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ISSN 2292-9754

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06.29.2017


रूठी बिन्नू

रूठी-रूठी बिन्नू सेरी, रूठ गए हैं भैयाजी।

बिन्नू कहती टिकिट कटा दो, हमें रेल से जाना है।
पर भैया क्या करे बेचारा, खाली पड़ा खजाना है।
कौन मनाये रूठी बिन्नू, कोई नहीं सुनैयाजी।

बिन्नू कहती ले चल मेला, वहाँ जलेबी खाऊँगी।
झूले में झूला झूलूँगी, बादल से मिल आऊँगी।
मेला तो दस कोस दूर है, साधन नहीं मुहैया जी।

मत रूठो री प्यारी बहना, तुमको खूब घुमाऊँगा।
सबर करो मैं जल्दी-जल्दी, ख़ूब बड़ा हो जाऊँगा।
चना चरोंजी गुड़ की पट्टी, रोज खिलाऊँ लैयाजी।

जादू का घोडा लाऊँगा, उस पर तुझे बिठाऊँगा।
एड़ लगाकर पूँछ दबाकर, घोडा खूब भगाऊँगा।
अम्बर में हम उड़ जाएँगे, जैसे उड़े चिरैयाजी।


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