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05.03.2012
 

आईने के रूबरू
निर्मल सिद्धू


आईने के रूबरू जब मेरे यार होता हूँ
ख़ुद से फिर बड़ा मैं शर्मसार होता हूँ

वक़्त की इबारत मुझसे पढ़ी नहीं जाती है
जितना भी जी चाहे मैं तलबगार होता हूँ

जो दिखता है वो मुझसे मेल नहीं खाता है
जो मेल खाता है उससे मैं नागवार होता हूँ

चंद लकीरें माज़ी की कुछ रंग हैं क़िस्मत के
देख देख सबको फिर मैं बेक़रार होता हूँ

रह गया है टूट के ज़िन्दगी का आईना
जिसके टुकड़ों से सदा मैं दाग़दार होता हूँ

मुझसे अलग नहीं है ये ’निर्मल’ की ज़िन्दगी
फिर न जाने क्यों मैं गुनाहगार होता हूँ


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