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ISSN 2292-9754

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05.12.2016


स्वामी विवेकानन्द का वेदान्त-विज्ञान

शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः आये धामानि दीव्यानि तस्थुः
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तं आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्।1
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्थाः विद्यतेयनाय।2

दार्शनिक चिन्तन की अविरल धारा विद्वान् मनीषियों के जीवन में सतत प्रवाहित होती रही है। उनका व्यक्तित्व ही दार्शनिक पृष्ठभूमि को अभिव्यक्त करता है। "रत्नगर्भा वसुन्धरा" कहलाने वाली इस भूमि पर ऐसे भासवान् रत्नों का आविर्भाव हुआ, जिन्होंने अपनी प्रखरता से समस्त विश्व को उद्भासित किया है। इन रत्नप्रवर में से एक ऐसा रत्न है, जिसने औचित्यपूर्ण विवेक-बुद्धि एवं आध्यात्मिक आनन्दानुभूति के द्वारा विश्व-मञ्च पर भारत की मनीषा को स्थापित किया।

ऐसे ओजपूर्ण रत्न हैं स्वामी विवेकानन्द। स्वामीजी की आध्यात्मिक यात्रा तत्त्वमसि इस महावाक्य से आरम्भ होकर अहं ब्रह्मास्मि इस अनुभव-वाक्य में पर्यवसित होती है। गुरु रामकृष्ण परम हंस द्वारा अध्यारोप से युक्त बालक नरेन्द्र को यह अनुभव कराया गया कि तुम्हारे भीतर ही परमात्मा है, तुम ही ईश्वर हो। तत्त्वमसि इस महावाक्य की अनुभूति से ही विवेकानन्द का प्रादुर्भाव हुआ। इस आत्मसाक्षात्कार के अनन्तर ही स्वामीजी की वेदान्त-दृष्टि जाग्रत हुई।

आपका वेदान्त-चिन्तन इस प्रकार है – 1886 में हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय लण्डन द्वारा आयोजित दर्शन-परिषद् के कार्यक्रम में सर्व धर्म सम्मेलन में व्याख्य़ान देते हुए स्वामीजी ने वेदान्त विषयक चिन्तन प्रस्तुत किया।

स्वामीजी के अनुसार सभी दर्शनों का आधार वेदान्त दर्शन ही है। सांख्यादि समग्र दर्शनों का पर्यवसान वेदान्त में ही होता है। वस्तुतः आस्तिकता को परिभाषित करते हुए स्वामीजी कथन करते हैं कि स्वयं पर विश्वास रखना ही आस्तिकता है। अर्थात् स्वयं का अस्तित्व ही ईश्वर है। स्वामीजी के अनुसार स्वात्मा की आवाज़ सुनो तथा स्वयं को जानो। इन कथनों की पुष्टि हेतु "आत्मानं रथिनं विद्धि"3 यह श्रुति प्रमाण प्रस्तुत किया गया है। स्वामीजी का वेदान्त दर्शन माधवाचार्य के द्वैत से आरम्भ होता है, एवं अद्वैत पर पर्यवसित होता है।

वस्तुतः अनेकता से एकता की ओर बढ़ना तथा भेद-दृष्टि से अभेद-दृष्टि की ओर प्रवृत्त होना, यह मनुष्य की स्वाभाविक मनोवैज्ञानिकता है। व्यष्टि से समष्टि का यह क्रम स्वामीजी ने समाज को दिया है।

यद्यपि द्वैत और अद्वैत के मध्य स्वामीजी ने रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैत की चर्चा की तथापि, उनका एकमात्र लक्ष्य जीव ब्रह्म ऐक्य से युक्त अद्वैतभाव को स्थापित करना ही रहा। आपने दर्शन की गूढ़ परिधि से निकाल कर व्यावहारिक वेदान्त को स्थापित किया है। वस्तुतः वेदान्त के सन्दर्भ में उपनिषदों को ग्रहण किया जाता है। श्रुति भी वेदान्त का एक पर्याय है। स्वामीजी का मानना है कि वेदान्त-दर्शन से वैज्ञानिकता एवं प्रगतिशीलता व्यक्त होती है।

स्वामीजी कहते हैं कि वेदान्त तो गतिशीलता का वाचक है। विभिन्न दर्शनों का सृष्टि-क्रम स्वामीजी एक नवीन दृष्टि के साथ स्वीकार करते हैं। आप सांख्य की प्रकृति तथा पुरुष को स्वीकार करते हैं। प्रकृति ही आत्मतत्त्व हैं।

वेदान्त-दर्शन के आधार पर सर्वव्यापी अचेतन आकाश तथा चेतन प्राण से स्थूल शरीरोत्पत्ति होती है। तात्पर्य यह है कि आकाश अर्थात् अवकाश जिसे वैज्ञानिक स्पेस कहते हैं। वस्तुतः जहाँ रिक्त स्थान अर्थात् वेक्यूम रहेगा वहीं प्राणों का सञ्चरण सम्भव है। वस्तुतः चैतन्य स्वरूप प्राण में ही गुरुत्वाकर्षण शक्ति अवस्थित रहती है। यही कारण है कि यदि कोई वस्तु ऊपर की ओर उछाली जाय तो पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के परिणाम स्वरूप वह नीचे की ओर ही आती हुई दिखायी देती है। तात्पर्य यह है कि अचेतन आकाश में चेतन प्राण के सञ्चरण से पञ्चीकरण के अनन्तर पृथ्वी में ही स्थूल शरीर का निर्माण होता है। अतः समस्त आकाश, जल, अग्नि से युक्त चैतन्य स्वरूप प्राण पृथ्वी पर आकर गुरुत्वाकर्षण शक्ति के रूप में एकत्रित हो जाता है।

स्वामीजी ने हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय में यह स्पष्ट कर दिया था कि वेदान्त मात्र जीव और ब्रह्म को सम्बद्ध करने का दर्शन नहीं है, अपितु विज्ञान के सिद्धान्तों का प्रतिपादन भी करता है। स्वामीजी सृष्टि के सन्दर्भ में पुनः विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि आकाश में प्राण के सञ्चरण के अनन्तर महत् तत्त्व लक्षित होता है। महत् के बाद यह सृष्टि क्रम इसी तरह बढ़ता रहता है। यथा अहङ्कार का निर्माण होता है।

वस्तुतः शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध ये पाँच तन्मात्रायें सूक्षम भूत के रूप में लक्षित होती हैं।

स्वामीजी ने वेदान्त की सत्ताओं के सन्दर्भ में विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि पार्मार्थिक, प्रातिभासिक तथा व्यावाहारिक ये तीन सत्तायें स्थापित हैं। वस्तुतः पारमार्थिक सत्ता तो अध्यारोप के पश्चात् अपवाद की स्थिति में जीव को अनुभूत होती है। इस स्थिति में वह जान लेता है कि अज्ञानोपहित चैतन्य का आवरण हट चुका है, तथा शुद्ध चैतन्य ही शेष है।

प्रातिभासिक सत्ता में जगत् ब्रह्म का विवर्त है। विवर्त अर्थात् "सतत्त्वतोऽन्यथा प्रथा विवर्त इत्युदीर्यते" वेदान्त सार। रस्सी में सर्प का भ्रम ही रज्जु सर्प विवर्त कहलाता है। स्वामीजी के शब्दों में विवर्त अर्थात् भ्रम। विवर्त की स्थिति में जीव जगत् को ही ब्रह्म समझने लगता है। जगत् में ब्रह्म का आभास माया के कारण होता है। यही प्रातिभासिक सत्ता है। वस्तुतः माया ब्रह्म की वह शक्ति है, जो जगत् का निर्माण करती है।

माया के सम्बन्ध में स्वामीजी के विचार इस प्रकार हैं। आकाश से प्राण, प्राण से महत् एवं महत् से अहङ्कार तथा अहङ्कार से मन आदि इन्द्रियों की उत्त्पत्ति होती है। आत्मा, बुद्धि और मन की त्रिवेणी के बिना चक्षु आदि इन्द्रियाँ कोई प्रतिक्रिया नहीं दे सकतीं।

यथा कोई वस्तु दृष्टि के सामने है किन्तु मन के संयोग के बिना नेत्र उस वस्तु को देख नहीं पाते। तात्पर्य यह है कि शारिरिक नेत्र केवल यन्त्र रूप हैं आत्मा से बुद्धि का और बुद्धि से मन का जब तक संयोग नहीं होता, तब तक नेत्रादि इन्द्रियाँ अपने-अपने कार्यों की ओर प्रवृत्त नहीं होतीं।

इस सत्य का उद्घाटन मनोविज्ञान करता है। नेत्रों के सामने रखी गई कोई वस्तु आत्मा में प्रतिबिम्बित होती है, आत्मा से बुद्धि अर्थात् मस्तिष्क में उस वस्तु का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है अध्यवसायी बुद्धि से मन पर उसका प्रतिबिम्ब पडता है। भौतिक शास्त्र का यही सिद्धान्त है। अनन्त अर्थात् आत्मा में स्थित किसी वस्तु का प्रतिबिम्ब फोकस अर्थात् स्थिर बुद्धि पर पड़ता है।

जिस प्रकार कैमेरे से छायाचित्र लेते समय अलग-अलग किरणें एक साथ कैमेरे पर चित्र के रूप में अंकित होती हैं। उसी प्रकार विभिन्न जीवात्मायें अद्वैत रूप में एक साथ परमात्मा में व्यक्त होती हैं।

वस्तुतः यह समष्टि दर्शन, शिकागो में आयोजित धर्म सभा में लक्षित होता है। यथा -

जब विवेकानन्दजी ने शिकागो की जनता को सम्बोधित करते हुए कहा था कि All The Sister’s And Brother’s Of America इस सम्बोधन में ही वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना निहित है। समग्र सृष्टि में ऐक्य तथा अद्वैतत्व लक्षित होता है। यह वेदान्त का अन्तिम सत्य है। यही कारण है कि धर्मसभा में बैठी समस्त जनता यह सम्बोधन सुन कर मन्त्रमुग्ध हो गई। यही तो वास्तविक Globalaztion है।

स्वामीजी ने वेदान्त के जीवनमुक्त के सन्दर्भ में विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि जब मनुष्य की सभी ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं, तथा सभी शंकाओं का निवारण हो जाता है तब वह जीवित रहते हुए भी किसी मोह में आबद्ध नहीं होता।

इस सन्दर्भ में वेदान्तसार में कहा गया है –

"भिद्यते हृदय ग्रन्थिश् छिद्यन्ते सर्व संशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि, तस्मिन् दृष्टे परावरे।।4

स्वामीजी की शक्ति का केन्द्र युवा है। उन्होंने कहा था "युवाओ, जागो तुम में असीम शक्ति है, लक्ष्य की प्राप्ति तक कर्म करते रहो" इस सन्दर्भ में युवाओं को उद्बोधित करते हुए,स्वामीजी ने कहा था कि

"उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत" इससे यह प्रमाणित होता है कि कर्म से मनुष्य की आत्मशक्ति जाग्रत होती है।

सारतत्त्व यही है कि स्वामी विवेकानन्द साक्षात् सत् चित् आनन्द रूप नियन्त्रक भगवान् शिव के अवतार हैं। स्वामीजी की तेजोमयी बुद्धि विश्व में अलौकिक ज्योति का सञ्चार करती है। इस सन्दर्भ में प्रो. राईट ने कथन किया है कि "हम सबकी बुद्धि का योग करने पर भी सब की बुद्धि से कहीं अधिक तीव्र स्वामीजी की बुद्धि है।

भास्कर वत् उद्भासित होने वाले शिवस्वरूपविवेकानन्दजी के विचार नूतनता का अनुभव कराते रहेंगे।

"मूर्त महेश्वरमुज्वलभास्करमीष्टममरनर वन्द्यम्,
वऩ्दे वेदतनुमुज्झितगर्हितकाञ्चनकामीनिबन्धम्।
को़टिभानुकरदीप्तसिंहमहोकटितटकौपीनवन्तम्
अभिरभिहुङ्कार नादित दिङ्मुख प्रचण्ड ताण्डव नृत्यम्।
नौमि गुरु विवेकानन्दम्।5

प्रस्तुतकर्त्री
डॉ. पूर्णिमा केलकर
सहायक-प्राध्यापिका संस्कृत-विभाग
(इन्दिरा कला सङ्गीत विश्वविद्यालय
खैरागढ

संकेत-सूची

1. शृण्वन्तुव विश्वे -श्वेताश्वतरोपनिषद् 2-5, प्रकाशक चौखम्बा प्रकाशन वाराणसी, प्रकाशन-वर्ष 1980,
2. नान्यः पन्थाः 2–8 श्वेताश्वतरोपनिषद् चौखम्बा प्रकाशन वाराणसी, प्रकाशन वर्ष 1980
3. आत्मानं - कठोपनिषद् 3-1-3 (तृतीय वल्ली, अध्याय 1, श्लोक 3) चौखम्बा प्रकाशन वाराणसी, प्रकाशन-वर्ष 183
4. भिद्यते हृदय ग्रन्थि- वेदान्तसार जीवनमुक्त लक्षण (मुण्डकोपनिषद् 2.2.8, चौखम्बा प्रकाशन वाराणसी, प्रकाशन-वर्ष 1980
5. मूर्त महेश्वर-श्री विवेकानन्द गीति स्तोत्रम् शरद् चन्द्र चक्रवर्ती प्रणीत – रामकृष्णमठ नागपुर प्रकाशन, प्रकाशन-वर्ष 1980


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