अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
04.01.2017


टीना ने चोरी पकड़वाई

"दरियाँ ले लो, दरियाँ, रंग बिरंगी मज़बूत टिकाऊ दरियाँ"

जैसे ही टीना ने आवाज़ सुनी वह बस्ता जस का तस छोड़कर बाहर की तरफ़ भागी। अम्मा चिल्लाईं, "अरे कहाँ भाग रही है, पढ़ाई तो पूरी कर ले?" परन्तु टीना को तो भागना ही था दरीवाले की आवाज़ पर।

"पता नहीं क्या हो गया है इस टीना को, दरी वाले की आवाज़ आती है तो सब काम छोड़कर भाग जाती है।" अम्मा मन ही मन बुदबुदातीं। उन्होंने टीना के बापू से शाम को इस बावत चर्चा की। परन्तु बाबू जमना लालजी ने हँसकर कहा, "तुम भी कहाँ की बातें ले बैठती हो, अरे बच्ची है, दरीवाले की आवाज़ सुनकर दरी देखने दौड़ जाती है तो इसमें क्या बुराई है। मैं भी तो बचपन में ठेले वालों की आवाज़ सुन कर खाने की थाली छोड़कर भाग जाता था।" बात तो सच थी। वह भी तो जब छोटी थी तो आसमान में हवाई जहाज़ की आवाज़ सुनकर बाथ रूम में से आधी नहाई ही बाहर दौड़ पड़ती थी। ख़ैर बात आई गई हो गई।

दूसरे दिन मोहल्ले में हल्ला मचा कि रतन लालजी के घर में चोरी हो गई। पुलिस की गाड़ी हूटर बजाती हुई आई और चोरी वाले घर के सामने भीड़ लग गई। रतन लालजी एक दिन पहले ही से नागपुर गए थे और सुबह ही वापस आये थे।

घर का सारा सामान उन्होंने बिखरा पाया और अलमारी का ताला टूटा पड़ा था। चोरों ने अलमारी की नगदी और सोने-चाँदी के जेवरों पर हाथ साफ़ कर दिया था। पुलिस अपनी काग़ज़ी खानापूर्ति करके चली गई थी।

"मैं जानती थी आज कहीं न कहीं चोरी होगी," टीना धीरे-धीरे बड़बड़ा रही थी।

"क्या कह रही है बिटिया, क्या बुदबुदा रही है?" अम्मा नीलू ने प्रश्न किया तो वह बोली कुछ नहीं अम्मा बाद में बताऊँगी। नीलू सोच रही थी कि टीना को जाने क्या हो गया है। कुछ तो बड़बड़ाती रहती है।

उस दिन रविवार था। जमना लालजी का आज अवकाश था। कभी-कभी वे अवकाश के दिन भी कार्यालय चले जाते थे। काम ही इतना ज़्यादा था कि छुट्टी के दिन भी कार्यालय में बैठना पड़ता था। किन्तु आज उनका मूड था कि घर पर ही पत्नी और बच्चों के साथ रहकर वह थोड़ा मनोरंजन करें। खाना खाया और टीना के साथ लूडो खेलने बैठ गए। अचानक दरीवाले की आवाज़ सुनाई पड़ी। टीना कुछ चौंकी और उठकर बाहर भागने लगी। परन्तु कुछ सोचती हुई वापस पलटी और जमना लालजी से बोली, "बापू आज आप भी चलिए न दरीवाले को देखने।"

"क्या! मैं चलूँ, क्यों, क्या मैं बच्चा हूँ?" वे ठहाका मारकर हँसने लगे। "जा तू ही जा उस दरीवाले को देखने।" इतने सारे प्रश्न सुनकर पहले तो वह कुछ नर्वस हुई किन्तु तुरंत सँभल गई।

"नहीं बापू कुछ ख़ास बात है, मैं आपको ...कुछ बताना चाहती हूँ," वह थोड़ी झिझकी और उनका हाथ पकड़कर बाहर खींचने लगी। आख़िर जमना लालजी थे तो एक बेटी के बाप ही, उठकर खड़े हो गए। "कहाँ ले चलती है चल, ये लड़की भी .......," यह कहते हुए उसके पीछे चल दिए।

बाहर उन्हें वह दरीवाला दिखाई दिया। दूसरी गली की और वह मुड़ रहा था।

टीना उन्हें घसीटकर दूसरी गली के किनारे तक ले गई। धीरे से बोली, "बापू यह गली तो आगे बंद है, इसमें से ही किसी घर में आज चोरी होगी।"

"क्या पागलों सी बातें करती है? क्या तू सी.आई.डी. है? तुझे कैसे पता?"

"बापू मैं सच्ची कह रही हूँ। इस गली का कोई घर मालिक ज़रूर ताला लगाकर बाहर गया होगा। उसके यहाँ चोरी होगी।"

जमना लालजी को याद आया की इस गली में रहने वाले उसके एक मित्र रतन लाल जी सुबह ही नागपुर एक विवाह समारोह में गए हैं। उन्होंने पूछा, "तुमने यह कैसे अंदाज़ लगाया कि आज यहाँ चोरी होगी।

"बापू मैं तीन माह से इस दरीवाले को देख रही हूँ। जब भी यह आता है और जिस गली में जाता है, वहाँ चोरी होती है।"

"मगर तुम गारंटी से कैसे कह सकती हो? अंदाज़ ग़लत भी हो सकता है। किसी पर शक़ करना…" वे वाक्य पूरा कर पाते इसके पहले ही टीना चहक उठी।

"बापू अपने घर के सामने पुलिस अंकल रहते हैं उन्हें बताने में क्या हर्ज है।" टीना ने अपनी छोटी सी बुद्धि का गोला दागा।

शाम को जमना लालजी ने अपने पड़ोसी पुलिस इंसपेक्टर शुक्लजी को टीना की बातों से अवगत कराया। उन्होंने सादी वर्दी में एक पुलिस वाले को उस गली के आसपास तैनात कर दिया। रात को तो कमाल ही हो गया। दो चोर रंगे हाथों घर के फाटक के भीतर घुसते हुए पकडे गए।

दूसरे दिन उस दरीवाले को भी पकड़ लिया गया। थाने में ले जाकर जब उसकी पिटाई हुई तो उसने दो दर्जन चोरियों का ख़ुलासा किया जो पिछले तीन साल से शहर में हो रहीं थीं और पुलिस पकड़ने में नाकाम रही थी।

पुलिस इंसपेक्टर शुक्ल ने टीना से पूछा, "बेटी तुमने कैसे जाना कि इस दरीवाले का चोरियों से कुछ सबंध है?"

"अंकल अपने मुहल्ले में जब लगातार दो चोरियाँ हुईं तो मैंने अनुभव किया कि चोरी उसी दिन होती है जब यह दरीवाला आता है। फिर अगली बार जब यह दरीवाला आया तो मैंने उसका चोरी से पीछा किया। उसी दिन उस गली में चोरी हुई जिस गली में वह फेरा लगाने भीतर तक गया था। फिर तो यह निश्चित हो गया कि चोरी और इस दरी वाले के बीच कुछ तो सम्बन्ध है और मैं अपने बापू को साथ ले गई।"

टीना की सूझ बूझ से चोरियों का भंडाफोड़ हो गया।

अब दरीवाला नहीं आता। आएगा कहाँ से! वह तो हवालात में है। टीना की अम्मा को भी अब टीना के बाहर भागने की चिंता नहीं सताती।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें