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ISSN 2292-9754

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09.28.2017


महत्वहीन बेल

देख रही हूँ कैसे बारिश में
ज़मीन ने हरियाली का
छाता ओढ़ लिया है
हल्की बारिश की बूँदों में
भीगते मेरे शब्द
मिट्टी की ख़ुशबू के एहसास को समाये
खिड़की के बाहर की दुनिया को
बड़ी देर से देख रही हूँ
कुछ दिखा है शायद
जिसे नज़रअंदाज़ कर
आगे बढ़ने का मन नहीं किया।

क़लम जिसे हरियाली और
बारिश की बूँदों के बीच
कुछ हरे शब्द मिल गए हैं, जिन से
सफ़ेद पन्नों को हरे रंग में रँगने
का मन बनाया है मैंने।

एक बेल जो घर के मेन गेट के पास
बारिश का अपनत्व पा उग आई है
हाँ, वो बेल जिसने सीमेंट से
पट्ट ज़मीन को चिढ़ा
दीवार का सहारा बना
झूमने का मन बनाया है।

नई कोंपलें जो बेधड़क दीवार पर
चढ़ने की कोशिश में लगी हैं।

सब देख रही हूँ मैं
देखते देखते ही कुछ सवाल भी
बूँदों के साथ मन में बरसने लगे हैं -
कब तक ये यूँ ही झूमती रहेगी
कितने दिन यहाँ मेहमान बन ठहरेगी
कितने दिन बेफ़िक्री में यूँ ही
हवा के साथ खेलेगी।

कितने दिन बारिश की बूँदों को
अपने पत्तों पर ठहरा
कुछ वक़्त के लिए पनाह देगी।

मैं उस की ख़ुशी- उस के आज में
उसका कल- उसके अंत को भी
साफ़ देखकर फ़िक्रमंद हो रही हूँ
और सोच रही हूँ
क्या एक हवा का झोंका
काँच सी ठहरी बूँदों को अपने साथ ले जायेगा
और क्या ये बेल उखाड़ फेंक दी जायेगी
उसी दिन… जिस दिन कामवाली
आँटी की आँख में चढ़ेगी।

क्योंकि ये जंगली बेल
कहाँ सुंदरता बढ़ाती है
बाक़ी लगाए गए पेड़ पौधों की तरह
उसका यहाँ होना कोई महत्व नहीं रखता।

जानती हूँ -
वो इंसानी दिमाग़ की तरह
आज और कल में नहीं उलझी है
वो तो बस अभी और आज में
हवा के साथ झूमने में मस्त नज़र आ रही है।


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