अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754 

मुख पृष्ठ
05.26.2014


इक न इक दिन

इक न इक दिन जनाब बदलेंगे
जब होगा, बेहिसाब बदलेंगे

यादे माज़ी जो मुस्कुरायेगा
दिल के सारे जवाब बदलेंगे

ख़ौफ़ अपनों का डर ज़माने का
झूठे उनके नक़ाब बदलेंगे

दिल में डर काँटों का लगा पलने
हाथों के अब गुलाब बदलेंगे

कौन जीता वक़्त से निर्मल यां
जो बने हैं नवाब बदलेंगे


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें