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05.31.2008
 

दूर से आए थे साक़ी सुन के मैख़ाने को हम
नज़ीर अकबराबादी


दूर से आए थे साक़ी सुन के मैख़ाने को हम
बस तरसते ही चले अफ़सोस पैमाने को हम

मय भी है मीना भी है साग़र भी है साक़ी नहीं
दिल में आता है लगा दें आग मैख़ाने को हम

हम को फ़सना था कफ़ज़ में क्या गिला सय्याद का
बस तरसते ही रहे हैं आब और दाने को हम

बाग़ में लगता नहीं सहरा में घबराता है दिल
अब कहाँ ले जाके बैठें ऐसे दीवाने को हम

क्या हुई तक़सीर हमसे तू बता दे ऐ ”नज़ीर”
ताकि शादी मर्ग समझें ऐसे मर जाने को हम
तक़सीर=गलती, मर्ग=मृत्यु


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