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ISSN 2292-9754

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06.28.2014


ज़िन्दगी इक सराब हो जैसे

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ज़िन्दगी इक सराब हो जैसे
सुलगता आफ़ताब हो जैसे

कोई खुलकर नहीं मिले अब तो
हर शख़्स ही नक़ाब हो जैसे

ज़ख्म किश्तों में मिलते हैं गोया
ग़म का बाकी हिसाब हो जैसे

रोज़ किरदार बदलता रहता
मानो कोई किताब हो जैसे

होश का शज़र तिनका-तिनका अब
तेरा मिलना अजाब हो जैसे

लोग कहते हैं महकता हूँ मैं
तेरा तसव्वुर गुलाब हो जैसे

मुझको 'गुमनाम' है यक़ीं तुझ पर
लेकिन दिखे ख़राब हो जैसे


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