अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
06.30.2012


देखता ही रह गया

ये कौन आया सामने मैं देखता ही रह गया
चाल वही अंदाज़ मगर कुछ और कह गया

देख उसे मैं खो गया माज़ी की याद में
इक अक़्स निगाहों में तैरता ही रह गया

गुम यूँ किसी की याद में था होश न रहा
जाने कब मैं आँसुओं की रो में बह गया

शिकवे शिकायतों में बात हद से बढ़ गई
उसका हर एक तीर कलेजे पे सह गया

इल्ज़ाम धरने वाले ने मुड़ कर नहीं देखा
कुछ कह न पाया काँपते लबों ही रह गया

आ कर करीब मुझ को जगाया ख़्याल से
इक अजनबी जो अपना होते-होते रह गया


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें