैं,
बस नेत्र सही से,
लक्ष्य पर सधे रहें॥

लक्ष्य से पहले न,
धीर धरो मनुज,
तुम स्वयं अपने दीपक बनो,
तुम स्वयं अपने दीपक बनो॥


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