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03.06.2008
 

जिसे नसीब ने बख्शा उसे गवां बैठे
पारुल


जिसे नसीब ने बख्शा उसे गवां बैठे
बंद मुट्ठी से जैसे रेत फ़िसल जाती है

किसी ग़रीब की बाँधी हुयी अठन्नी ज्यों,
भीड़ के रेले में चुपचाप बिछ्ड़ जाती हैं

हाथ खाली हुए, धड़कनें बेमक़सद सी
ख़ाक उड़ती हुई पैरों से लिपट जाती है

अब कहाँ जायें, आवाज़ दें, पुकारें उसे
ख़ौफ़ ए रूसवाई है…तनहाई बढ़ी जाती है


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