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ISSN 2292-9754

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03.24.2015


अपने समय का चित्र उकेरतीं कविताएँ

समीक्ष्य पुस्तक : ‘भीग गया मन’ (काव्य संग्रह)
कवि : हरिहर झा
प्रकाशक : हिंद युग्म, 10 हौज ख़ास, नई दिल्ली-110016
मूल्य : रुपए 200

कविता क्या वही है जो अपने रस में भिगो दे, मन सराबोर कर दे, नौ रसों बल्कि नागार्जुन के प्रतिपादित उसके दसवें रस ‘विक्षोभ’ (विक्षोभ रस मूलतः क्रोध, घृणा, करुणा इन तीन भावों का योग होता है। विख्यात आलोचक मैनेजर पांडेय के अनुसार इन तीनों का स्वभाव प्रायः सामाजिक होता है। एक स्थिति में ये तीनों एक साथ क्रियाशील हो सकते हैं। अपने देश समाज की साधारण जनता की भीषण गरीबी के प्रत्यक्ष-बोध से विक्षोभ पैदा होगा। उसमें गरीबों के प्रति करुणा होगी, गरीबी से घृणा होगी और गरीबी के कारणों के प्रति क्रोध होगा) को भी लें, इन सब का बहुविध अनुभव कराए। या सही मायने में कविता वह है जो अपने समय का प्रतिबिंब हो। लेखा, जोखा हो। अपने समय का परिदृश्य सामने रखने में सक्षम हो। बात यहीं तक रहे तो भी कुछ अधूरापन सा है, क्यों कि अपने समय की तस्वीर रख देना किसी घटना या काल की रिपोर्टिंग करने जैसा भी हो जाएगा। वास्तव में कविता स्वयं में समग्र तो तभी कही जानी चाहिए जब उसमें भाव, विचार, संप्रेषणीयता, अपने समय की संवेदना और साथ ही भविष्य को लेकर कोई सपना हो, सपने को पूरा करने के लिए पथप्रदर्शन हो।

वरिष्ठ लेखक आलोचक कृष्णदत्त पालीवाल एक जगह लिखते हैं कि सहित्य का दायित्व है देश काल में बदलते मनुष्य की ठीक-ठीक पहचान कराना, उसे परिभाषित करने का प्रयास करना, लेकिन परिभाषा कटघरे बनाकर विचारों की दुनिया को विकलांग करती है। रचना अथवा आलोचना का काम युग की संवेदना से साक्षात्कार कराना है। वैचारिक पूर्वाग्रहों को मरोड़कर उनके सत्य को शब्द में उतार देना है। साथ ही साहित्य में मौजूद मनुष्य के सर्जनात्मक रूप का सामाजिक पाठ तैयार करना होगा। तभी हम छायावाद और नई कविता, नई कविता और उत्तर छायावाद की कविता, अकविता तथा समकालीन कविता की जीवनानुभूति के सौंदर्य को अनुभव के धरातल पर पा सकेंगे।’ इन्हीं सब बातों के संदर्भ में प्रवासी कवि हरिहर झा के काव्य संग्रह ‘भीग गया मन’ में संग्रहीत कविताओं पर जब दृष्टि जाती है तो इन कविताओं में विविधता, संप्रेषणीयता, भाव, अपने समय की विसंगतियों पर तीखी नज़र, शब्द चयन का सौंदर्य, प्रखर संवेदना बड़े प्रभावशाली रूप में नज़र आती हैं। इन कविताओं के लिए प्रवासी उषा राजे सक्सेना कहती हैं कि ‘उनमें अपने समय की आवाज़ प्रतिध्वनित होती है।’ वास्तव में हरिहर झा की कविताओं में एक ऐसे बेहद संवेदनशील व्यक्ति की संवेदनाओं, करुणा, विसंगतियों के प्रति विक्षोभ, चिंता, मातृभूमि के प्रति अपनी जड़ों के प्रति छटपटाहट, बहुत कुछ जो करना चाहते थे समय के साथ उनमें से बहुत कुछ के पीछे छूटते जाने का दर्द नज़र आता है।

जीवन के छः दशक व्यतीत कर लेने के बाद भी बहुत कुछ अभी लिखना है यह सोच-सोच कर उनकी छटपटाहट बेचैनी बढ़ती रहती है। वह लिखते है‘ ‘शब्दों के नर्तन से शापित/अंतर्मन शिथिलाया/लिखने को तो बहुत लिखा/पर कुछ लिखना बाकी है।’ उनकी यह बेचैनी उन्हें बैठने नहीं देती। उन्हें बहुत कुछ लिखने के लिए सक्रिय किए रहती है। फिर चाहे वह ऑस्ट्रेलिया में हों या छुट्टियों में अपनी मातृभूमि भारत में, उनके अंतर्मन में भावनाएँ अभिव्यक्ति के लिए मचलती रहती हैं।

करीब ढाई दशकों से ऑस्ट्रेलिया में रह रहे हरिहर झा के मन की पीड़ा ख़ास मौकों पर ख़ासतौर पर त्योहारों आदि के वक्त और भी घनीभूत हो उठती है। उनकी ‘परदेश में होली’ कविता वास्तव में हर प्रवासी की पीड़ा का प्रतिनिधित्व करती है। परदेश में भौतिक सुख सुविधाएँ भले ही ढेरों इकट्ठा कर ली जाएँ। लेकिन आत्मिक संतोष तो अपनों के साथ, अपनी जड़ों से एकाकार हो कर ही मिलता है। इस कविता में परदेश में प्रवासियों की त्योहार मनाते वक्त की मनोदशा का ख़ूबसूरत चित्रण इस तरह किया है कि ‘उदास मन के/साए में/होली खेली डरते-डरते/‘आगे लिखते हैं ‘अवकाश नहीं, भागे ऑफ़िस/देर रात को थके-थकाए/लैपटॅाप में बोझिल ‘खिड़की’/घर में खाना कौन पकाए।’ हर एक प्रवासी का मन क्या ऐसे कटु अनुभवों से गुज़रे बिना रह सकता है। कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सम्मानित हरिहर झा बाज़ारवाद को दुनिया के लिए, मानवीय मूल्यों के लिए, अभिशाप मानते है ‘मंडी बनाया विश्व को’ कविता में उनका विक्षोभ इन शब्दों में प्रकट हुआ कि ‘उपभोग की जय-जय हुई, बाज़ार घर में आ घुसे/ व्यक्ति बना ’सामान’ और रिश्तों में चकले जा घुसे/मोहक कला विज्ञापन की हर कोई यहाँ फंस लिया/अभिसार में मीठा ज़हर, विषकन्या-रूप डस लिया/फेंकी गुठली रस-निचुड़ी, कहो, क्यों ठुकरा न देगा?/लुढ़कता पत्थर शिखरों से, क्यों हमें लुढ़का न देगा?’ वास्तव में बाज़ारवाद ने पूरी दुनिया को एक मंडी में तब्दील कर दिया है। मानवीय मूल्यों से उसका कोई लेना देना नहीं है। हर चीज़ बिकाऊ है उसे हर हाल में बेचना है इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए किए जाने वाले नैतिक-अनैतिक प्रयासों ने मानवता की जड़ें हिला दी हैं। समाज में संवेदनहीनता, नैतिकता के पतन, रिश्तों के अवमूल्यन का ग्राफ तेज़ी से बढ़ा और बढ़ता ही जा रहा है। लेकिन यहाँ यह प्रश्न भी उठता है कि क्या यह बाज़ारवाद इतना सर्वशक्तिमान है कि उसका सामना संभव नहीं है। या फिर हम भयभीत हैं। बात की गहराई तक गए बिना बाज़ारवाद को अनावश्यक रूप से अतिशय तूल दिया हुआ है। उस बाज़ारवाद को जिसने इंसान को भी वस्तु बना दिया है। देह की भी मंडी है। वह भी इस मंडी में बिकती है। इस बाज़ारवाद को लेकर कवियों, लेखकों में बड़ा गुस्सा है। वह बराबर इस पर चोट कर रहे हैं। मगर वह प्रभावित हुए बिना अपनी चाल चल रहा है। हमें इस पर चोट से पहले इस बिंदु पर भी सोचना होगा कि समाज और बाज़ार एक सिक्के के दो पहलू हैं। बाज़ार के बिना सिक्का खोटा है। और जब बाज़ार है तो उसके साथ बाज़ारवाद भी नत्थी रहेगा। क्या इस बाज़ारवाद के साथ कोई समन्वयकारी बीच का ऐसा रास्ता हमें नहीं ढ़ूढ़ना चाहिए जो मानवता की सीझती दुनिया को भी नई ऊर्जा देने का काम करे, और बाज़ारवाद भी एक संतुलित, मानवीय मूल्यों के साथ आगे बढ़े। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लेखन भी पाठकों तक इस बाज़ार के पुल से ही गुज़र कर पहुँचता है। इस पुल को ध्वस्त कर हम लेखक-पाठक के संपर्क को ही ध्वस्त कर देंगे। फिर किसके लिए होगा लेखन। पुस्तकें किस माध्यम से पहुँचेंगी पाठकों तक। इस संबंध में सत्रहवीं सदी के प्रसिद्ध फ्रांसीसी चिंतक वाल्टेयर ने कहा है कि ‘लेखक जनमानस को इसी बिना पर प्रभावित नहीं कर सकता कि वह बहुत बढ़िया लिखता और तर्कसंगत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। महत्वपूर्ण बात है कि वह जो लिखता है वह अधिक से अधिक पाठकों तक पहुँच पाया है या नही।’ बात साफ है कि बाज़ारवाद से संघर्ष कर कोई रास्ता निकलता दिखता नहीं। समन्वयकारी रास्ते से ही कोई समाधान ढूँढ़ा जा सकता है। इस समन्वयकारी रास्ते को लेकर भले ही औरों की तरह हरिहर जी की भी कलम अभी तक शांत है। लेकिन बाकी बिंदुओं पर उनकी मुखरता बड़ी तीखी है।

स्त्री शक्ति को पहचानने की बात पर ज़ोर देते हुए वह उसके साथ अधिकार दिए जाने के नाम पर किए जा रहे छल-कपट की भी बखिया उधेड़ते हैं। बेहद मार्मिक कविता ‘आभागी मैं’ में लिखते हैं ‘घर के साथ दोहरा शोषण/हो रहा ऑफ़िस के काम पर/तड़ाक-सा किया तलाकित/अधिकार देने के नाम पर/ताकि तुम मुझे/ सिंगल मदर या/अविवाहित मां के रूप में/छोड़कर/मुझसे अपनी नज़र मुड़ा सको/नन्हा गुल मुझे सौंप कर/गुलछर्रे उड़ा सको/’ और आगे लिखते हैं कि यह क्या किया तुमने/उतार ली मेरी चमड़ी तक/कभी फैशन के नाम पर/ कभी स्वतंत्रता के नाम पर/ और अभागी मैं/ वस्तु थी/ बच्चे की पैदाइश के लिए/ वस्तु रह गई/दुनिया की नुमाईश के लिए।’ उनकी तीखी कलम से विभिन्न बिंदुओं पर मन मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ने वाली एक से बढ़ कर एक रचनाएँ निकलती हैं। इस संग्रह में उनकी हृदय-स्पर्शी एक सौ तीन कविताएँ संग्रहीत हैं‘ बदरी डोल रही, पलाश के प्रति, सपने में जो देखा, प्यार गंगा की धार, भीग गया मन, कामदेव, मां और मातृभूमि, कारगिल हो या गेलीपोली, कंप्यूटर कविता लिखेंगे, हम कवि हैं या मसखरे, गुनगुनी धूप है, अंतर्ज्योति, हिंदी में, नींद, जैसी बेहद दिलचस्प कविताएँ हैं। हरिहर झा में अर्थहीन कविताओं को लेकर गहरा क्षोभ है। वह इसी शीर्षक से एक कविता में किसी भी प्रकार की स्वार्थ सिद्धि के लिए की जाने वाली कविता पर तीखा प्रहार करते हैं। प्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार तेजेंद्र शर्मा उनकी रचनाओं के लिए लिखते हैं कि ‘वे खजुराहो की मूर्तिओं से लेकर साक्षात ईश्वर में अपने लिए कविता गढ़ने का सफल प्रयास करते हैं।’ वह आगे लिखते हैं कि ‘उनकी कविताएँ निश्चय ही यह संदेश देती हैं कि भारत के बाहर लिखी जा रही कविता को धैर्य और ध्यान से पढ़ने की आवश्यकता है।’ तेजेंद्र जी की यह टिप्पणी दरअसल प्रवासी भारतीयों द्वारा रचे जा रहे साहित्य को देशवासियों द्वारा अपेक्षित, प्रोत्साहन, सम्मान, महत्व न मिलने से आहत मन की पीड़ा है। जो हरिहर जी की कविताओं पर टिप्पणी के बहाने सामने आई है। इस पीड़ा को हमें गंभीरता से लेना चाहिए। हमारी एक नज़र हरिहर जी की कविताओं पर इस दृष्टि से भी जानी चाहिए। आज जब हिंदी कविता छंद लय आदि से मुक्त हो गद्य कविता या अकविता की राहों पर बढ़ती जा रही है और उनमें भाव-विचार संवेदना संप्रेषणीयता आदि भी अक्सर विलुप्त ही रहते हैं। ऐसे में हरिहर झा जी की शैली की कविताएँ आशाओं के सघन वन की तरह हैं। उन्हें पूरा महत्व, प्रोत्साहन मिलना ही चाहिए। इस शैली की गद्य कविताओं में भी वह रवानी वह बहाव होता है जो दिल को छू लेती हैं। नोबल पुरस्कार विजेता स्वीडिश कवि टॉमस ट्रांसट्रोमर इसीलिए गद्य कविता को भी पूरी अहमियत देते हुए कहते हैं ‘गद्य कविताओं में भी सहज बहाव होता है।’ समीक्ष्य काव्य संग्रह की कविताओं के बहाव में भी वह सामर्थ्य है जो पाठकों को बहुत दूर तक अपना हम सफर बनाए रख सकता है।  


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