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05.01.2014


गर है कहीं तो आकर

गर है कहीं तो आकर जलवा दिखा मुझे
गर है नहीं तो निजात वहम से दिला मुझे

तेरे फरेब ने ता-उम्र परेशाँ मुझे रखा
मेरे यकीन से भी, न कुछ हासिल हुआ मुझे

एक बिसात सी बिछी है, तेरे इश्क की जहाँ मे
तेरे दर का ही न बस कहीं पता चला मुझे

ज़िन्दगी जो तेरी थी तो मैं कहाँ पे था
किसका हिसाब दूं तुझे, अब तू ही बता मुझे

यह दैर-ओ-हरम है क्या, यह मैख़ाने हैं किसके
ऐ साकी कहीं पिला, लेकिन पिला मुझे

हाथों की लकीरें भी अब चेहरे पे नज़र आतीं हैं
लेकिन इस सफ़र में आख़िर क्या मिला मुझे


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