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ISSN 2292-9754

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08.08.2017


ये परदेश की लड़कियाँ

ये परदेश की लड़कियाँ
कितनी बेख़ौफ़ होकर
सात समंदर पार होकर
बेख़ौफ़ चली आती हैं
परिंदों की तरह
आज़ाद होकर
वे निकलती हैं घर से
उन लोगों के मुँह पर
तमाचा मार कर जो कहते
की औरत का कोई वजूद नहीं
बिना पुरुष के
घूमती हैं अकेली
ट्रेनों में ,बसों में
जंगलों में, पहाड़ों में
बेख़ौफ़ होकर
नहीं है परवाह उन्हें किसी समाज की
किसी धर्म की
वे नहीं जीती किसी की परिभाषा ओढ़ कर
वे निकलती हैं घर से ख़ुद होकर
कोई नहीं कहता उन्हें
की कपड़े उनके छोटे हैं
कहेगा कौन उन्हें
उनके हौंसले पर्वतों से भी बड़े हैं
काश निकलें मेरे देश की भी लड़कियाँ
इसी तरह बेख़ौफ़ होकर
निर्भया से लक्ष्मीबाई हो कर
अबला से सबला होकर
अपनी परिभाषा ख़ुद गढ़ कर
इसकी उसकी न होकर
घर से निकलें ख़ुद होकर


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