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ISSN 2292-9754

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12.19.2015


यथार्थ बुनती कहानियाँ

समीक्ष्य पुस्तक: “उन्हा-थ्री” कहानी संग्रह
लेखक: डॉ. संदीप अवस्थी
मूल्य: 150 रुपए
प्रकाशक: कश्यप पब्लिकेशन, डीएलएफ गाज़ियाबाद

विमर्शों से लदी-फंदी रेडीमेड नकली कहानियों ने कथा साहित्य के पाठकों की आशा को तोड़ने का काम किया है। जड़ से कटी इन कहानियों के कारण पाठक और कथा साहित्य के बीच का सेतु जर्जर होता जा रहा। पाठकों का मन तब और भी ज़्यादा टूटता है, जब ऐसी कहानियाँ न सिर्फ एक के बाद एक आती जाती हैं बल्कि चर्चा में भी रहती, सराही भी जाती हैं, पुरस्कृत भी होती रहती हैं। यह सारा घालमेल मठाधीश, खेमेबाज और इनका गणित साध लेने वाले कथाकार मिल कर बरसों-बरस से करते चले आ रहे हैं। ऐसे में वो कथाकार हाशिए पर हैं, कहीं अँधेरे कोने में पड़े हैं जो लिख तो अच्छा रहे हैं, लेकिन इस गणित का फॉर्मूला उनके लिए अबूझ है। वह इसे हल नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए न चर्चा में आते हैं न सराहे जाते हैं, पुरस्कार का तो सवाल ही नहीं उठता। वैसे भी पुरस्कारों के लिए होने वाली जोड़-तोड़, धाँधलेबाजी के कारण पुरस्कार भी कब का अपनी अर्थवत्ता खो चुके हैं। इन सबके बावजूद जो अच्छा है वह अंततः एक दिन सामने आ ही जाता है। देर से ही सही पाठकों तक उसकी चमक पहुँच ही जाती है। सही मायने में यही चमक पाठकों को आशान्वित बनाए रखती है। उनके और साहित्य के बीच के जर्जर सेतु की मरम्मत करती रहती है। जब-तब ऐसी चमक बिखेरने वालों में एक प्रमुख नाम डॉ. संदीप अवस्थी का है। जिनकी रचनाएँ यथार्थ की दुनिया से निकलती हैं, जड़ से जुड़ी होती हैं। अपने समय, अपने परिवेश का बढ़िया स्पष्ट खाका खींचतीं हैं। समाज की तमाम विसंगतियों के प्रति लेखक के मन में गहरा विक्षोभ है। उनका यह विक्षोभ उनकी कहानियों में खुलकर मुखर होता है। उनके कहानी संग्रह “उन्हा थ्री” में संकलित कहानियों में समस्याओं को उठाया ही नहीं गया है बल्कि उनमें समाधान के संकेत भी छिपे हैं। सबसे बड़ी बात यह कि वह समस्याओं की जाँच पड़ताल करते हैं, शोध करते हैं, उसको अपने नज़रिए से तौलते हैं। फिर लिखते हैं।

र्व में उस विषय पर जो भी प्रचलित धारणा होती है, या किसी बड़े नामचीन विचारक के जो भी सिद्धांत, विचार हों उनसे प्रभावित हुए बिना लिखते हैं। इससे उनकी रचनाओं में मौलिकता की एक ख़ास चमक होती है। उदाहरण स्वरूप इसी संग्रह की कहानी “पास्को, सरकार और किसान” है। इसमें सरकार विकास के लिए जिस प्रकार कदम बढ़ाती है, भूमि अधिग्रहण से लेकर योजना की मंज़ूरी, कंपनियों की नीति और मीडिया के खेल के पूरे घालमेल को उजागर किया है। इस खेल में स्थानीय लोगों की बरबादी, उनकी तकलीफ़ों के मार्मिक चित्र हैं। साथ ही उनमें वक़्त के इस घालमेल से निपटने के लिए आग है। उसकी तपिश है। विकास का रथ कैसे और बढ़े इसको लेकर एक स्पष्ट नज़रिया भी है। ख़ासतौर से आदिवासियों की भूमि पर जिस प्रकार बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ नज़र लगाए हैं, विकास के नाम पर उनकी पूरी संस्कृति, पूरा अस्तित्व ही कैसे ख़त्म करना चाहती हैं इसका प्रभावशाली चित्रण है। ऐसे शोषण के ही कारण आदिवासी नक्सली हो रहे हैं। वह अब अपने शोषण को बरदाश्त नहीं करना चाहते। अब विकास अपनी शर्तों पर चाहते हैं। वो यह बरदाश्त करने को तैयार नहीं कि विकास ख़ून बहाता हुआ आता है। वह सहअस्तित्व के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहते हैं। यह कहानी इतनी प्रभावशाली है कि लगता है मानो किसी सच्ची घटना का पुनर्सृजन किया गया है। ख़ून नहीं समन्वयकारी विकास का ऐसा फ़ार्मूला प्रस्तुत किया गया है जो ऐसे विकास की योजना बनाने के लिए आधार बन सकता है। शिल्प की दृष्टि से भी कहानी में ताज़गी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इस विषय पर लेखक की जानकारियाँ एवं समझ बहुत गहरी एवं स्पष्ट है। इसलिए कहानी में कहीं कमज़ोर कड़ी नहीं दिखती।

संग्रह में अलग-अलग परिवेश की चौदह कहानियाँ हैं। पहली कहानी में देश में रिटायरमेंट के बाद पेंशन को लेकर व्यक्ति किस तरह त्रस्त हो जाता है। व्यवस्था उसे कैसे ख़ून के आँसू रुला देती है इसी बिंदु पर केंद्रित है। बड़ी मार्मिक इस कहानी में ऑफिसों में नई पीढ़ी की लापरवाही भरी कार्यशैली का बढ़िया दृश्य है। अगली कहानी “वेदिका” एक ऐसी समस्या को लेकर सामने आती है जिस पर बहुत ही कम ध्यान गया है। भ्रष्टाचार में डूबी व्यवस्था और बिल्डरों की साँठगाँठ का खामियाजा कैसे आमजन भुगत रहे हैं। उनका परिवार पलभर में कैसे अंधकार में डूब जाता है। इस एक छोटी सी कहानी में यह सब देखने को मिलता है। पिछले कुछ बरसों में लापरवाही से छोड़े गए बोरवेल्स ने बहुत से मासूमों की जान ली। सैकड़ों फ़ीट गहरे, संकरे पाइपनुमा इन कुँओं में गिरे मासूम बच्चों को निकालने की प्रक्रिया, उनका दर्दनाक अंत टीवी चैनल्स पर देखकर लोगों का मन द्रवित हो उठता था। भ्रष्ट व्यवस्था के प्रति विक्षोभ से भर उठता था। इसी मुद्दे पर केंद्रित यह कहानी मन को कहीं गहरे व्यथित करती है।

जीवन का सांध्य काल अब कितना भयावह हो चला है इसकी कटु सचाई है “चलो एक बार फिर अजनबी बन जाएँ” कहानी। पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण ने परिवार रूपी संस्था और उसके प्रति दायित्वों को निभाने का मानो माद्दा ही छीन लिया है। संवेदनहीनता, पत्थर हो चुके हृदय अब रिश्तों की संवेदनशीलता नहीं जानते। भावनात्मक लगाव का सरोवर कितना सूख गया है। इसकी एक बानगी इस कहानी में तब दिखती है जब अपनी माँ को ओल्ड एज छोड़ने आए बेटे से माँ कहती है। “बेटा मैं वहीं तुम्हारे घर के पिछवाड़े सर्वेंट क्वार्टर में रह लूँगी मुझे यहाँ मत छोड़ो।” लेकिन रिश्तों का ककहरा ही भूल चुके बेटे पर माँ की कातर स्वर में की जा रही याचना का भी असर नहीं होता। इतना ही नहीं समाज का एक और कड़वा सच सामने आता है कि बेटों द्वारा आऊट डेटेड और अनुपयोगी मान कर घर से बाहर फेंके गए ये माँ-बाप वहाँ जब फिर से अपने लिए कुछ शांति तलाशते हैं, किसी को अपने आख़िरी कुछ बरसों के लिए जीवन साथी बना लेने की सोचते हैं, तो यह बेटों को अपनी शान में बट्टा नज़र आता है। और वह उन्हें भोगी, बताने लगते हैं। अपमानित करते हैं। सुख के कुछ बनावटी पल ही सही, पा लेने की लालसा लिए माँ-बाप के पहले से ही टूटे हृदय अपनी संतानों का यह आघात नहीं सह पाते हैं। और यह दुनिया छोड़कर चल देते हैं।

संग्रह की इन कहानियों में इक्कीसवीं सदी में झूठी शान, संस्कृति के कारनामों, आला स्तर पर भ्रष्टाचार की जाँच का गोरखधंधा, फाइलें जलाने के लिए बिल्डिंगों में ही आग लगवाने, रिश्वतखोरी, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मायाजाल, दांपत्य जीवन की बढ़ती उलझनों, छात्र जीवन के मोहक रिश्तों, प्यार भरी यादों आदि के साथ-साथ लिव इन रिलेशन, यौन संबंधों की नई-नई सीमाओं, और बाबाओं के कृपा बरसने के पीछे के जो खेल सामने आए हैं उसके भी पीछे चल रहे एक और खेल, बॉलीवुड के छिपे सच का भी बहुत सटीक ख़ुलासा है कि कैसे एक वर्ग विशेष के माफ़ियाओं का बॉलीवुड में एकछत्र गुंडाराज है। फंड, स्टोरी, कलाकारों के चयन, डिस्ट्रीब्यूशन आदि सब में उनकी रंगाबाजी चलती है। वर्ग विशेष के ही लोगों को आगे बढ़ने दिया जाता है।

संदीप अवस्थी की लिव इन रिलेशन पर केंद्रित कहानी की नायिका प्रेमचंद की “मिस पद्मा” कहानी की नायिका से आगे इस रिश्ते को एक नए रास्ते पर ले जाती है। “मिस पद्मा” की नायिका जहाँ रिश्तों की परिणित में बच्चे को भी जन्म देती है। और साथी द्वारा त्याग दिए जाने पर बच्चे की ज़िम्मेदारी से मुँह नहीं मोड़ती। वहीं संदीप की कहानी “सागर तट” की नायिका रिश्तों को विवाह संस्था के रास्ते पर ले जाने के ख़िलाफ़ तो है ही है। बच्चे भी नहीं पैदा करना चाहती। क्योंकि उसे अपने फ़िगर की चिंता है, बच्चे को जन्म देने की प्रक्रिया से गुज़रना उसके लिए असंभव है। इसलिए वह साथी के आग्रह पर बच्चे गोद ले लेने तक सहमति जताती है। “चोलामाटी का” की कहानी एक समय देशभर में चर्चित रहे चिकित्सक दंपत्ति द्वारा बेटी-नौकर की हत्या कांड का पुनर्सृजन सी लगती है। यह कहानी वास्तव में हमारे समाज के उन लोगों का सच है जो यौन तृप्ति के लिए कोई भी कदम उठा सकते हैं। परिणाम की सोचना वह जानते ही नहीं। “हंस” पत्रिका के अप्रैल 1933 के अंक में प्रेमचंद की एक कहानी “बालक” छपी थी जो बाद में मानसरोवर-2 में भी संकलित की गई कि नायिका संबंधों में असंतुष्टि के चलते एक के बाद एक तीन पतियों को अल्प समय में ही छोड़ देती है। चौथे व्यक्ति से शादी के छठे महीने में ही कहीं और जाकर पति से छिपकर बच्चे को जन्म देती है। समाज की तरेरती आँखें उसे डरा नहीं पातीं। लेकिन “चोलामाटी का” कहानी के दंपत्ति एक ही घर में रह कर भी एक नहीं हैं। दोनों अनेक से संबंध बनाते हैं। अपने साथी घर भी ले आते हैं। किशोर बच्ची, नौकर से उनका यह उन्मुक्त स्वच्छंद आचरण नहीं छिप पाता। वह भी बहकते हैं। ऐसे में दंपति की नज़र जब उन पर पड़ जाती है तब उनका आदिम स्वभाव उग्र हो उठता है। अपनी ही बच्ची, नौकर की निर्ममता से हत्या कर देते हैं। इधर कुछ दशकों में हमारा समाज कहाँ से कहाँ चला गया है लेकिन इज़्ज़त की झूठी ऐंठ में बच्चों का भी क़त्ल आसान है।

“खेल” कहानी बड़े दिलचस्प ढंग से देश में विभिन्न धार्मिक गुरुओं के धंधे के खेल और खेल के पीछे चल रहे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के खेल का ख़ुलासा करती है। कि आख़िर बात क्या है कि एक धर्म के गुरु तो एक-एक कर जेल जा रहे हैं। बाकी की करतूतें सामने आने पर भी उन्हें छुआ भी नहीं जा रहा है। धर्मांतरण की अंतरराष्ट्रीय राजनीति की बखिया इस कहानी में बखूबी उधेड़ा गया है।

संग्रह की इन सभी कहानियों में लेखक जीवन, समाज की बहुत सी बातों को अपने अंदाज़ में कहता है। इन्हें सच का पुनर्सृजन कहना ही ज़्यादा उपयुक्त है। प्रसिद्ध कथाकार डॉ. सुश्री शरद सिंह कहतीं हैं कि “संदीप की कहानियाँ जीवन के समसामयिक सच को पाठकों के और करीब लाने में सक्षम हैं।”


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