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07.17.2014


प्रतिबद्धताओं से मुक्त कहानियों का स्पेस
प्रदीप श्रीवास्तव

समीक्ष्य पुस्तक:
सुमि का स्पेस
(कहानी संग्रह)
लेखक: दयानंद पांडेय
प्रकाशक: जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि. विश्वास नगर
दिल्ली – 110032

अद्भुत पठनीयता दयानंद पांडेय की कहानियों की विशेषता है। उनके पाँचवें कहानी संग्रह ‘सुमि का स्पेस’ की कहानियाँ जीवन के यथार्थ को तो दर्शाती हैं लेकिन उपदेश, सिद्धांत, विचारों की धींगामुस्ती से आक्रांत नहीं करतीं। जीवन के हर पक्ष को उसकी संपूर्णता में देखने, विषय के अंतिम तह तक धंस कर लिखने की उनकी ज़िद कहानियों को विस्तार देती है। लेकिन यह विस्तार उबाता नहीं है। बल्कि जीवन के हर पक्ष को, उसके वास्तविक रूप को सामने करता जाता है। पढ़ने वाले को उनमें अपना अक्स दिखने लगता है। खो जाता है वह कहानी के विस्तार में। मुख्यतः स्त्री विमर्श पर कलम चलाने के लिए मशहूर उनकी कहानियों में अत्यधिक ब्यौरे होने की बात की जाती है। दरअसल यह ब्यौरे कहानी में ऐसे गुंथे होते हैं कि उनको अलग करना कहानी को अधूरेपन की ओर ठेलने जैसा होगा।

संग्रह की पहली कहानी ‘सुमि का स्पेस’ को लें। कहानी मुख्यतः एक मध्य वर्गीय परिवार की महत्वाकांक्षी लड़की की है। जिसकी माँ उसकी समय से शादी करके अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करना चाहती है। लेकिन लड़की सुमि का मन ‘नासा’ ज्वाइन करने का है। यह स्थिति आने के लिए कई और भी कारण नत्थी हैं जिन्हें कहनीकार कुछ अन्य ब्यौरों के ज़़रिए रोचक ढंग से प्रस्तुत करता है। सुमि की शादी के लिए आश्वासन मिलने और ऐन वक़्त पर लड़के द्वारा लाइफ़ पार्टनर भी उसके ही कॅरियर वाली हो की बात करते हुए शादी से मुकरना समाज की उस विद्रूपता को बेपर्दा कर देता है जहाँ अब लड़कियों की शादी के लिए दहेज ही नहीं उनका नौकरीशुदा होना भी ज़रूरी हो गया है। सुमि भी इंकार से आहत हो कर अपने कॅरियर के प्रति और प्रतिबद्ध हो जाती है। यहाँ यह बात भी साफ होती जाती है कि इस विद्रूपता के कारण विवाह जैसी संस्था से किस प्रकार युवा पीढ़ी का मोह भंग हो रहा है। सुमि का यह कहना कि, ‘क्या बताऊँ? दुनिया कहाँ से कहाँ जा रही है पर मम्मी के स्पेस में शादी के सिवाय कुछ समाता ही नहीं।’ आज की युवा पीढ़ी के विचारों की ही एक झलक है। इसी क्रम में मेहता जी का प्रसंग, बच्चों-पेरेंट्स के बीच अर्थहीन होते रिश्तों की तसवीर सामने रखती है।

दूसरी कहानी ‘मैत्रेयी की मुश्किलें’ विवाहेतर संबंधों से उपजती समस्याओं, उससे परिवार, बच्चों के तबाह होते भविष्य का तानाबाना बुनती है। कहानी की नायिका मैत्रेयी का यह कथन कि, ‘दरअसल मुझे लगता है कि बिना माँ-बाप की बेटी और बिना पति के औरत की समाज में, परिवार में बड़ी दुर्दशा होती है। कम से कम मेरी तो हो ही रही है।’ स्पष्ट करता है कि ऐसे हालातों से गुज़रे लोगों की हालत क्या होती है। और यह भी कि आज़ादी के नाम पर स्वतंत्रता तो होनी चाहिए स्वच्छंदता नहीं। तीसरी कहानी ‘मन्ना जल्दी आना’ देश के ऐसे लोगों का दर्द बयाँ करती है जो घुसपैठिया होने के आरोप के चलते बार-बार उजड़ने-बसने के लिए अभिशप्त हैं। कहानीकार ने इस संवेदनशील मुद्दे के ज़रिए राजनीति की कांट-छांट का भी पूरा दृश्य प्रस्तुत कर दिया है। लेकिन कहानी सांप्रदायिकता से एकदम बची रही।

‘मुजरिम चांद’ कहानी भी व्यवस्था के अजब-गजब रूप दिखाती है। वी.वी.आई.पी. सुरक्षा से आमजन को होने वाली कठिनाइयों के अलावा और कई रूप क़ानून के, समाज के यहाँ दिखते हैं। सिक्योरिटी में व्यवधान के नाम पर एक वरिष्ठ पत्रकार पर एन.एस.ए. लगाने, पुलिस प्रशासन द्वारा उसे प्रताड़ित करने के अलावा एक छोटे कस्बे का सामाजिक तानाबाना भी यहाँ मुखर हो सामने आता है। कस्बाई पत्रकारों, वकीलों की पतली हालत उनकी दयनीयता हमें उनकी बातों में दिखती है। पत्रकारिता की भी कमान संभाले कचेहरी का एक वकील अपने परिचय में बोलता है कि ‘इसी तहसील का बाशिंदा हूँ यहीं की कचेहरी में रोटी दाल जुगाड़ता हूँ।’ आगे कहता है कि ‘इतनी अंगरेज़ी जानता होता तो हाईकोर्ट में प्रैक्टिस कर रहा होता तहसील में नहीं और जो यह दारोगा अंगरेज़ी जानता तो आई.पी.एस. होता दारोगा नहीं।’

सच यही है कि कस्बे के वकील रोटी दाल के जुगाड़ में वकालत से अलग भी बहुत कुछ करते हैं और ऐसे लोग जब रिपोर्टिंग करने लगते हैं तो कैसे उम्मीद की जाए कि मीडिया के ज़रिए हमें मिलने वाली जानकारियाँ सही हैं। और अंगरेज़ी किस तरह हमारे समाज को प्रभावित करती है यह भी दिखता है। विभिन्न विषयों पर कहानीकार की विशद जानकारियाँ इस कहानी को बेहतरीन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती। फ़िल्म एक्टर दिलीप कुमार का जब प्रसंग आता है तो फ़िल्मी कलाकारों की तुनुक मिजाजी से ले कर उनके प्रति आमजन की दीवानगी किस कदर होती है, यह सब तो है ही इस कहानी में साथ ही बड़ा ही आकर्षक दृश्य खेतों का भी है। जिनमें सरसों के पीले फूलों को देख कर नायक को बचपन में सुना यह भोजपुरी गीत याद आ जाता है कि ‘सरसोइयाँ के फुलवा नीक लागै, बिन मोछिया का मरदा फीक लागै।’ कहानीकार ने इस कहानी में पत्रकार के साथ फ़ोटोग्राफर का क्या हुआ, पत्रकार अपने शहर वापस कैसे आया इस बिंदु का खुलासा नहीं किया। शायद पाठकों पर छोड़ दिया हो इस गरज से की वह स्वयं निष्कर्ष निकालें।

‘घोड़े वाले बाऊ साहब’ कहानी, समय के साथ न बदलने की जिद्, झूठी शान, परंपराओं से चिपके रहने व नए को नकारते रहने वालों की हालत के अलावा ग्रामीण समाज की एक-एक विसंगतियाँ सामने लाती है। कहानी में झूठी शानोशौकत व पुरुष दर्प के प्रतीक बाबू गोधन सिंह जो पहले कई-कई घोड़े रखते थे, और लोगों के यहाँ शादी में बारात की अगुवानी के साथ-साथ अच्छा-खासा खर्च भी करते थे, न्यौता देते थे। वही माली हालत के बिगड़ने पर न सिर्फ़ बैलगाड़ी हाँकते हैं बल्कि खर्चे के नाम पर पैसा भी लेने लगते हैं। कहानी में संतान प्राप्ति हेतु द्वापर युग की नियोग पद्धति का बाबू गोधन सिंह की दोनों पत्नियों द्वारा पति से छिपा कर प्रयोग किया जाना चौंकाता है। टेक्नोलॉजी, सूचना तंत्र आदि के निरंतर विकास के बावजूद समाज में ओझाओं, तांत्रिकों के प्रभाव में कमी न आना, उनके जाल में लोगों का निरंतर फंसते रहना भी चकित करता है। दयानंद ने बहुत ही सहजता के साथ इस कहानी में मैरवा के एक पाखंडी बाबा के ज़िक्र के साथ न सिर्फ़ इस बात को रेखांकित किया है बल्कि निष्पक्षता से यह भी कहा है कि पोथी पुराण सुनाने वाले ब्राह्मण भी किस कदर स्वार्थी होकर शोषण करते हैं वह भी धर्म का हवाला देते हुए।

पाखंडी बाबा, यौन शोषण धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा बताते हुए करता है, तो संतान के लिए बेकल महिला का यौन शोषण पोथी सुनाने वाला ब्राह्मण यह कहते हुए करता है कि ‘संतान के लिए किसी ब्राह्मण की मदद लेना भी धर्म है।’ दरअसल यह कहानी समाज के पोर-पोर की सड़न उघाड़ती चलती है। लेखक की भारतीय समाज की गहरी समझ इस कहानी में सरलता से देखी जा सकती है।
उनका यही हुनर ‘मेड़ की दूब’ कहानी में और चमक उठता है। अपेक्षाकृत छोटी-सी यह कहानी बंकिम चंद के उपन्यास ‘आनंदमठ’ का स्मरण करा देती है। जिसमें 1769-1770 के बंगाल के महादुर्भिक्ष का ज़िक्र है कि अकाल से लोग कीड़े-मकोड़ों की तरह मर रहे हैं। सोने चांदी से महंगा अन्न है लेकिन तत्कालीन कंपनी सरकार ऐसे में भी अपना लगान वसूलना नहीं भूलती। ‘मेड़ की दूब’ में भी हमें ऐसे दृश्यों की छाया दिख ही जाती है। एक तरफ सूखे के चलते खेतों की ज़मीन पत्थर हो चली है। फसल बरबाद हो गई है, लोग गाँव-से पलायन कर रहे हैं। दूसरी तरफ सरकारी अमला वसूली में रियायत नहीं देता। गाय-गोरू भी खोल लेता है और सहायता के नाम पर जो कुछ आता है वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है।

खांटी गंवई भाषा, संस्कृति के अभिभूत कर देने वाले दृश्य हैं इस कहानी में। ‘टाटी ओट हज़ार कोस’ जैसी कहावत है तो जतन काका का यह कहा कि ‘अब तू हीं बताव ले बीया खरीदलीं। जरत जेठ में लूह खात बज्जर जस धरती कै छाती चीरलीं। पानी नहखै बरसल।’ पूर्वांचल की गंवई भाषा में गाँव के लोगों का दर्द पूरी शिद्दत से छलछला पड़ता है। ग्रामीणों के भोलेपन की तसवीर माँ वाले प्रसंग में बड़ी खूबसूरती से उभरी है। सूखे की मार से व्याकुल माँ बेटे को बुलाती है कि वह उसे शहर ले चले फिर गाँव के अन्य लोगों को भी इकट्ठा कर लेती है कि उनको भी ले चले। तब शहरी हवा के थपेड़ों का अहसास कर चुका बेटा माथा पीट कर बोलता है कि ‘तुम समझती क्यों नहीं? अरे शहर कोई कोयले की खदान है या कि बनिए की दुकान कि जैसा चाहा वैसा काम तलाश कर लिया।’ भोलेपन के साथ-साथ तसवीर का दूसरा पक्ष यह भी बता रही है कि गाँव बिखर रहे हैं लोग वहाँ रहना नहीं चाहते। और शहर अभी इतने फैले नहीं कि सभी को समा लें। इन सबके बावजूद लेखक गाँव वालों के मन में कहीं छिपी यह ताकत देख ही लेता है कि वह बार-बार बिखर कर भी जुड़ने की ताकत अभी खोए नहीं हैं।

लेखक इस ताकत को कहानी के पात्र बैरागी के ज़रिए दिखाता है। वह उसकी माँ को हिम्मत बंधाते हुए कहता है कि ‘सब झेल लेंगे हम तो मेड़ की दूब हैं, काकी! कितनी बार सूख कर फिर हरे हो गए। सूखना और फिर हरा होना, यही तो ज़िंदगानी है। और बज्जर सूखा सदा थोड़े ही रहेगा।’ लेखक की मनोवैज्ञानिक दृष्टि ‘संवाद’ कहानी में पिता-पुत्र के संबंधों को टटोलती है। पिता की पीढ़ी जब अहं के घोड़े पर सवार हो जाती है, तो संतान के हृदय पर गहरे होते जख़्म संबंधों में कैसे खाई पैदा करते हैं और जो संतान ने अपना जख़्म दिखाया तो उसे बगावत, निर्लज्जता, कमीनापन विशेषण से नवाज़ा जाना और फिर इसके चलते बिखरते परिवार की त्रासदी बयाँ करती है यह कहानी।
‘बड़की दी का यक्ष प्रश्न’ भारतीय महिलाओं के कष्टों, उनके जीवन, सामाजिक परिस्थितियों का कच्चा चिट्ठा खोलती जाती है। और जो बाल विधवा है तो उसके दुखों का अंत होते नहीं दिखता। बड़की दी ऐसी ही बाल विधवा हैं जिनका अंतहीन दुख, चिंताएँ उनके एक-एक वाक्य में दिखता है। जब वह बोलती हैं ‘अभी तो जांगर है, करती हूँ, खाती हूँ। पर जब जांगर जवाब दे जाएगा तब मुझे कौन पूछेगा?’ आगे कहती हैं ‘अब मुझे सहारे की ज़रूरत थी मैं चाहती थी कोई मुझे पकड़ कर उठाए-बैठाए। मेरी सेवा करे। पर करना तो दूर कोई मुझे पूछता भी नहीं था।’ ‘कोई मुंह बुलारो नहीं होता नइहर हो या ससुराल हर जगह लोग यह समझते रहे कि बड़की को तो बस खाना और कपड़ा चाहिए।’

कथा शिल्प की दृष्टि से बहुत बेहतर इस कहानी में बड़की दी की यह बातें भविष्य को ले कर महिलाओं की चिंता, जीवन की ढलान पर सहारे और भावनात्मक सुरक्षा की चिंताएँ दिखाती है। भारतीय महिलाओं के संत्रास को उनके मनोभावों को दयानंद ने जिस खूबी से बड़की दी के जरिए उभारा है वह स्त्री विमर्श के कुशल शिल्पी के ही वश का है।

समाज में ईमानदारी, बेइमानी के बीच संघर्ष में हाशिए पर पहुँचती ईमानदारी का एक प्रतिबिंब है ‘चनाजोर गरम वाले चतुर्वेदी जी’ कहानी। यह आखिरी कहानी एक ईमानदार अफ़सर कैसे बेइमानी की बर्छियाँ झेलते-झेलते हाशिए पर पहुँच अलग-थलग पड़ जाता है, ईमानदारी के चलते सिनिकल कहलाने का दर्द किस हद तक उसे तोड़ता है, यह बताते हुए समाज में गिरते नैतिक मूल्यों और बढ़ती विसंगतियों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है।

संग्रह की सभी कहानियाँ पहली शर्त पठनीयता को बखूबी पूरा करती हैं और बिना किसी लाग लपेट के यथार्थ बयाँ करती हैं। दयानंद पांडेय की कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता और यह भी कहें उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे किसी आंदोलन किसी वाद के सहारे आगे नहीं बढ़तीं। बिलकुल सहज भाव से अपनी बातें कहती जाती हैं। और अपने लिए आधार स्वयं ही बनाती हैं। उनमें कहीं नकलीपन नहीं होता जिससे कहानी पाठकों के साथ एक ऐसा रिश्ता कायम करती चलती है कि पाठक उस रिश्ते में बंध कर रह जाता है।

यह ज़रूर है कि किस्सागोई के प्रति दयानंद का ख़ास अनुराग है। तो पढ़ते वक़्त शैली की दृष्टि से एकरूपता का अहसास एकबारगी हो सकता है। मगर बोरियत की सीमा छूए ऐसा नहीं है। कहा जाता है कि यदि लेखक के पास परिवेश की गहन समझ हो, मनोवैज्ञानिक, प्रगतिशील दृष्टि हो और साथ में भाषा की शक्ति के प्रयोग की क्षमता हो तो अच्छा साहित्य सामने जरूर आएगा। दयानंद के साथ बात इससे भी आगे जाती है। आंचलिक भाषाओं का ख़ास तौर से भोजपूरी और अवधी का उनका ज्ञान और इस पूरे परिवेश के प्रति उनकी गहन समझ उन्हें एक अलग ही स्थान देती है। मगर साहित्य की दुनिया में उनकी हालत ‘चनाजोर गरम वाले चतुर्वेदी जी’ जैसी होती दिखती है। यह बदल भी सकता है जो उनके लिखे पर हर तरह के वादों, आंदोलनों से ऊपर उठ कर निष्पक्ष समालोचनात्मक नज़र डाली जाए। उनकी क्षमताएँ यह आश्वसन ज़रूर देती हैं कि एक दिन वह साहित्य की दुनिया में अपना उचित मुकाम अवश्य पा लेंगे। पाठकों को उनका रचना संसार और विस्तृत होता ज़रूर दिखेगा।

प्रदीप श्रीवास्तव
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