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ISSN 2292-9754

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10.07.2017


रात का रिपोर्टर और आज का रिपोर्टर

समीक्ष्य पुस्तक: रात का रिपोर्टर
लेखक: निर्मल वर्मा
प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ,
18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली
पृष्ठ: 183

A reporter should care for the facts and the truth will take care of itself (एक रिपोर्टर को तथ्यों की परवाह करनी चाहिए और जहाँ तक सच की बात है तो सच तो अपनी परवाह कर ही लेगा।) लंदन में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के लिए एक समय रिपोर्टिंग करने वाले विख्यात उपन्यासकार निर्मल वर्मा एक रिपोर्टर के लिए इस सिद्धांत पर चलने की अपेक्षा रखते थे। अपने चर्चित उपन्यास ‘रात का रिपोर्टर’ में उन्होंने इसका बढ़िया ख़ाका खींचा है कि उसे कैसे-कैसे रास्तों से गुज़रना पड़ता है और किन रास्तों से गुज़र कर वह आमजन के प्रति अपने कर्त्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन कर सकता है।

दो दशक पहले 1989 में लिखे उनके इस उपन्यास की चर्चा उनकी पुण्य तिथि के इस महीने में जब आज के रिपोर्टिंग जगत के संदर्भ में हम करते हैं तो स्थितियाँ थोड़ी बहुत नहीं व्यापक स्तर पर बदली नज़र आती हैं। तथ्यों को जानने के लिए निर्मल वर्मा जिस प्रतिबद्धता की अपेक्षा रखते थे और जो उस समय नज़र भी आती थी क्या वैसी प्रतिबद्धता तथ्यों के लिए प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आज भी है? क्या आज भी हमारे मीडिया जगत में रिपोर्टर को किसी विषय पर तथ्यों की जानकारी, समग्र शोध के लिए संबंधित स्थान पर पूरे संसाधनों एवं पर्याप्त समय के साथ भेजने की परंपरा बन पाई है? और हमारे रिपोर्टर भी उसी शिद्दत से तथ्यों के लिए तत्पर रहते हैं? आज का परिदृश्य यह दिखाता है कि आज की दौड़ती भागती दुनिया में हर कोई जल्दी में है। व्यक्ति हो या संस्था हर कोई। सब इतनी जल्दी में हैं कि सब कुछ तुरत-फुरत चाहिए। कहाँ समय है शोध के लिए, चीज़ों को गहराई से समझने के लिए। क्योंकि अर्थ लाभ के चक्कर में तो स्थिति यह बन गई है कि हर कोई सबसे आगे; सबसे पहले निकलना चाहता है।

अब तो मीडिया जगत का अभिन्न अंग यह जुमला ‘सबसे पहले हमने दिखाया, सबसे पहले हमने बताया’ लोगों के बीच हास्य या तंज के तौर पर प्रयोग होता है। उपरोक्त बात को छेड़ने पर जवाब यह मिलता है कि अस्तित्व में बने रहने के लिए ज़रूरी है रेस में बने रहना, और रेस में बने रहने के लिए ज़रूरी है हर काम का तुरत-फुरत होना। क्योंकि ऐसा न होने पर आप हाशिए पर नहीं हाशिए से भी बाहर हो जाते हैं। ऐसे में क्या मतलब है शोध पर ज़ोर देने का, तथ्यों को जानने के लिए जुनूनी होने का, काम तो ऐसे भी चल रहा है न। वास्तव में इस स्थिति के तह में जाने की कोशिश करिए तो जवाब इस उपन्यास में ही मिल जाता है। इस स्थिति के बनने की नींव तब तक पड़ चुकी थी और शायद इसी को देखते हुए ही निर्मल ने दबी जुबान उपन्यास में यह कहने की कोशिश की है कि यदि पश्चिम जगत में ऐसा हो सकता है तो यहाँ क्यों नहीं। वह एक जगह साफ़ लिखते हैं कि ‘जानते हो, उस किताब को पढ़कर मेरे मन में क्या ख़याल आया था? मैंने सोचा, अगर अमरीका में कोई मैग़ज़ीन अपने एक रिपोर्टर को रूई के खेतिहरों पर रिपोर्ताज लिखने के लिए भेज सकती है, तो मैं भला तुम्हें क्यों आदिवासी इलाकों में नहीं भेज सकता।’

यह बात साफ़ संकेत दे रही है कि तत्कालीन मीडिया में तुरत-फुरत काम कर डालने की नींव पड़ चुकी थी और तब एक वर्ग ऐसा था जो पश्चिमी जगत के तर्ज़ पर तथ्यों पर पूरा ध्यान रखने का पक्षधर था। दरअसल बारीक़ी से देखा जाए तो तब की तरह आज भी एक वर्ग का ज़ोर इस बात पर है कि ठीक है कि तेज़ी हो लेकिन तथ्यों पर भी ध्यान बना रहे। निर्मल वर्मा ने जिन बातों को दो दशक पहले अपने इस उपन्यास के ज़रिए उठाया था वह बातें आज और भी तीखे रूप में प्रश्न कर रही हैं कि हम मीडिया के स्तर को और बेहतर बनाने के लिए प्रयास क्या कर रहे हैं?

कथा शिल्प की दृष्टि से उत्कृष्ट इस उपन्यास में तथ्यों के महत्व को बड़ी सहजता से रेखांकित किया गया है। कथा इतिहास में नई आधुनिकता बोध को और प्रगाढ़ करने वालों में शुमार निर्मल वर्मा के लेखन में पश्चिमी साहित्य की शैली का प्रभाव साफ़ दिखता है। जो सयास नहीं अनायास ही जान पड़ता है जबकि तत्कालीन हिंदी कथा साहित्य की शैली से उन्होंने अपने लेखन को न सिर्फ़ पृथक रखने की सफल कोशिश की बल्कि परिवर्तनों की बेधड़क सफल कोशिश कर एक ताज़गी लाने का प्रयास किया। उनकी इस कोशिश ने ही उनकी लेखन कला को अन्य से बिलकुल अलग रखा जिसे उनकी अपनी शैली कहा जा सकता है। जहाँ तक पश्चिमी प्रभाव का सवाल है तो इसकी मुख्य वजह यही कही जा सकती है कि अज्ञेय की तरह निर्मल भी लंबे समय तक विदेशों में रहे। सच तो यह है कि अपनी साहित्य साधना की शुरूआत भी सही मायने में उन्होंने तत्कालीन चेकोस्लोवाकिया के प्राग से शुरू की थी और कई देशों में लंबा वक़्त बिताया था। यह एक मुख्य वजह रही होगी कि वहाँ के परिवेश का उनके लेखन पर स्पष्ट प्रभाव दिखता है। कई मायनों में ‘रात का रिपोर्टर’ तब से आज ज़्यादा प्रासंगिक लगता है। इस विषय पर अभी हाल ही में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हुए कथाकार अमरकांत भी एक उपन्यास लिख रहे हैं, जिसके लिए यह कहना ग़लत न होगा कि वह भी निर्मल की बातों को नए संदर्भों में और आगे बढ़ाएँगे और आज के मीडिया की विद्रूपताओं को और अधिक उजागर करेंगे।


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