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ISSN 2292-9754

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08.20.2016


नृत्य-कला में रसों का निर्वाह तथा मनोवैज्ञानिक पृष्ठ-भूमि

यो लीला लास्यसंलग्नो गतोऽलोलोऽपि लोलताम्।
तं लीलावपुषं बालं वन्दे लीलार्थसिद्धये।
1

मानव-हृदय भाव-सदन होता है। स्वेद संकोच आदि सात्विक भावों के संचरण से युक्त संचारी भाव तथा रत्यादि स्थायी भावों से जब हृदय आप्लावित होता है, उस समय मानव सहृदय बन जाता है। "स्थायिभावाः रसाः स्मृताः" के आधार पर रति आदि स्थायी भाव ही विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी भावों के संयोग से शृङ्गारादि रसों के रूप में अभिव्यक्त होते हैं। आचार्य भरत का रस सूत्र "विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः"2, इस सार्वात्रिक सत्य का प्रमाण है। तात्पर्य यह है कि रसिक सहृदयों को होने वाली अलौकिक आनन्दानुभूति ही रस है। ये रस शृङ्गारादि विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त होते हैं।

स्वानुभूत आनन्द की अभिव्यक्ति अंगविक्षेपादि के द्वारा स्वाभाविक रूप से होती है। वस्तुतः चित्त में होने वाला आनन्द जब गात्रविक्षेप के द्वारा व्यक्त होता है, तब वही नृत बन जाता है। नृत ही नृत्य का प्रथम चरण कहलाता है। ताल तथा लय पर आश्रित अंग-विक्षेप से युक्त कला ही नृत है। यह एक स्वाभाविक और मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जब आनन्द का अतिरेक होता है, तब व्यक्ति के पैर स्वतः ही थिरकने लगते हैं, उसका अंग-प्रत्यंग नृत की अभिव्यक्ति करता है। वस्तुतः अंग विक्षेप के मूल में व्यक्ति की मनश्चेतना क्रियाशील होती है। पैरों के थिरकने से पूर्व उसका मनो मयूर नाच उठता है।

नृत के माध्यम से होने वाला आनन्द सहज व लौकिक होता हे। किन्तु जो अलौकिक नृत्य होता है, वह साक्षात् शिव का ताण्डव होता है। शिव द्वारा सम्पादित ताण्डव का सम्बन्ध अनादि है। सृष्टि के बाद प्रलय और प्रलय के पश्चात् पुनः सर्जन जगत् का यह चक्र सनातन है और यही जगत् की गतिशीलता का रहस्य है। (जगत् शब्द गमनार्थक गम धातु से निष्पन्न होता है)। ताण्डव का इतिहास भी इसी रूप में सनातन है।

प्रस्तुत शोध पत्र में ताण्डव के संक्षिप्त इतिहास की चर्चा करते हुए प्रलयकाल में ताण्डव का प्रभाव और उससे निष्पन्न अक्षर ब्रह्म की सिद्धि का संकेत किया गया है। शब्दशास्त्र के ग्रन्थ शब्देन्दुशेखर के मंगल श्लोक में नागेश भट्ट लिखते हैं-

नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नव पञ्चवारम्
उद्धर्तुकामान् सनकादिसिद्धान् एतद् विमर्शे शिवसूत्रजालम्।

(शब्देन्दुशेखर का मंगलाचरण)3

इसका भाव यह है कि ताण्डव की समाप्ति पर भगवान् शिव ने 14 बार डमरु का नाद किया। इस नाद में अकारादि वर्ण समाम्नाय की सृष्टि हुई। ताण्डव के पश्चात् अक्षरों का सर्जन हुआ। यही नादब्रह्म की उत्पत्ति का संकेत है। शास्त्रचिन्तकों ने इस शिवसूत्रजाल का अक्षरों के रूप में साक्षात्कार किया। इन अक्षरों को माहेश्वर सूत्रों के रूप में व्यवस्थित कर शब्दशास्त्र की रचना की गईं, जो इस प्रकार हैं। अइउण्, ऋलृक्, एओङ्, ऐऔच्, हयवरट्, लण्, ञमङणनम्, झभञ्, घढधश् जबगडदश्, खफछठथचटतव्, कपय्, शषसर्, हल्।4

व्याकरण शास्त्र का विख्यात ग्रन्थ अष्टाध्यायी का आधार ये चतुर्दश माहेश्वर सूत्र ही हैं। इनमें स्वर और व्यंजन दोनों समाहित हैं। इन माहेश्वर सूत्रों के सम्बन्ध में यह ध्यातव्य है कि जब सनकादि सिद्ध अक्षर-ब्रह्म की उपासना में लीन थे, तब सहसा शिव जी के डमरु के नाद रूप में उन्होंने अक्षर ब्रह्म का साक्षात्कार किया। यह वह प्रसंग है, जब सिद्ध महर्षियों के तपः प्रभाव से अव्यक्त नाद, व्यक्त होकर तपस्वियों को अभीष्ट की प्राप्ति कराता है। ध्वनि ही अकारादि अक्षरों के रूप में व्यक्त होती है। किन्तु इसके लिये साधना की आवश्यकता होती है।

वाद्यों से अथवा नृत्य के बोलों से जो निराकार ध्वनि उत्पन्न होती है, वह सहृदय श्रोता या दर्शक के कर्णपुटों के माध्यम से हृदय के अन्तःस्थल में प्रविष्ट होकर साकार और सार्थक ब्रह्म का साक्षात्कार कराती है। इसमें सहृदय की संवेदनशीलता ही प्रमुख होती है। एक सामान्य जन को निरर्थक प्रतीत होने वाले ता थै तिग धा इत्यादि बोल रसिक के अन्तःकरण में उस चिन्मय तत्व का बोध कराते हैं, जिसके लिये वह सतत साधना करता रहता है। ता थै आदि बोल उसे कभी शृङ्गार कभी रौद्र और कभी शान्त रस की प्रतीति कराते हैं। वस्तुतः नृत्य कला की रसानुभूति में एक कलाकार के साथ सहृदय सामाजिक की भूमिका अति महत्वपूर्ण होती है।

नृत्त और नृत्य-समस्त कलाओं का उत्स हमारा वेद -वाङ्मय है। दशरूपककार ने स्पष्ट कहा है-

उद्धृत्योद्धृत्य सारं यमखिलनिगमान्नाट्यवेदं विरिञ्चि-
श्चक्रे यस्य प्रयोगं मुनिरपि भरतस्ताण्डवं नीलकण्ठः।
शर्वाणी लास्यमस्य प्रतिपदपरं लक्ष्म कः कर्तुमीष्टे
नाट्यानां किन्तु किञ्चित्प्रगुणरचनया लक्षणं क्षिपामि।

(दशरूपक -1.4)5

नृत्यकला का उद्गम भी वेद ही है। व्युत्पत्ति की दृष्टि से नृत्त और नृत्य, दोनों शब्द एक ही नृती धातु से निष्पन्न हैं। नृती का अर्थ है- गात्रविक्षेप। अभिनय दर्पण के अनुसार भावश्रयं नृत्यम्। (नृत धातु से व्याकरण का क्यप् प्रत्यय नृत्य शब्द सिद्ध होता है।) गात्रविक्षेप में अंगविक्षेप अधिक होता है, अतः इसमें आंगिक अभिनय का बाहुल्य होता है। दशरूपककार के अनुसार नृत्त-ताललयाश्रयम्। चञ्चत् पुटादि ताल और द्रुतादि लय से युक्त, अंगविक्षेप से युक्त, अभिनयशून्य नृत्त होता है। अन्यद् भावाश्रयं नृत्यम्। अर्थात् नृत्य भावों पर आश्रित होता है। नृत्य कला विशारदों को लोक में नर्तक कहते हैं। नृत्य पदार्थाभिनयात्मक होता है। इसे मार्ग भी कहते हैं। नृत्त को देशी कहते हैं। इनमें जो मधुर होता है वह लास्य और जो उद्धत होता है, वह ताण्डव है।  

मधुरोद्धतभेदेन तद् द्वयं द्विविधं पुनः
लास्यताण्डवरूपेण नाटकाद्युपकारकम्।

(दशरूपक)6

नाट्य- इसमें में चारों प्रकार के अभिनय होते हैं। दशरूपककार नृत्य और नाटृय में स्पष्ट भेद करते हुए कहते हैं- नृत्य कला विशारद नर्तक कहलाते हैं। नट नहीं। नृत्य केवल देखने की चीज़ है। इसमें श्रवणीय कुछ नहीं। कथोपकथन का इसमें अभाव है। लौकिक व्यवहार में यह प्रेक्षणीय (दृश्य) होता है।

साश्रयान्नाट्याद् नृत्यमन्यदेव।
नृतेर्गात्रविक्षेपार्थत्वेनागिकबाहुल्यात्,
तत्कारिषु च नर्तकव्यपदेशाल्लोकेऽपि अत्र
प्रेक्षणीयकम् इति व्यवहारान्नाटकादेरन्यन्नृत्यम्।7

नाट्य शब्द नट अवस्पन्दने धातु से निष्पन्न है। इसमें सात्विक अभिनय का बाहुल्य होता है। इसे सम्पादन करने वाले को नट कहते हैं। नाट्य वाक्यार्थाभिनयात्मक होता है और नृत्य पदार्थाभिनयात्मक होता है। नाटक रस का विषय होता है। जिस प्रकार नृत्य और नाट्य में भेद बताया गया है, उसी प्रकार नृत्त और नृत्य भी भिन्न हैं। यद्यपि दोनों में गात्रविक्षेप समान रूप से होते हैं, तथापि नृत्य में अनुकरण होता है, नृत्त में नहीं। नाट्य अैार नृत्त भी भिन्न हैं। रासेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण की 16 कलाओं में युक्त नृत्य कला में सत्य, शाश्वत और आनन्दमय ब्रह्म का साक्षात्कार होता है, यह अनुभूति गम्य है।

नृत में अंगविक्षेप है तो, नृत्य में नेत्रकटाक्षादिजन्य भावों का निवेश दृष्टिगत होता है। वस्तुतः शिवजी के ताण्डव नृत के अनन्तर शंकर के क्रोध को शान्त करने की दृष्टि से आनन्द एवं आह्लाद रूप् लालित्य का अनुभव करने के लिये पार्वतीजी द्वारा लास्य प्रस्तुत किया जाता है। यह लास्य नेत्रों के भूविलास से युक्त होता है। अलौकिक और अनिर्वचनीय यह लास्य शृङ्गसर रस की अभिव्यक्ति करता हुआ सहृदयों को उस भावभूमि पर पहुँचाता है, जो शब्दवाच्य नहीं होती। नृत और लास्य के इस अपूर्व संयोग से नृत्य की उत्पत्ति होती है। इस सम्बन्ध में दशरूपककार लास्य को ही नृत्य संज्ञा देते हैं।

अंगविक्षेप तथा भावरूप नृत्य से विभिन्न रसों की अभिव्यक्ति किस प्रकार होती है, इस विषय में रसों का मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक स्वरूप के चिन्तन का यह उपक्रम है। सर्वप्रथम शृङ्गार रस की अभिव्यक्ति के प्रसंग में मंचीय प्रदर्शन के समय कलाकार अपनी दृष्टि कुछ वक्र करते हुए नेत्रों से भू्रविलास प्रदर्शित करता है उसका मुखमण्डल मंद स्मित करता हुआ दर्शकों में रोमांच उत्पन्न करता है। लौकिक जगत् में भी ऐसे कुछ भाव और चेष्टायें शृङ्गार प्रेमियों में दिखाई देती हैं।

इस विषय को पुष्ट करता है। नाट्य शास्त्र के आचार्यों ने नृत्याभिनय के समय विविध शिरोभेद और दृष्टिभेदों का वर्णन किया है, वे सभी रस के पोषक हैं, और सहृदय दर्शकों के मनोभाव के अभिव्यंजक हैं। अभिनय की दृष्टि से दर्पणकार षिर के आठ भेदों का उनके विनियोग के साथ वर्णन करते हैं। यथा-

सममुद्वाहितमधोमुखमालोलितं धुतम्।
कम्पितं च परावृत्तमुत्क्षिप्तं परिवाहितम्।
नवधा कथितं षीर्शं नाट्यषास्त्रविषारदैः।

(अभिनय दर्पण 49)8

सम, उद्वाहित, अधोमुख, आलोलित, धुत, कम्पित, परावृत्त, उत्क्षिप्त, परिवाहित।

इनमें सम के सम्बन्ध में दर्पणकार कहते हैं- निश्चलं सममाख्यातं यन्नत्यिुन्नतिवर्जितम्। (अभिनय दर्पण-51)9

नृत्य करती हुई नृत्यांगना जब अपना शीर्ष सम या निश्चल अवस्था में रखती है, तब दर्शक भी अपनी दृष्टि को स्थिर व अचल रखता है। इस अवस्था में वह शांत रस की अनुभूति करता है। नृत्य में अधोमुखी मुद्रा देखकर दर्शक का मानस लज्जा, खेद या चिन्ता के भाव करता हुआ नर्तक का मुख मण्डल सामाजिकों के हृदय की करुणा जाग्रत करता है, और करुण रस की संवेदना को क्रियाशील करता है।

उद्वाहित षिर में मुख को उपर उठाया जाता है। अधोमुख होने पर लज्जा, खेद प्रकट होता है। भयभीत होने की स्थति में मुख को इधर-उधर घुमाया जाता है। ये विभिन्न अंगविन्यास भिन्न -भिन्न मनो भावों के द्योतक हैं, जो तत्तत् रसों की अनुभूति के परिचायक हैं। (वामदक्षिणभागेशु चलितं तद्धुतं षिरः। अभिनय दर्पण-86)10

निशेध, विस्मय, विशाद, भय इत्यादि भावों में इसका विनियोग बताया गया है। सिर को कम्पित करते हुए नृत्य करना क्रोध, आवाहन या तर्जना का प्रतीक है। क्रोध, लज्जा, अनादर आदि भावनाओं को परावृत्त सिर के द्वारा व्यक्त किया जाता है। चंवर के समान सिर को हिलाया डुलाया जाता है, तब मोह, विरह, स्तुति, चिन्तन इत्यादि भाव व्यक्त होते हैं। नर्तकी मात्र सिर की चेष्टाओं द्वारा इन भावों को अपनी कला में रूपायित करती है। ये समग्र विन्यास मनुष्य अपने नित्य व्यवहार में अनुभव करता है। यही रसास्वादन कला के व्यावहारिक पक्ष को उद्घाटित करता है। अभिनयदर्पण-59, 60, 62, 65)11

अभिव्यक्ति का व्यावहारिक पक्ष- नृत्य करते समय दृष्टि के अभिनय भी विविध भावों के संचार में सहायक होते हैं। पूर्वाचार्यों ने सम, आलोकित, प्रलोकित, निमीलित, अनुवृत्त इत्यादि टृष्टिभेदों का वर्णन किया है। दर्पणकार ने दृष्टि के भी 8 भेद करते हुए नृत्याभिनय के विविध अभिनय प्रकारों का उल्लेख किया है।

सममालोकितं साची प्रलोकितनिमीलिते।
उल्लाकितानुवृत्तेच तथाचैवावलोकितम्।
इत्यष्टौ दृष्टिभेदाः स्युः कीर्तिताः पूर्वसुरिभिः।

(अभिनय दर्पण 66)12

अपलक नेत्रों से देखना सम दृष्टि देखना, साची, आँखें खोलकर देखना, आलेकित, तिरछी या वक्र दृष्टि से देखना साची, अधखुली आँखें, उल्लोलित दृष्टि, अनुवृत्ति, अवलोकन, इन समस्त दृष्टि भेदों का विनियोग भिन्न-भिन्न भावधाराओं में होता हैं।

नृत्य विषयक ये समस्त पारिभाषिक एवं शास्त्रीय भेद-प्रभेद एवं विन्यास मात्र नर्तकों में ही सन्निविष्ट नहीं हैं, अपितु लोक में और व्यवहार जगत् में भी इन चेष्टाओं का अति स्वाभाविक प्रकाशन होता रहता है। जब हम हँसते हैं, तब हमारे मुखमण्डल का भाव विन्यास नृत्य के माध्यम से अभिव्यक्त होता है । इसी प्रकार कोई कारुणिक प्रसंग देखकर हमारे मुख पर छाने वाली उदासी, शोक नामक स्थायी भाव से युक्त होकर नृत्य पीठिका पर करुणरस अभिव्यक्त हो जाता हैं।

एक प्रचलित एवं सामान्य अनुभव के द्वारा यह स्पष्ट किया जा सकता है । जब कोई व्यक्ति किसी के प्रति अति क्रोधाविष्ट होता है, तब स्वाभाविक रूप से इसका मुख लाल हो जाता है, भृकुटि तन जाती हे। अंगों में कम्पन होने लगता है। वस्तुतः रौद्र रस का स्थायी भाव उसके आचरण में स्पष्ट झलकता है। वीर रस की अभिव्यक्ति में जो चेष्टाएँ की जाती हैं, वे पहलवानों की कुश्ती में दृष्टिगत होती हैं। कुश्ती में स्पर्धक अपने हाथ-पैरों से विविध पैंतरे बदलते हैं और प्रतिस्पर्धी से टक्कर लेते हैं। ये क्रियायें मंच पर नृत्याभिनय में देखी जाती हैं। तात्पर्य यह है कि नृत्याभिनय के अन्तर्गत जो दृष्टिभेद और शिरोभेद का परिगणन किया गया है, वह अति व्यावहारिक है। और प्रत्यक्ष अनुभव का विषय है।

आंगिक अभिनय के अतिरिक्त कुछ वाचिक या शाब्दिक प्रतिक्रियायें भी होती हैं,जो अभिनय में पूरक या सहायक होती हैं।

उदाहरणार्थ- जटाटवीगलज्जलत्प्रवाहपावितस्थले।
गलेवलम्बिलम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।

(शिवताण्डव स्तोत्र 1)13

रावण विरचित शिवताण्डव स्तोत्र की यह शब्दावली अक्षरों के विन्यास और ध्वनि के प्रभाव से नर्तक के दृष्टि-अभिनय के साथ-साथ विभिन्न संचारी भावों को उत्पन्न कर रौद्र रस की प्रभावी अभिव्यक्ति कराता है। स्तोत्र में पठित कठोर अक्षरों के विन्यास से ही नर्तक का क्रोध या अमर्श नामक स्थायी भाव अनायास ही विभावादि से संयुक्त होकर रौद्र रस में परिणत हो जाता है। झणज्झाणितकंकणक्वणितकिंकिणीकं धनुः14 इत्यादि पदावली भवभूति के चित्त का स्थायी भाव उत्साह, झटिति वीर रस को प्रत्यक्ष कर दर्शकों के हृदय में प्रविष्ट हो जाता है। अक्षर-संयोजन के आधार पर काव्य-गुण (काव्य में माधुर्य, ओज और प्रसाद ये तीन गुण माने गये हैं।) और रसों का निर्धारण किया गया है।

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र में -

अयि गिरि नन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्द नुते।
गिरिवरविन्ध्यशिरोधिनिवासिनि विश्णुविलासिनि जिश्णुनुते।15

स्तोत्र के इन उदात्त और ओजस्वी शब्दों प्रयोग करते हुए जिस रूप में नृत्य की प्रस्तुति की जाएगी, महिषासुरमर्दिनी वैसे ही विकराल स्वरूप में साक्षात् प्रकट होगी।

नृत्य और हस्तमुद्रायें-नृत्याभिनय के अन्तर्गत कतिपय हस्तमुद्राओं और पाद मुद्राओं का भी वर्णन मिलता है। इनमें अनेक भेद-प्रभेद किये गये हैं। ये सभी आंगिक अभिनय को लक्षित करते हैं। साहित्य शास्त्र की दृष्टि से विचार करें, तो हमें ज्ञात होता है कि साहित्य-शास्त्रीय छन्दों के इतिहास की परम्परा अति प्राचीन है। छन्दों को वेदाङ्ग कहा गया है। वेदरूपी विराट पुरुष के पैरों को दन्द कहा गया है । छन्दः पादौ तु वेदस्य-(पाणिनि-शिक्षा)16 गत्यर्थक छदि धातु से छन्द शब्द निष्पन्न होता है। गति का सम्बन्ध पैरों से है। छन्दों में यदि पदों की गति ध्यातव्य है, तो नृत्य में पदादि अंगों की गति दर्शनीय होती है। यही कारण है कि विभिन्न कवित्तों के आधार पर नृत्य की परम्परा स्थापित है।

संस्कृत-साहित्य में नृत्य-शैली के आधार पर कतिपय छन्दों का निर्धारण किया गया है। मन्दाक्रान्ता एक ऐसा छन्द है, जो मन्द-मन्द गति करती हुई रमणी की ओर संकेत करती है। यही कारण है कि महाकवि कालिदास ने सम्पूर्ण मेघदूत नामक खण्डकाव्य मन्दाक्रान्ता छन्द आबद्ध किया है। यह काव्य एक नर्तक को मञ्च तथा नृत्य को अवकाश प्रदान करता है। नृत्य के मंच पर समस्त वाद्यवृन्द के मध्य साक्षात् भक्ति, ज्ञान और वैराग्य तीनों संयुक्त रूप से नृत्य करते हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण के माहात्म्य में व्यास जी कहते हैं-

ननर्त मध्ये त्रिकमेव तत्र भक्त्यादिकानां नटवत्सुतेजसाम्।
अलौकिकं कीर्तनमेतदीक्ष्य हरिः प्रसन्नोऽपि वचोऽब्रवीत्तत्।

(श्रीमद्भागवत-माहात्म्य 6.87)17

तत्वतः नृत्यकला कलाकार को सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार कराता है और विगलितवेद्यान्तर संस्पर्शशून्य अलौकिक रसानुभूति कराते हुए, नर्तक और दर्शक दोनों को ही निर्विकल्पक, शब्दातीत समाधि में अवस्थित करा देती है।

यही तो अहं ब्रह्मास्मि की अनुभूति है।

प्रस्तुतकर्त्री
डा. पूर्णिमा केलकर
चलभाश-9098128397
सहायक -प्राध्यापक (संस्कृत -विभाग)
इन्दिरा कला सङ्गीत विश्वविद्यालय
खैरागढ़

सन्दर्भ-सूची

1-श्रीमद्भागवत-प्रथ्मस्कन्ध-मंगलाचरण
2-भरत का नाट्यसूत्र-
3-शब्देन्दुशेखर का मंगलाचरण
4-अष्टाध्यायी माहेश्वर सूत्र
5-दशरूपक-1.4
6-दशरूपक-1.7
7- दशरूपक-1.7 टीका
8-अभिनय दर्पण-49
9-अभिनय दर्पण-51
10-अभिनय दर्पण-86
11-अभिनय दर्पण 59, 60, 62,65
12-अभिनय दर्पण 60
13-शिवताण्डव स्तोत्र-1
14-उत्तररामचरित-6.1
15-महिशासुरमर्दिनी स्तोत्र (श्री रामकृष्ण कविकृत)-1
16-पणिनि शिक्षा-41
17-श्रीमद्भागवत माहात्म्य-6.87

नृत्यकला की इस भावधारा को शतशः नमन-


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