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ISSN 2292-9754

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08.19.2016


नरेश मेहता के काव्य मे सांस्कृतिक चेतना

काव्य-पुरुष नरेश मेहता भारतीय साहित्य के उन शीर्षस्थ साहित्यकारों में से एक हैं जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से एक ऐसे सांस्कृतिक महाभाव की सर्जना की है जिसमें आर्ष सांस्कृतिक सम्पन्नता, औपनिषदिक मेधा एवं वैष्णवता पर आधारित भारतीय अस्मिता प्रवाहमान हैI रागात्मकता, संवेदना तथा उदात्तता उनकी सर्जना के केन्द्रक तत्त्व रहे हैं। मानवीय स्वतंत्रता एवं मानवीय उदात्तता की ओर उनकी रचनाधर्मिता निरंतर गतिशील रही है………I यही कारण है कि इनका काव्य समय का सहगामी होते हुए भी मानवता के भविष्य का दिशा-बोध कराता है और उन्हें एक कालजयी कृतिकार बनाता है।

साहित्यकार को समाज का सर्वाधिक संवेदनशील प्राणी माना गया है; वह अपने देखे-सुने-भोगे अनुभवों को ही साहित्य में चित्रित करता है और यदि इस दृष्टि से देखा जाये तो नरेश मेहता त्रिकालदर्शी हैं। वर्तमान को अतीत और भविष्य के मध्य रखकर उसकी महत्ता का ऐसा भव्य और उदात्त चित्र प्रस्तुत करते हैं कि जिसके समकक्ष दूसरा कोई कर ही नही सकता। ऐसे बहुमुखी प्रतिभा-प्रसन्न साहित्यकार ने काव्य के अतिरिक्त उपन्यास, नाटक, एकांकी, निबंध, यात्रावृत्त आदि विधाओं को भी अपनी लेखनी से धन्य बनाया है। उनकी कृतियों का ब्यौरा इस प्रकार है: बनपाखी सुनो(1957), बोलने दो चीड़ को(1961), मेरा समर्पित एकांत(1962), संशय की एक रात(1967), महाप्रस्थान(1975), प्रवाद-पर्व(1977), शबरी(1977) , उत्सवा(1979), तुम मेरा मौन हो(1982), अरण्या(1985), प्रार्थना(1985), आखिरी समुद्र से तात्पर्य(1988), पिछले दिनों नंगे पैरौं(1989), देखना एक दिन(1990)। उपन्यासों में- डूबते मस्तूल, वह पथ बंधु था, धूमकेतु:एक श्रुति, नदी यशस्वी है, दो एकांत, प्रथम फाल्गुन तथा उत्तरकथा आदि प्रमुख है। चार नाटक उपलब्ध हैं- सुबह के घंटे, खंडित यात्राएं, सरोवर के फूल तथा पिछली रात की तरफ।

संस्कृति, साहित्य और समाज का बड़ा गहरा संबंध है। संस्कृति यदि समाजसापेक्ष है तो समाज संस्कृति-चालित। संस्कृति एक प्रकार की आभ्यंतरिक परिष्कृति है-यह व्यक्ति के व्यक्तित्व का परिष्कार करती है उसे संस्कार देती है। "संस्कार व्यक्ति के भी हो सकते हैं और जाति के भी। जातीय संस्कारों को ही संस्कृति कहते हैं।"1 भारतवर्ष की संस्कृति की सर्जना में यहाँ के कवियों का स्तुत्य योगदान रहा है। जहाँ तक नरेश मेहता के रचना-संसार में सांस्कृतिकता का प्रश्न है तो यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि इनकी कृतियों में रचना के बहाने भारतीय संस्कृति की प्राणस्थानिक विवेकमयी वृत्तियों की ही विवृत्ति हुई है। ऐसे संस्कृतिविशिष्ट कवि की सांस्कृतिक चेतना का अनुशीलन निम्न शीर्षकों में करना अधिक समीचीन प्रतीत होता है (ध्यातव्य है हमारा विवेच्य विषय केवल नरेश मेहता के काव्य-ग्रंथों तक सीमित है) –

1. संस्कृति का चिंतनपरक अनुशीलन
2. संस्कृति की नीतिपरक विवेचना

(अ) संस्कृति का चिंतनपरक अनुशीलन :

सामान्य रूप से, चिंतन का अर्थ होता है-सोचना, विचारना। सोच-विचार की कोई सीमा-निर्धारण नहीं होती है; इसकी सीमा अनंत है। मानवीय मेधा जहाँ-जहाँ पहुँच सकती है, जिनको अपने चिंतन का विषय-वस्तु बना सकती है, वे सारी चीज़ें इसमें आ जाती हैं। इस अर्थनिष्पत्ति के आलोक मे जहाँ तक संस्कृति के चिंतनपरक स्वरूप का संबंध है, ध्यातव्य है कि इसमें दो घटकों का अध्ययन अपेक्षित है। एक- सांस्कृतिक चिंतन का दार्शनिक आयाम और दूसरा है- संस्कृति चिंतन का शास्त्रीय आयाम। अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है—

1. संस्कृति-चिंतन का दार्शनिक आयाम
2. संस्कृति-चिंतन का शास्त्रीय आयाम

(क) संस्कृति-चिंतन का दार्शनिक आयाम :

"दर्शन हमारे सामने अणु तथा विराट जगत के असंख्य रूपों को उपस्थित करता है,जीवन की अनगिनत संभावनाओं एवं दृष्टियों की उदभावना करता है और जीवन तथा जगत के असंख्य संबंधों की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है। इस प्रकार दर्शन हमें जीवन की क्षुद्र स्थितियों में ऊपर उठाकर विश्व-ब्रह्माण्ड की हलचल के केंद्र में स्थापित कर देता है।"2

 जीवन को दर्शन से अलग नहीं किया जा सकता है क्योंकि दर्शन के ही माध्यम से ही मानव को जीव, ब्रह्म, माया, मोक्ष, संसार आदि के वास्तविक स्वरूप का यथार्थ बोध होता है। चूँकि भारतीय दर्शन निवृत्तिमूलक है, भौतिकता का वहाँ तिरोभाव है, इसीलिये साधक-संतों को तो अपने विधेय-वरण में ज़्यादा असुविधा नही होती है लेकिन पाश्चात्य दर्शन के प्रभाव के कारण आज के भारतीय मानव के सोच-विचार का दायरा कुछ अधिक व्यापक और जटिल हो गया है।

कविवर नरेश मेहता ने आधुनिक मानव-जीवन की विसंगतियों तथा समस्याओं के समाधान के रूप में विपरीत मूल्यों, मान्यताओं के बीच सही दृष्टि अपनाने की चेष्टा की है। उनका प्रयोजन किसी दार्शनिक मत या दार्शनिक जीवन की व्याख्या करना नहीं था बल्कि दर्शन के जो आयाम सहज रूप से उनकी कृतियों में आ गये हैं; उनका शब्दांकन उनकी कृतियों में दिखायी पडता है। इस सहजता के परिणामत: उनकी कृतियों में भारतीय तथा पाश्चात्य दर्शन के स्फुल्लिंग दीपित देखे जा सकते हैं। उनका विवेचन-विलोकन इस प्रकार किया जा सकता है—

1. दार्शनिक चिंतन का भारतीय रूप
2. दार्शनिक चिंतन का अभारतीय रूप

1. दार्शनिक चिंतन का भारतीय रूप

काव्य मनुष्य और भाषा दोनों की ही उदात्त्ततम एवं विकसिततम अवस्था है। नर का नारायणत्व तथा भाषा का मंत्रत्व, प्रकारांतर से काव्यात्मक उदात्तता के ही नाम हैं। काव्य से मुक्त काव्यानंद ही काव्यात्मकता है। कवि इसीलिये जहाँ मनीषी होता है, वहीं मूल्यान्वेषी भी होता है।3 भारतीय दर्शन के अनुसार दर्शन के जिन घटकों का निरूपण नरेश मेहता के काव्य में हुआ है उनमे से सर्वप्रथम अवलोकनीय है ब्रह्म विषयक विचार—

 ब्रह्म -- भारतवर्ष के अनेक दर्शनों में आचार्य शंकर के अद्वैत दर्शन की विशेष महिमा है। इस दर्शन में ब्रह्म को सत्य तथा जगत को मिथ्या बताया गया है। इसी ब्रह्म से सारे जीवों के निस्सरण की भी बात कही गई है, ब्रह्म को ही मूलतत्त्व तथा सृष्टि का मूल कारण बताया गया है—

शक्ति एक है, किसी मार्ग से
चलो, वहाँ पहुँचोगे
योगी भक्त कहाओ कुछ भी
प्रभु तक ही पहुँचोगे।4

‘महाप्रस्थान’ में भी नरेश मेहता ने परमनियंता की तरफ़ उत्सुकता और जिज्ञासा भरी दृष्टि से निहारा है। उन्होंने उसे कालपुरुष तथा प्रणवरूप माना है—

है कौन नियंता
कार्य और कारण जिससे उद्भूत हो रहे?
जो अनंत आकाशों में शायी है
वह कालपुरुष
जो प्रणवरूप
धूमाग्नि पी रहा?5

 संसार -- संसार को दार्शनिकों ने जगत का भी नाम दिया है। इस जगत के स्वरूप को लेकर पर्याप्त विवाद हैं। कोई उसे सत्य कहता है तो कोई मिथ्या। ‘ईशावास्योपनिषद्’ मे कहा गया है कि वह ब्रह्म सदा-सर्वदा पूर्ण है।उस पूर्ण में से पूर्ण के निकल जाने पर पूर्ण ही बना रहता है—

ॐ पूर्णमद:पूर्णमिदं पूर्णात पूर्ण्मुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।

दार्शनिकों का यही एकात्मवाद है। एक उदाहरण इस दृष्टि से द्रष्टव्य है—

है विश्व-नियंता ईश्वर की
ज्योति से जगमग यह धरती
जगती का सार जीवों से
है मैत्री सख्य कही जाती।6

कविवर नरेश मेहता का मत है कि यह संसार अक्षत नहीं है।7 वह केवल विगत का भ्रम है जो नष्ट हो जायेगा।8 यही नहीं, युधिष्ठिर के माध्यम से संसार के संबंधों की चर्चा भी करते हैं9 और मृत संसार से मुक्त होने की सलाह देते है—

मकड़ी की भाँति
इस मृत संसार को
बारम्बार अपने ही चारों ओर
बुनते रहने से क्या होगा?
जो वास्तविकता में नष्ट हो चुका
उसे स्मृतियों में भी नष्ट हो जाने दो।10

 जीवात्मा -- जिसमें चेतना और जीवन या प्राण हो और जो अपनी इच्छानुसार खा-पी और हिल-डुल सकता हो,वह जीव कहलाता है।11 वह परमशक्ति ही सर्वोपरि शक्ति है और यह आत्मा उसी परमतत्त्व का एक अंश है—

वह सत्ता है, नाम रूप धर
कर आती इस जग में
साधारण जन-सा चलता
भी देख सकोगे मन में।12

युधिष्ठिर के माध्यम से एक स्थल पर देह त्याग का यह निर्वेद भाव ध्यातव्य है—

झर जाने दो
इस शेष देह-भाव को भी
+ + + +
पृथिवी, जब देह का बोध त्याग देती है
तब शिव के कालजयी ललाट-सी
शुभ्र हिमालय हो जाती है
त्यागो इस देह को भी युधिष्ठिर।13

 मोक्ष -- मोक्ष को मुक्ति भी कहा गया है। आचार्य शंकर ने इसे जीव मुक्ति कहा है। इसका आशय यह है कि जीवावस्था में ही मुक्ति की प्राप्ति। इसे ब्रह्मानुभूति भी माना गया है। श्री नरेश मेहता ने अपनी ‘शबरी’ कृति में ब्रह्म-साक्षात्कार, ब्रह्म-एकाकार की उस चरम परिणति का निदर्शन करके मोक्ष का वर्णन किया है। कविवर मेहता की ये पंक्तियाँ इस दृष्टि से भावनीय है—

मैं तो आया हूँ केवल
करने जयकार सती का
मैं हूँ कृतार्थ पाकर यह
स्वागत-सत्कार सती का।14

यह है भक्तिपरक मोक्ष का स्वरूप। नरेश मेहता के काव्य में जहाँ एक ओर भारतीय मान्यताओं का प्रभाव दिखायी पड़ता है, वहीं पर इस कविता में पाश्चत्य दर्शन का उन्मेष भी देखा जा सकता है।

2. दार्शनिक चिंतन का अभारतीय रूप :

प्रत्येक युग की कविता किसी-न-किसी तथ्य-कथ्य, सोच-विचार, परिस्थिति-परिवेश से प्रभावित होती है, प्रेरणा लेती है। नरेश मेहता के काव्य में पाश्चात्य दर्शनों का प्रतिफलन इस प्रकार शब्दायित किया जा सकता है—

मनोविश्लेषणवाद-- सिग्मण्ड फ्रायड को मनोविश्लेषणवाद का प्रवर्त्तक स्वीकार किया जाता है। इस चिंतन में मानव-मन का विश्लेषण किया जाता है। फ्रायड का स्पष्ट अभिमत है कि काम-भावना मानव-जीवन की सबसे प्रबल भावना होती है लेकिन सामाजिक और मानसिक कारणों से इस भावना का दमन हो जाता है। ये ही दमित भावनायें जब उदात्त-उन्नत रूप धारण कर लेती हैं तो संस्कृति, कला, साहित्य, धर्म आदि के विकास-रूप में हमारे सामने व्यक्त होती हैं, जहाँ तक नरेश मेहता की काव्यकृतियों का प्रश्न है तो ये भी मनोविश्लेषणवाद के प्रभाव से अछूती नहीं रह पायी है। ‘महाप्रस्थान’ में द्रौपदी और युधिष्ठिर की काम-कुण्ठाओं का हृदयस्पर्शी शब्दांकन हुआ है—

कृष्ण उपस्थित होकर भी
अनुपस्थित क्यों रह गये?
क्यों नही किया मत्स्य का भेदन
पूर्ण-पुरुष ने?15

यही काम-कुण्ठा व्यक्ति-कुण्ठा बन जाती है और उसके व्यक्तित्व को नगण्य बना देती है। ‘महाप्रस्थान’ के अर्जुन की भी यही विवश स्थिति है—

यह कैसी विवशता है
व्यक्ति की
समस्त शक्ति, संकल्प और पुरुषार्थ के होते
हुए भी
वह नगण्य हो जाता है।16

 द्वंद्वात्मक भौतिकवाद -- कार्ल मार्क्स ने अपने विचारों से जिस दर्शन का प्रवर्तन किया, वह द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के नाम से जाना जाता है। साहित्य –क्षेत्र में यही प्रगतिवाद कहलाता है। समाज का यथार्थ चित्रण, पूँजीवाद के प्रति विद्रोह, परम्परा के स्थान पर नवीनता का ग्रहण, शोषित के प्रति सहानुभूति आदि द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की प्रवृत्तियाँ हैं। नरेश मेहता के काव्य में भी पीड़ित-शोषित व्यक्तियों का पक्ष लिया गया है। चाहे वह प्रवाद-पर्व की सीता हो या शबरी, शोषण करने वाली व्यवस्था की तीव्र भर्त्सना की गयी है—

राज्य या न्याय
संबंध नहीं होता
सत्ता के गोमुख पर बैठकर
उसके सारे शक्ति-जलों का
अपने ही अभिषेक के लिये
सुरक्षित रखना—
यह कौन सा दर्शन है।17

राजा को, उसके न्याय को समग्र मानवता के विशाल परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिये18 तथा यही नहीं, प्रजा को भी राजा को करणीय-अकरणीय का बोध करवाने का कर्त्तव्य है—

प्रजा का ही यह कर्त्तव्य भी है कि
अधिकार में डूबे राज्य और
राजपुरुषों से कहे
आग्रह करे कि
क्या शुभ है,और
क्या अशुभ।19

 अस्तित्ववाद -- अस्तित्ववाद का एकमात्र आधार व्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्ति की गरिमा का प्रतिपादन है। व्यक्ति की महत्ता, क्षण का महत्त्व, स्वछन्दता की भावना, एकाकीपन, मृत्यु का वरण आदि अस्तित्ववाद की प्रमुख प्रवृत्तियाँ है।

राम और युधिष्ठिर भारतीय मनीषा के आदर्श रहे हैं। श्री नरेश मेहता ने इनके चरित्र को आधार बनाकर रचनायें की हैं। कहने की आवश्यकता नहीं है कि ये आदर्श चरित्र जब अपने आदर्श के व्यूह को भेदकर व्यक्ति-परिधि में प्रवेश करते हैं तब अपने जीवन पर कैसी पीड़ा और ग्लानि, असंतोष और अतृप्ति की अनुभूति करते हैं- इसकी मार्मिक व्यंजना कविवर मेहता ने की है। अपनी व्यक्तित्वहीनता पर प्रवाद-पर्व के राम का यह कथन मार्मिक बन पड़ा है—

राम ! यही है मनुष्य का प्रारब्ध, कि
कर्म
निर्मम कर्म करता ही चला जाये
भले ही वह कर्म
धारदार अस्त्र की भाँति
न केवल देह
बल्कि उसके व्यक्तित्व और
सारी रागात्मिकताओं को भी काटकर फेंक दे।20

3. सांस्कृतिक चिंतन का शास्त्रीय आयाम :

कोशों में शास्त्र के अनेक अर्थ बताये गये हैं। उनमें एक अर्थ है- किसी विशिष्ट विषय का वह समस्त ज्ञान जो ठीक क्रम से संग्रह करके रखा गया हो।21 यहाँ पर संस्कृति-चिंतन के शास्त्रीय आयाम से तात्पर्य संस्कृतिमूलक उन विशिष्ट विषयों-शब्दों से है जिनकी सटीक व्याख्या कवि ने की है, वह अतीव मनमोहिनी है। विशिष्ट शब्दों की व्याख्याएँ-मीमांसाएँ अवलोकनीय है—

1. इतिहास -- इतिहास विगत का दिन-तिथिवार लेखा-जोखा होता है। वह इतिवृत्त है अतीत का। इसीलिये इतिहास का अर्थ है- ‘ऐसा ही था’- या ‘ऐसा ही हुआ’। ‘प्रवाद- पर्व’ में इतिहास की व्याख्या देखिये—

इतिहास
खड्ग से नहीं
मानवीय उदात्तता से लिखा जाना चाहिये
इतिहास को भी वनस्पतियों की भाँति
सम्पूर्ण मेदिनी की
शोभा और गंध होने दो
उसे मानवीय अभिव्यक्ति का
औपनिषदिक पद दो,
व्यक्ति मात्र को
इतिहास से परिधानित होने दो
लगे कि
इतिहास
मानवीय विष्णु की कण्ठश्री
वैजयन्ती है।21

निष्कर्ष यह है कि इतिहास सत्य और तथ्य पर आधारित होता है। इसमें तिथियों, घटनाओं और नामों का वास्तविक वर्णन होता है जबकि काव्य तथ्यों, सीमाओं और स्थितियों से परे होता है।

2. अभिव्यक्ति -- अभिव्यक्ति सामाजिक उपादान है, बहुत बडी सामाजिक उपलब्धि है। इसके माध्यम से परस्पर विचारों का तो आदान-प्रदान तो होता ही है, साथ-ही-साथ प्रीति और पहचान भी प्रगाढ होती है। कविवर नरेश मेहता का स्पष्ट अभिमत है कि अभिव्यक्ति मानवता के विकास-विस्तार के लिये आवश्यक है। जिस दिन अभिव्यक्ति को समाप्त कर दिया जायेगा, वह दिन दुर्भाग्यपूर्ण दिन होगा –

गूँगेपन से कहीँ श्रेयस है
वाचालता।
जिस दिन
मनुष्य अभिव्यक्ति-हीन हो जायेगा
वह सबसे अधिक
दुर्भाग्यपूर्ण दिन होगा।22

इतना ही नहीं, वे यह भी मानते हैं कि वह दिन सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं होगा, वरन इसके बिना सृष्टि ही ईश्वरहीन हो जायेगी। सारे मंत्र-ग्रंथ संबोधनहीन हो जायेंगे। मनुष्य के बोलने से ही प्रकाश का अवतरण होता है –

मनुष्य के बोलने से
प्रकाश
आकाश से अवतरित होता है।23

3. काव्य -- भारतीय और पाश्चात्य आचार्यों ने काव्य के शास्त्रीय स्वरूप पर सविस्तार विचार किया है। कवि नरेश मेहता ने अपनी कृतियों में काव्य, काव्यात्मकता, कवि आदि पर सुचिंतित ढंग से विचार किया है। ‘प्रवाद-पर्व’ में काव्य-स्वरूप की बडी गंभीर मीमांसा नरेश मेहता ने की है। वे काव्य को भाषा के बंधन का नहीं मुक्ति का नाम मानते हैं24 तथा काव्य से मुक्त हो जाने का नाम काव्यात्मकता बताते हैं।25 इतना ही नहीं,वे मानते हैं कि काव्य से मुक्त काव्यानन्द ही काव्यात्मकता है।26 उनके काव्य का उद्देश्य मनुष्य को चैत्य बनाना है-

इसीलिये व्यक्ति को नहीं
मनुष्य-मात्र को चैत्य पुरुष बनाना ही
मेरा काव्य है।27

4. दर्शन -- हिंदी विश्वकोश मानता है कि जिसके द्वारा यथार्थ तत्त्व का ज्ञान होता है उसे दर्शन कहते हैं28 काव्य-इतिहास आदि के अनुशीलन-अनुक्रम में दर्शन को राग-रहित, सत्यशोधित, मेधा-मंडित, संस्कृतिसर्जक बुद्धि का तप कहा गया है। ‘महाभाव’ कविता में कवि ने सम्पूर्ण अहं को सृष्टि के महाभाव में विलीन कर दिया है। सृष्टि के कण-कण में कौटुम्बिक अनुभव की वैष्णवी उत्सवता को अनुभव किया है29 मानवीय स्वत्व का महिमा-गान करते हुए कवि कहता है कि—

जब हमारे स्वत्व का चंदन-वृक्ष
पीपल पत्रों-सा प्रार्थनामय हो जाता है
तब कोई और नही
यह मानवीय स्वत्व ही कल्पतरु होता है30

 5. सत्य -- जो कभी विनष्ट नहीं होता है, शाश्वत और चिरंतन होता है, वह सत्य है। यह सत्य जीवन का कटु सत्य है, इसका मार्ग बडा कठिन-कठोर होता है। सत्यमार्ग के पथिक और सत्यान्वेषी को सामाजिक अवमानना भी झेलनी पड़ सकती है। इसकी प्राप्ति प्रश्न से नहीं, वरन स्वयं से जिज्ञासा करनी होती है31 तथ्यों की लीपापोती सत्य के स्वरूप को किसी भी अवस्था में छल नहीं सकती है—

मैं सत्य चाहता हूँ
युद्ध से नहीं
खड्ग से भी नहीं
मानव को मानव से सत्य चाहता हूँ32

6. सन्दर्भ – सन्दर्भ के अनेक अर्थ है। जिनमें एक अर्थ है- विस्तार। विस्तार से सम्बद्ध होकर व्यक्ति विस्तृत तथा महत्त्वपूर्ण बनता है। यदि सन्दर्भ को काटकर किसी का मूल्यांकन किया जाये तो उसके पास सिवा साधारणता के सिवा कुछ नहीं बचेगी33 भले ही वह कितना भी मेधावी क्यों ना हो। वह घास की अनाम पत्ती की तरह निरीह दिखलायी पडेगा—

सन्दर्भ से कट जाने के बाद
कैसा ही मेधावी
घास की अनाम पत्ती की भाँति
कैसा निरीह हो जाता है।34

7. व्यक्तित्व -- आकृति और प्रकृति के सम्मेल का नाम व्यक्तित्व है ;इसीलिये कहा गया है कि "यत्राकारो गुणास्तता:" लेकिन कविवर नरेश मेहता ने व्यक्तित्व प्रकृति तक केन्द्रित माना है। उन्होंने लिखा है कि आकृति की नियामिका भौतिक सम्पदायें व्यक्ति को व्यक्तित्व से हीन बना देती है। वस्तुओं से हीन होते जाना ही व्यक्तित्व से सम्पन्न होते जाना है—

वस्तुओं से हीन होते जाने का
अर्थ है
व्यक्तित्व से सम्पन्न होते जाना।35

यह एक दर्शनिक धारणा है,भारतीय संस्कृति की धारणा है। वस्तु का साध्य स्वरूप गर्हित है,त्याज्य है लेकिन उसका साधन-स्वरूप,जिससे उदात्त साध्य की सिद्धि की जाती है,वह स्वीकार्य है, ग्राह्य है। कवि ने इसी अर्थ में व्यक्तित्व और वस्तु के संबंध का प्रयोग किया है।

8. संशय -- अनिश्चयात्मकता ही संशय है। यही संशय जीवात्मा का विनाशक है और सत्य का शोधक भी। संशय ही ऋत (उचित, ठीक, सत्य) का निकष है। संशय के रथ पर सवार होकर हर प्रज्ञावान अनामी यात्रा करता है –

संशय
स्वर्ण का अर्थ है
पाशित विवश हम
आरूढ़
कशाघातित अश्व
अनामी यात्रा

राघव !
हर प्रज्ञावान शंकाशील
इसी यात्रा पर चला है।36

9. युद्ध -- नरेश मेहता ने युद्ध के विषय पर भी व्यापक रूप से विचार किया है। उनका मानना है कि युद्ध आवेश नहीं, वरन वह किसी भी पीढ़ी के लिये दायित्व है।37 यह निर्णय है जिससे इतिहास का निर्माण होता है, इतना ही नही, युद्ध राष्ट्र और इतिहास के लिये दी गयी अग्नि-परीक्षा है –

क्या युद्ध
राष्ट्र और इतिहास के लिये दी गयी
समाज की
ऐसी ही अग्नि-परीक्षा नही होती?38

10. न्याय -- न्याय की महिमा अपरम्पार है। यह एक ऐसी पद्धति है जिस पर लोक का विश्वास टिका होता है; कारण स्पष्ट है कि न्याय व्यक्ति और संबंध में निरपेक्ष होकर उत्पन्न स्थितियों को देखता है—

न्याय
व्यक्तियों को नहीं
संबंधों को नही, बल्कि
उत्पन्न स्थितियों को देखता है39

11. राष्ट्र -- राष्ट्रविषयक उनकी धारणा है—

किसी की वैयक्तिकता नहीं
वरन
सम्पूर्ण की समग्रता ही राष्ट्र है40

‘सम्पूर्ण की समग्रता’ का तात्पर्य उस भू-भाग में बसने वाली सम्पूर्ण मानव-जाति से है। राष्ट्र का तात्पर्य राष्ट्राधिपति से बिल्कुल नहीं लगाना चाहिये। वह राष्ट्र का पर्याय-प्रतीक नहीं हो सकता, यदि ऐसा है तो वह इतिहास की सबसे ग़लत परम्परा है और राष्ट्रीय परतंत्रता का परिचायक है.—

अधिपति होने का अर्थ
राजा तो है
पर राष्ट्र नहीं
जिस दिन भी ऐसा मान लिया जायेगा
महानुभावों !
इतिहास की वह सबसे गलत परम्परा होगी।
रावण
राष्ट्र का प्रतीक बन चुका था
इसीलिये लोगों के वर्चस्व ने
राष्ट्रीय मुक्ति के लिये युद्ध किया41

(आ) संस्कृति की नीतिपरक विवेचना –

शुक्रनीति में कहा गया है कि –

सर्वोपजीवकं लोकस्थितिकृन्नीतिशास्त्रकम्।
धर्माकाममूलं हि स्मृतं मोक्षप्रद: यत:॥11/2

अर्थात लोक-व्यवहार की स्थिति बिना नीतिशास्त्र के उसी प्रकार नहीं हो सकती है जिस प्रकार देहधारियों की स्थिति भोजन के बिना नहीं हो सकती। कहने की आवश्यकता नहीं है कि ‘नीति’ मानव के लिये सर्वथा अनिवार्य तत्त्व है।’नीति’ एक व्यापक प्रत्यय है जिसके अन्तर्गत शुक्रादिकृत राजविद्या, राजनीति, दण्डनीति, धर्म, दर्शन आदि को स्वीकार किया जाता है। रामचन्द्र वर्मा ने नीति को परिभाषित करते हुए लिखा है कि वह नीति जिस पर चलने से अपना कल्याण हो पर दूसरे की हानि न हो, नीति है।42 स्पष्ट है कि व्यक्ति का कल्याण करने वाली,व्यक्ति का परिष्कार करने वाली, समाज के विकास को विस्तृत और गतिशील बनाने वाली रीति नीति है। नरेश मेहता के काव्य की नीतिपरक विवेचना इस प्रकार है—

1. विवेक -- करणीय-अकरणीय ,कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य की समझ विवेक कहलाता है। जीवन में विवेक की बड़ी महिमा है। विवेकी व्यक्ति ही जीवन-सागर का सफलतापूर्वक संतरण कर पाता है। आवेग-आवेश में यदि कोई व्यक्ति पशुवत आचरण करने लगा हो तो विवेक रहते उसके पुन: मनुष्य बनने की प्रतीक्षा करनी चाहिये—

सामने वाला यदि आवेग में
पशु हो गया हो
तो विवेक के रहते
प्रतीक्षा करो
उसके पुन: मनुष्य होने की।43

2. संकल्प -- काम करने की निश्चित इच्छा संकल्प है। जीवन में संकल्प का बड़ा महत्त्व है। जब तक व्यक्ति संकल्प-बद्ध नहीं होता है, तब तक किसी कार्य की सिद्धि नहीं होती है,लेकिन यह ध्यान रखना चाहिये संकल्प मंगल उद्देश्य के लिये हो। इसीलिये ‘महाप्रस्थान’ में अन्य ग्रंथि पालने की अपेक्षा शिव-संकल्प-ग्रंथि पालने की सलाह दी गयी है—

अन्य किसी ग्रन्थि की अपेक्षा
अच्छा है
शिव-संकल्प-ग्रंथि का पालते रहना।
44
+ + + +
खड्ग यदि ध्वस्त हुआ
क्या हुआ
साहस
अभी नहीं
हमने संकल्प
जल का नहीं
अग्नि का किया था।
45

3. त्याग -- जीवन में त्याग का महत्त्व निर्विवाद है। त्यागमयभोग जीवन का कर्त्तव्य पक्ष है। त्याग में अपरिमित आनंद है। इसी त्याग को व्यवहार में धारण कर मानव श्रेष्ठ बनता है—

कोई है ?
जो अपने घर का मोह छोड़
इस राजमार्ग पर
अंकित हो जाने को तत्पर है?
इस राजमार्ग को नाम नहीं
निष्ठा देनी है46

4. सदाचार -- सदाचार जन्मगत ऊँचता और नीचता को नहीं देखता है। यदि मानव दुराचारी है, भले ही वह कुलीनवंशीय है तो वह तो वह विषमय सर्प समान है तथा यदि मनुष्य निम्नकुलोद्भव सदाचारी है तो वह सम्मान्य है। सदाचार वैयक्तिक नहीं, सामाजिक सम्पदा है—

आचार किसी का जग में
वैयक्तिक कब हो सकता ?
है अन्य स्त्रियाँ कन्या
जिन पर प्रभाव पड सकता।47

5. परिश्रम -- जीवन में परिश्रम का बहुत महत्त्व है। सजग एवं परिश्रमी व्यक्ति ही श्रेष्ठ-वरों का वरण करता है। परिश्रम से व्यक्ति विषम से विषम परिस्थिति को सहज और सुगम बना लेता है। परिश्रम की गंध को मेहता जी जीवन के मूल्यों से जोड़ते हैं –

हर परिश्रम की गंध होती है
वही लोगों में होती है
मैं ऐसी गंध को भी मूल्य कहता हूँ।48

6. मोहहीनता -- मोह विवेक का विनाश करता है। इसीलिये कवियों ने मोह-विसर्जन का व्यापक परामर्श दिया है –

युद्धों,प्रतिहिंसाओं के दावानल में
न कृष्ण, न पार्थ
न तुम, न मैं
कोई भी सुरक्षित नहीं रह पाता
अपने इस आच्छद मोह को छूकर देखो—
दीमक खाये
काष्ठ-भवन सा ढह जायेगा।49

उक्त सभी विचार-बिन्दुओं के आलोक में कहा जा सकता है कि नरेश मेहता के काव्य का केन्द्रीय कथ्य मानव और मानव की समस्याएँ रहीं हैं। उनका काव्य इतिहास और दर्शन की भूमि पर मानवीय प्रजा को ऊर्ध्वोन्मुखता प्रदान करता है। मनुष्य में विराजे देवता को उजागर करता है। वे काव्य-सृजन को मनुष्य और भाषा की ‘उदात्ततम’ अवस्था मानते थे। यह उदात्तता और ऊर्ध्वोन्मुखता नरेश मेहता की पूरी रचना-यात्रा में देखी जा सकती है। आज का यह नया मनुष्य कैसे अपने आचार और व्यवहार निर्धारित करे जिससे उसका जीवन सुन्दर और मंगलमय बन सके, विवेच्य कविता हमें यह बतलाती है। मानव को मानव मानना, मानव को पूरा सम्मान देना, पाखण्ड और आडम्बर से दूर रहना, गलित परम्पराओं के शव से चिपके न रहना और शिव-संकल्प से पूर्ण बनना नरेश मेहता की कविता के मुख्य सांस्कृतिक स्वर हैं।

सन्दर्भ

1. भारतीय संस्कृति की रूपरेखा, बाबू गुलाबराय, पृ. 1
2. संस्कृति का दार्शनिक विवेचन, डा॔॰ देवराज, पृ. 38
3. संशय की एक रात, भूमिका:लक्ष्मीकांत वर्मा, पृ. 4
4. शबरी, नरेश मेहता, पृ. 50
5. महाप्रस्थान, वही, पृ. 35
6. शबरी, वही, पृ. 50
7. महाप्रस्थान, पृ. 67
8. वही, पृ. 68
9. वही, पृ. 70
10. वही, पृ. 72
11. मानक हिन्दी कोश:दूसरा खण्ड, रामचन्द्र वर्मा, पृ. 372
12. शबरी, नरेश मेहता, पृ. 50
13. महाप्रस्थान, नरेश मेहता, पृ. 125
14. शबरी, नरेश मेहता, पृ. 79
15. महाप्रस्थान, पृ. 56
16. वही, पृ. 90
17. प्रवाद-पर्व, पृ. 40-41
18. वही, पृ. 41
19. वही, पृ. 42
20. वही, पृ. 109-110
21. प्रवाद्-पर्व, पृ. 33-34
22. वही, पृ. 43
23. वही, पृ. 53
24. वही, पृ. 9
25. वही, पृ. 8
26. वही, पृ. 8
27. अरण्या, नरेश मेहता, पृ. 17
28. हिन्दी विश्वकोश:भाग-10, पृ. 223
29. उत्सवा, नरेश मेहता, पृ. 41
30. वही, पृ. 87
31. महाप्रस्थान, पृ. 93
32. संशय की एक रात, पृ. 31
33. प्रवाद-पर्व, पृ. 67
34. महाप्रस्थान, पृ. 79
35. वही, पृ. 93
36. संशय की एक रात, पृ. 77-78
37. वही, पृ. 67
38. प्रवाद-पर्व, पृ. 100
39. वही, पृ. 94
40. वही, पृ. 96
41. वही।
42. प्रामाणिक हिन्दी कोश, पृ. 711
43. महाप्रस्थान, पृ. 87
44. वही, पृ. 66
45. बोलने दो चीड को, नरेश मेहता, पृ. 37
46. मेरा समर्पित एकांत, नरेश मेहता, पृ. 38
47. शबरी, पृ.
48. बोलने दो चीड को, पृ. 44
49. महाप्रस्थान, पृ. 67


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