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ISSN 2292-9754

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05.26.2014


जहाँ साँसों में बसता है सिनेमा

समीक्ष्य पुस्तक : ‘सिनेमा-सिनेमा’
लेखक : दयानंद पांडेय
प्रकाशक : राष्ट्रवाणी प्रकाशन,
शाहदरा, दिल्ली-110032

सौ बरस से भी पहले 7 जुलाई 1886 को जब फ्रांस के ल्यूमेरे बंधुओं ने मुंबई में वाटकिंस होटल (तब बंबई) में कुछ लोगों के समक्ष चलचित्र के छह टुकड़े दिखाए थे तब शायद ही किसी को यह अंदाज़ा रहा होगा कि उन्होंने तो जाने-अनजाने में भारतीय सिनेमा उद्योग का बीज ही रोप दिया है। और भविष्य में यह सिनेमा उद्योग ऐसा बरगदी रूप धारण करेगा कि इसकी छाँव में भारतीय शास्त्रीय-संगीत, रंगमंच, लोक-संगीत आदि अपनी आभा ही लगभग खो देंगे। उनके अस्तित्व को लेकर प्रश्न खड़े होने लगेंगे। ठीक वैसे ही जैसे इसी भीमकाय फ़िल्म इंडस्ट्री की जीते जी किंवदंती बन चुकीं विश्व विख्यात पार्श्व गायिका लता मंगेशकर की बरगदी छाँव के तले तमाम बेहतरीन पार्श्व गायिकाएँ ऐसा कुम्हला गईं कि वह फिर कभी पनप ही न पाईं। यहाँ तक कि ख़ुद उनकी सगी छोटी बहन और पार्श्व गायिका आशा भोंसले भी उन पर आरोप लगाती हैं और कहती हैं कि उनके साथ अन्याय हुआ। ऐसा ही आरोप हेमलता का है कि मंगेशकर बैरियर था।

वास्तव में यह जो भारतीय सिनेमा उद्योग इतना विशाल इतना विराट बना है तो यह यूँ ही नहीं हो गया है। यहाँ हर वक़्त कुछ न कुछ ऐसा होता रहा है या होता ही रहता है जो इसे बेहद दिलचस्प बना देता है। बिल्कुल यहाँ बनने वाली फ़िल्मों की तरह, जैसे कोई यादगार फ़िल्म बनाने के जुनून में जहाँ स्टूडियो में ही चटाई बिछाकर सोता है, तो कोई नैतिकता के तक़ाज़े के चलते करीब-करीब दिवालिया हो जाने के बाद भी अगली फ़िल्म के लिए एक स्मगलर द्वारा सम्मानपूर्वक पैसा दिए जाने की पेशकश भी ठुकरा देता है। हीरो दृश्य में जान डाल दे इसके लिए सोने का जूता बनवाया जाता है, तो दूसरी ओर ऐसे जुनूनी लोग भी रहे जो फ़िल्म से जुड़े लोगों, कलाकारों आदि के एक-एक कर मरते रहने के बावजूद भी फ़िल्म पूरी करके ही माने। किसी ने बीस बरस तक रोटी ही नहीं खाई। गीत-संगीत ऐसे प्रभावशाली कि पैरों का थिरकना रोका न जा सके, दुःख भरे गीत ऐसे कि आँसू छलछला ही आएँ। प्रदीप का लिखा और लता का गाया कालजयी गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगो......’ सुनकर नेहरू जैसे प्रधानमंत्री भी आँसू न रोक पाए। और फिर जल्दी ही हालात यह हो गए कि इस गाने के बिना तो जैसे गणतंत्र दिवस, स्वाधीनता दिवस समारोह अधूरा ही माना जाने लगा।

इंडस्ट्री ने वह दौर भी देखा जब व्यवसाय से पहले फ़िल्म की गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाता था। आज यह इंडस्ट्री उस दौर से गुज़र रही है जब सब कुछ सिर्फ़ व्यवसाय के लिए किया जाता है। जितनी दिलचस्प बातों, घटनाओं से भरी है यह फ़िल्म इंडस्ट्री उतनी ही रोचक और तथ्यपरक है यह समीक्ष्य पुस्तक ‘सिनेमा-सिनेमा’ भी। इसमें उपरोक्त कई बातों के साथ-साथ ढेर सारी ऐसी बातें हैं जो अपने साथ पाठक को एकदम बाँध लेती हैं। लेखक दयानंद पांडेय ने दिलचस्प हिंदी सिनेमा उद्योग जो कि अन्य भारतीय भाषाओं के फ़िल्म उद्योग के लिए प्रेरक ऊर्जा भी बना की बहुरंगी दुनिया का बेहद प्रामाणिक ब्योरा बड़े दिलचस्प ढंग से रखा है। वास्तव में यह पुस्तक उनकी करीब दो दशकों की मेहनत का परिणाम है। जिसमें सिनेमाई दुनिया के अंदर खाने की ढेरों दिलचस्प बातें हैं। तमाम ऐसे अनछुए क़िस्से हैं जिन्हें बहुत ही कम लोग जानते होंगे। जिसे लेखक ने सिनेमाई दुनिया की तमाम हस्तियों से बातचीत करके, कई तरह से जाँच पड़ताल करके लिखा है। जैसे यही बात कि आशा भोंसले चौदह की उम्र में घर छोड़ कर चली गईं और शादी कर ली। दो बच्चे हो गए तो पति छोड़ कर चला गया। फिर घर वापस आकर रहने लगीं, परिवार ने पूरा सहारा दिया फिर भी परिवार से उन्हें शिकायत है। उनके बड़े भाई संगीत मर्मज्ञ हृदयनाथ मंगेशकर ने लेखक को यह बातें एक इंटरव्यू में बतायीं। जिन्होंने फ़िल्मी संगीत से इसलिए दूरी बनाई क्यों कि उनका मानना है कि फ़िल्मी संगीत के कारण शास्त्रीय-संगीत का स्तर गिरता है और इससे उनकी शास्त्रीय-संगीत की साधना अधूरी रह जाएगी। वह यह भी बताते हैं कि उन्हें ढाई हज़ार बंदिशें याद हैं।

कहाँ तो बंदिश गाना और दो-चार को याद रखना ही बड़ा मुश्किल होता है वहाँ वह इसको गाने में ही पारंगत नहीं हैं बल्कि आश्चर्यजनक रूप से ढाई हज़ार बंदिशें याद भी रखी हैं। वास्तव में शास्त्रीय-संगीतकारों और फ़िल्मी-संगीतकारों के बीच संगीत के स्तर को लेकर गहरे मतभेद हैं। शास्त्रीय-संगीतकार दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि फ़िल्मी संगीत शास्त्रीय-संगीत को नुकसान पहुँचा रहा है। वह उसकी आत्मा को नष्ट कर रहा है। संगीत को बेच रहा है। मुनाफ़े के लिए हर समझौता कर रहा है। बिरजू महाराज जैसे लोग अपने गुस्से का इज़हार करने से ख़ुद को रोक नहीं पाते हैं। फ्यूज़न म्यूज़िक को कन्फ्यूज़न म्यूज़िक तक कह देते हैं। जिससे बिदक कर फ़िल्मी दुनिया के संगीतकार शंकर महादेवन और लुईस कहते हैं कि जो लोग फ्यूज़न नहीं करते वह लोग कन्फ्यूज़न करते हैं। तथ्य यह है कि व्यवसाय और शास्त्रीयता एक साथ नहीं चल सकते। दोनों की दिशा और उद्देश्य अलग हैं। और अपनी जगह दोनों सही हैं। रंगमंच के तमाम दिग्गज रंगमंच छोड़ कर फ़िल्मों में जाते हैं, अभिनय उनको वहाँ भी करना है। मगर उनकी प्राथमिकता में पहले नंबर पर पैसा आ गया तो दिशा बदल दी। चले गए फ़िल्मों में।

पुस्तक में पच्चीस लेख एवं सत्ताइस नामचीन फ़िल्मी हस्तियों के इंटरव्यू हैं। इन सब में एक से बढ़ कर एक रोचक बातें बताई गई हैं, ख़ुलासे किए गए हैं। लेखक अमरीका, चीन तक में सुनी जाने वाली भारत रत्न लता मंगेशकर को हिंदी की लाठी बताते हुए यह मानते हैं कि उनकी आवाज़ ने हिंदी के प्रचार-प्रसार में बहुत बड़ा योगदान दिया है। मगर कैसे? इस प्रश्न का उत्तर नदारद है। इस पर वह थोड़ा भी प्रकाश डालते तो अच्छा होता।

लता मंगेशकर के जीवन संघर्ष के ज़िक्र के क्रम में वह बताते हैं कि पिता की जल्दी मृत्यु के बाद उन्होंने कैसे परिवार को संभाला। और फिर वह व़क्त भी आया जब वह दशकों पहले मर्सीडीज़ कार में चलने लगीं, मगर उनके बड़े भाई हृदयनाथ तब भी लोकल ट्रेन या बस से ही चलते रहे। क्योंकि फ़िल्मी संगीत से लता ढेरों कमाई करने लगी थीं। और दूसरी ओर उनके भाई को शास्त्रीय-संगीत से पैसा नहीं मिल रहा था। यह भी ख़ुलासा संगीतकार सी.रामचंद्रन की आत्मकथा के माध्यम से करते हैं कि लता ने एक-एक गाना पाने के लिए रात-रात भर सी.रामचंद्रन के पाँव दबाए। लेखक से यह बात सुनकर उनके भाई हतप्रभ रह गए।

ऊपर से चमक-दमक भव्यता से भरपूर फ़िल्मी दुनिया के अधिकांश लोगों का जीवन अंदर ही अंदर कितनी घुटन, कितने संत्रास से भरा होता है पुस्तक में इसके एक से बढ़ कर एक वृतांत हैं। बंगला और हिंदी फ़िल्मों की आला दर्जे की अभिनेत्री सुचित्रा सेन के लिए बहुत ही मार्मिक बातों का उल्लेख है कि कैसे तो मीडिया द्वारा उनका नाम किसी से जोड़े जाने के बाद उन्होंने अपने को घर में कैद कर लिया और फिर जीवन के शेष तैंतीस वर्ष तीन बार अपवाद छोड़े दें तो कभी किसी से मिलीं ही नहीं। इसी क्रम में अमरीकी अभिनेत्री ग्रेटा गार्बो और जापानी तारिका सेत्सुको हारा का उल्लेख है। पहली जहाँ पैंतीस वर्ष के बाद किसी से नहीं मिली, वहीं दूसरी बयालीस के बाद जो लोगों से दूर हुई तो तिरानवे की होने तक भी किसी से नहीं मिली।

प्राण, अमिताभ बच्चन, दिलीप कुमार, रेखा, नूतन, संजीव कुमार, राज कपूर, दीप्ती नवल, हेमा मालिनी आदि कलाकारों के अभिनय और उनके जीवन के बारे में ऐसी बहुत-सी बातें लिखी गई हैं जो कम ही लोग जानते हैं। जैसे अभिनय सरताज संजीव कुमर ने अपना कॅरियर इप्टा में स्टेज पर परदा खींचने से शुरू किया था। और दिलीप कुमार आर्मी कैंप में लेमन वगैरह बेचते थे। लेकिन तब अभिनय साम्राज्ञी देविका रानी ने सहारा दिया तो वह अभिनय की दुनिया की अहम शख़्सियत बन गए। इन कलाकारों ने किस प्रकार अपनी प्रतिभा अपने उत्कृष्ट अभिनय, लगन से भारतीय फ़िल्मी अभिनय की दुनिया को नई ऊँचाई प्रदान की इस के बड़े ही रोचक वर्णन हैं। पुस्तक में कई ऐसे फ़िल्म निर्देशकों का भी वर्णन है जिन्होंने अपनी निर्देशकीय क्षमता से अभिनेता-अभिनेत्रियों की प्रतिभा को ठीक से पहचान कर उन्हें ऐसा तराशा कि वह सितारे बन चमक उठे। ऐसे निर्देशकों में श्याम बेनेगल, सत्यजीत रे, राजकपूर, मनोज कुमार, गोविंद निहलानी, प्रकाश झा, गुलजार, मुज़फ़्फर अली आदि ख़ास तौर से जाने जाते हैं।

राजकपूर तो अपनी फ़िल्मों को अलग ही ढंग से ट्रीट करने के लिए पहचाने जाते हैं। सत्यजीत रे को तो लेखक ने भारतीय सिनेमा को विश्व पटल पर स्थापित करने का श्रेय दिया है। हालाँकि विडंबना यह थी कि जब सत्यजीत रे की फ़िल्म ‘पाथेर पांचाली’ 1955 में रिलीज़ हुई तो देश में इसे तवज़्जोह ही नहीं मिली। मगर विदेशों में जब इस का डंका बजा तो देश में भी चर्चित हुई। लेकिन इस आरोप से सत्यजीत रे नहीं बच पाए कि वह भारत की गरीबी को दुनिया में बेच रहे हैं।

पुस्तक ऐसे तथ्यों से भरी पड़ी है जो यह स्पष्ट करते हैं कि इस तरह की बातें चाहें जितनी की जाएँ इस फ़िल्मी दुनिया को ऊर्जा देने, उसे परिपक्व बनाने में इन्हीं फ़िल्मी हस्तियों की मेहनत, लगन और उनका विज़न रहा है। जिसके चलते सिनेमा भारतीयों के जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है। यह जैसे उनकी साँसों में बसता है। लेखक भी इससे अछूता नहीं दिखता। पूरी पुस्तक फ़िल्मों के प्रति उनके अतिशय लगाव का ही परिणाम है। फ़िल्मी दुनिया में एकदम गहरे पैठकर ऐसे उत्कृष्ट लेख लिखे, और साक्षात्कार लिए हैं जिनमें लेखक की बेबाकी और फ़िल्मी हस्तियों की बातों की बड़ी रोचक जुगलबंदी है। जिसमें अमिताभ बच्चन कहते हैं कि उनके पिता हरिवंश राय बच्चन का मानना था कि हिंदी फ़िल्में पोएटिक जस्टिस देती हैं, तो मुज़फ्फर अली अपने को भगवान विष्णु का भक्त बताते हुए कहते हैं हम तो राजा मोरध्वज के वंशज हैं। हमारा कोई कुछ बिगाड़ थोड़े ही सकता है विष्णु जी का आशीर्वाद है। हालाँकि वह यह भी स्वीकारते हैं कि व्यावसायिकता की मार में खो गए हैं हम। वहीं पीनाज मसानी चोरी का आरोप लगाती हुई कहती हैं कि ‘उमराव जान’ फ़िल्म का संगीत खैय्याम का नहीं जयदेव का है।

वास्तव में यह पुस्तक इतनी रोचक, इतनी तथ्यपरक है कि पाठक को एक उम्दा फ़िल्म की तरह आखिर तक बाँधे रखने में सक्षम है। एक तथ्य यह भी है कि हिंदी सिनेमा पर यूँ तो तमाम पुस्तकें आयी हैं। लेकिन संभवतः यह अपनी तरह की अकेली पुस्तक है। जैसे सत्यजीत रे की ‘पाथेर पांचाली’ फ़िल्म एक अलग ही स्थान बनाती है। मगर प्रश्न फ़िल्म पर फिर भी खड़े किए गए थे। तब की प्रख्यात अभिनेत्री नरगिस दत्त ने तो राज्य सभा में प्रश्न खड़े किए थे। वैसे ही प्रश्न इस पुस्तक पर भी हैं कि फ़िल्मों का ओढ़ने, बिछाने, जीने (यह पुस्तक लेखक के बारे में ऐसा ही प्रदर्शित करती है) और दो दर्जन से अधिक किताबें लिखने का अनुभव रखने वाले, कई पुरस्कारों से नवाजे जा चुके दयानंद पांडेय इस इंडस्ट्री को खड़ा करने वाले, जीवन देने वाले बहुत से प्रमुख लोगों को कैसे भूल गए। कि हिंदी फ़िल्मी दुनिया की बात हो और एच.एस.भटवडेकर, हीरालाल सेन, दादा साहेब फाल्के, हिमांशु राय, व्ही. शांताराम, महबूब खान, ख़्वाजा अहमद अब्बास, के.एल. सहगल, मोती लाल, पंकज मलिक, कुक्कू, देविका रानी, प्रदीप, गोपालदास नीरज, साहिर लुधियानवी, शैलेंद्र, शंकर-जयकिशन, गीता दत्त, ऊमा देवी, सोहराब मोदी, पृथ्वी राजकपूर आदि की बात न हो तो बात अधूरी ही लगती है। दूसरी बात अमिताभ बच्चन की, जिनके लिए वह स्वयं मानते हैं कि वह उस ऊँचाई पर पहुँच चुके हैं जिसे छूने की बात छोड़िए कोई करीब तक नहीं पहुँच सकता है। उन्हीं के लिए पैसे के लिए पैंट उतारने जैसी शब्दावली का प्रयोग अनुचित जान पड़ता है। गुजरात के तत्कालीन सी.एम.नरेंद्र मोदी ही ने टी.वी. चैनल पर साफ कहा कि अमिताभ ने गुजरात पर्यटन के लिए की गई मॉडलिंग हेतु एक पैसा नहीं लिया। ऐसे ही यू.पी. पल्स पोलियो तथा अन्य कई सामाजिक कार्यों के लिए भी उन्होंने पैसा नहीं लिया। जब कि वह चाहते तो करोड़ों रुपये ले सकते थे। लेकिन नहीं लिया। समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया। जहाँ तक विज्ञापन करने का सवाल है तो वह उनके व्यवसाय का हिस्सा है। नहीं करेंगे तो खो जाएँगे मुज़फ़्फ़र अली की तरह। पाठकों के मन में पढ़ते व़क्त ऐसे ही कुछ और बातें भी आ सकती हैं।

जहाँ तक पुस्तक की पठनीयता मात्र का सवाल है तो दयानंद पांडेय उन लेखकों में शुमार किए जाते हैं जिनके लिखे में ज़बरदस्त पठनीयता होती है। ख़ासियत यह भी है कि वह अपना एक ख़ास तरह का शब्दकोश रचे हुए लगते हैं, जिसके सारे शब्दों का प्रयोग कर लेने की उनकी जैसे ज़िद रहती है। गोया उनके बिना उनका लेखन अधूरा ही रहेगा। उदाहरण स्वरूप कुछ शब्द देखिए- विरह, विरवा, विरल, बिलाए, बिला, आँच, बांच, गुनने, गमक, चमक, महक-चहक, धमक, बेकली, शऊर, शोखी, परोस, हेरा, उभ-चूभ, ठसक, गंध, चटख, भहरा, भरभरा, पुलक, अकुलाए, अकुलाहट, कुम्हलाए, कलफ़, कैफ़ियत, टटकी, टटका, टटकापन आदि। शुरुआती कुछ लेखों में यह शब्द कुछ ज़्यादा ही हावी हैं। एक बात यह भी है कि बहुत से लेख ऐसे हैं जिन्हें कब लिखा गया इसका उल्लेख नहीं है। फिर भी यह कहना गलत न होगा कि लेखक का लंबा अनुभव और उनकी ढेरों जानकारियों के कोश ने इस पुस्तक को ऐसा रूप दे दिया है जो आम पाठकों के साथ-साथ हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री पर यदि शोध की बात आए तो वहाँ भी बेहद उपयोगी साबित होगा।


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