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ISSN 2292-9754

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06.28.2014


तुमने पुरखों की हवेली बेच दी

2122 2122 212

तुमने पुरखों की हवेली बेच दी
शान सुख दुःख की सहेली बेच दी

जिस्म के बाज़ार ऊँचे दाम थे
गाँव की राधा चमेली बेच दी

गन्दगी बिमारी के ही दाम में
मिलके ये ऋतु अलबेली बेच दी

बस्ता बचपन और कागज़ छीन कर
तुमने बच्चों की हथेली बेच दी

गाँव में दिखने लगा बाज़ारपन
प्यार सी वो गुड की भेली बेच दी


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