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ISSN 2292-9754

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10.16.2017


मेरे दस प्रश्न

सुदर्शन प्रियदर्शिनी जी से प्रवासी हिन्दी साहित्य से सम्बन्धित 10 प्रश्न

 
प्रश्न १ : क्या आप प्रवास के पहले भी लेखन कार्य करती थी?
हाँ प्रवासी होने से बहुत पहले से मैं लिखती और छपती रही हूँ। जिस वर्ष (१९८२) यहाँ आयी - उस वर्ष तक मैं सारिका में छपने लगी थी। यहाँ आने पर प्रथम दो वर्ष तो खूब लिखा - कई आधे-अधूरे उपन्यास जैसे “रेत के घर”, “जलाक”, कविता संग्रह "शिखंडी युग”, “बराह” और एक कहानी संग्रह (उत्तरायण) पूरे किये पर फिर न जाने क्या हुआ कि पच्चीस वर्ष तक कोई विशिष्ट लेखन नहीं किया – यूँ ही छिट-पुट चलता रहा। नया वातावरण, नए संघर्ष, नयी राह, नई पहचान बनाने में जीवन खर्च होता चला गया। कहाँ कालिज में प्रोफेसर के पद को छोड़ कर आयी थी पर यहाँ उसी हिंदी भाषा की पी.एच.डी. की डिग्री एक अंडर क्वालिफ़िकेशन बन कर रह गई।
प्रश्न २ : लेखन की प्रेरणा किसे मानती हैं?
उत्तर : प्रेरणा बिंदु ढूढ़ना तो कठिन है। न जाने कब - किसी की कहानी, किसी के आँसू, किसी की अपार सुंदरता - अंदर की कोमल दीवारों से टकराई और लेखनी की नोक पर बैठ गई। पर एक प्रेरणा को अवश्य इंगित कर सकती हूँ और वह थी - महादेवी वर्मा! उन की कविताओं ने हृदय के तार झंकृत किये - कह दे माँ अब क्या देखूँ! और पंत जी की पंक्तियाँ - कभी शशि से ओझल हो घन - कभी घन से ओझल हो शशि - ने अंदर निहित किसी कोमल - भाव को छू कर कल्पना को जागृत कर दिया। मेरी कविताओं में भी वेदना का स्वर - सदैव अंतर्निहित रहा और वही संवेदना गद्य में भी उतरी। किसी ने मुझे एक बार लिखा था कि मैं पद्य में गद्य लिखती हूँ।
प्रश्न ३ : आप को प्रवास के हिंदी लेखन और भारत के हिंदी लेखन में क्या अंतर दिखाई देता है?
उत्तर : यहाँ पर आकर जो लेखन हो पाता है उस में से अपना देश, अपने देश की रोज़मर्रा की समस्याएँ, मुहल्ले या पड़ोस-बाजी - आपसी सौहार्द या संवेदना धीरे-धीरे ग़ायब हो जाती हैं। उस में शामिल हो जाता है - मोहभंग! मूल्यों का टूटना - पारम्परिकता पर प्रश्न चिन्ह और एक बेबस व्यक्तित्व के हाथ में रह जाती है - अस्तित्व की लड़ाई। नये रंग में रँगने की होड़ - एक भेड़-चाल में शामिल होने की जद्दोज़ेहद। कहानी तत्व कम हो जाता है और एक स्वायत्त-तत्व हावी हो जाता है। यहाँ के चौखटे में फ़िट भी नहीं होते - पर अपने चौखटे से छिटक का बाहर हो जाते हैं। दूसरी और साहित्य को मिलते हैं नए विषय - नई सोच और एक किंकर्त्तव्यविमूढ़ की स्थिति। जब अपने ही देश वाले ऐसे साहित्य को या तो प्रवासी (हीन-दृष्टि) कह कर हाशिये पर डालने का प्रयत्न करते हैं या यह मुख्य-धारा का साहित्य नहीं है, कह कर उसे अछूत सिद्ध करने में लग जाते है। यूँ विषय की गंभीरता और विवधता में प्रवासी साहित्य अपना सानी नहीं रखता। वैसी लड़ाई भारतीय लेखन में नहीं है। भारत में अस्तित्व की लड़ाई है, मूल्यों की नहीं। चौखटे में फ़िट रहने की लड़ाई अगर है तो वह स्तर से उठने की है। यह लड़ाई नहीं संघर्ष है।
प्रश्न ४ : दोनों के शिल्प में कितना अंतर् है?
उत्तर : शिल्प का अंतर देश-परिवर्तन से उतना नहीं जितना उम्र - अनुभव और विविध साहित्य के पाठन से होता है। कई प्रवासी-साहित्यकारों में अंग्रेज़ी का बहुल-प्रयोग - शिल्प को बनावटी और शिथिल बनाता है। यह साहित्यिक भाषा का पतन है। कुछ बहुत ही आवश्यक स्लैंग में आने वाले शब्दों के अतिरिक्त अपनी भाषा को - अपनी सीमा में रखने का प्रयास करना चाहिए। हमारी हिंदी भाषा इतनी समृद्ध है कि उसे दूसरी भाषाओं की वैसाखी की आवश्यकता नहीं हो सकती - अगर हम उसे इन वैसाखियों की आदत न डालें। मैंने अपने लेखन में इस का भरसक प्रयास किया है।
प्रश्न ५ : प्रवास के दौरान लेखन कार्य में समस्याएँ आती हैं! कौन से समस्या आप को प्रमुख लगती है?
उत्तर : प्रवास के लेखन की अपनी समस्याएँ हैं। मेरे विचार में सब से बड़ी समस्या - विषय-चयन की है। विषय-चयन कहाँ से हो! बाहर तो सारा - विदेशी वातावरण है। उन कीअपनी व्यक्तिगत समस्याएँ हैं। कुछ लेखक उन में से - उन की कहानियाँ – ढूँढ़ कर लिखने का प्रयास करते हैं। मेरे विचार में हमें अपनी ज़मीन पर रहना चाहिए। अपनी समस्यायों को नए परिवेश में कूतने का हुनर - हमें सीखना होगा। यहाँ आकर जिन समस्यायों से जूझना पड़ता है - या विदेशी वातावरण में रह कर - उन के और अपने मूल्यों के बीच त्रिशंकु सा लटके रह कर उन से कैसे समझौता करना चाहिए, इस प्रकार की अनगणित समस्याएँ हमारा विषय हो सकती हैं। इन दोनों के बीच समझौता कर के तटस्थ होकर लिख पाना ही सब से बड़ी समस्या है।
प्रश्न ६ : आप प्रवासी साहित्य को कलात्मक रूप में कितना आँकती हैं?
उत्तर : हर लेखक अपने ढंग से लिखता है। उस की अपनी भाषा - मानदंड या सौंदर्य-बोध होता है। कौन कितना उस सौंदर्य-बोध, भाषा-सौष्ठव या विषय की गहराई को समझता या आँकता है - इन का मापदंड अलग-अलग है। इन की विवेचना या परख कोई कलात्मकता की कसौटी पर कैसे करे - यह तो कोई कलापारखी ही बता सकता है जो स्वयं में निरपेक्ष और निष्पक्ष हो और एक गूढ़ सौंदर्य दृष्टि रखता हो। अपनी ओर से हर लेखक अपनी उत्कृष्ट अभिव्यक्ति ही देता है। मेरी वैसी सौंदर्य आँकने वाली कूवत कहाँ!
प्रश्न ७ : प्रवासी लेखकों का आपसी सम्पर्क होता है क्या?
उत्तर : बहुत कम! स्थानों की दूरी मुख्य कारण है।
प्रश्न ८ : अन्य देशों के साथ सम्पर्क?
उत्तर : न के बराबर। इंटरनेट पर - कभी कोई संदेश ये देश-विशेष से कोई पत्रिका निकलती है तो आदान-प्रदान हो जाता है पर व्यक्तिगत स्तर पर नहीं। उस पर मैं टेक्निकल-क्षेत्र में शून्य हूँ और न फेसबुक पर हूँ, न किसी और विधा पर कि बतियाने के रास्ते बनाऊँ।
प्रश्न ९ हिंदी भाषा के अतिरिक्त किसी अन्य भाषा में लेखन?
उत्तर : हिंदी भाषा के अतिरिक्त पंजाबी भाषा में मेरी एक कविता की किताब है जिस का नाम है “मैं कौन हाँ” जो लुधियाना के “चेतना प्रकाशन” से प्रकाशित हुयी है।
प्रश्न १० : प्रवासी साहित्य का भविष्य कैसा देखते हो?
उत्तर : प्रवासी साहित्य का भविष्य आशान्वित करता है। अब भारत में इस दिशा में अग्रसर होकर इसे राह से हटाने के विरुद्ध - राह देने की ओर क़दम उठाये जा रहे हैं। प्रवासी साहित्य पर अनुसन्धान और प्रवासी साहित्य को कालिज के पाठ्यक्रम में जोड़ना आदि। फिर भी अभी एक बात बहुत कचोटती है कि इसे मुख्यधारा में सम्मिलित करने में उन्हें ढेर सारा उज्र है। यह अनदेखी - किस भय की और संकेत करती है, नहीं कह सकते। किन्तु इतना कहा जा सकता है कि इस दिशा में यह उठाये गए क़दम सराहनीय है और प्रवासी साहित्य को और पनपने में सहायक होंगे। यहाँ प्रवासी साहित्य को उचित खाद - पानी नहीं मिलता तो कम से कम खिले फूल की सराहना तो हो।

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