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07.15.2007
 
खार राहों के फूलों में ढलने लगे
नीरज गोस्वामी


खार राहों के फूलों में ढलने लगे
याद करके तुझे हम जो चलने लगे

सब नियम कायदे यार बह जाएँगे
इश्क़ का गर ये दरिया मचलने लगे

दुश्मनों से निपटना तो आसान था
तीर पर अपने घर से ही चलने लगे

घोंसलों में परिंदे जो महफूज़ थे
छोड़ कर फिर उसे हाथ मलने लगे

बस समझना कि उसकी गली आगई
साँस रुकने लगे जिस्म जलने लगे

तेरी चाहत का मुझपे असर ये हुआ
जैसे फूलों से खुश्बू निकलने लगे

इतने मासूम हैं हम किसे क्या कहें
फिर से बातों में उनकी बहलने लगे

तेरे जाने से ये क्या ग़ज़ब हो गया
जितने सोए थे अरमाँ मचलने लगे

वक्त का खेल देखो तो नीरज जरा
जिनकी चाहत थे उनको ही खलने लगे

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