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06.30.2012


आवाज़ कौन

दे गया झरनों को फिर आवाज़ कौन
पत्थरों के हाथ में ये साज़ कौन

ले गईं मेरी उम्मीदें फिर वहीं
दूर से बजा रहा ये साज़ कौन

बर्फ़ को फिर-फिर पिघलने का नया
धूप को सिखला गया अंदाज़ कौन

मैं उड़ी तो दूर तक उड़ती रही
हौंसलों को दे गया परवाज़ कौन

आप भी गर रूठ कर यूँ चल दिए
फिर उठाएगा हमारे नाज़ कौन


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