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ISSN 2292-9754

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06.28.2014


चाँद सूरज देख के ललचाते हैं

2122 2122 222

चाँद सूरज देख के ललचाते हैं
हाथ बच्चे के जो जुगनू आते हैं

बात पूरी हो बहर में कैसे अब
भाव जोड़ूँ रुक़्न खो से जाते हैं

आज़माता हूँ परों को जब भी मैं
हर तरफ़ से ही निशाने आते हैं

ऐब तो हैं यार मेरे हमजोली
रूठ जाऊँ घर मनाने आते हैं

तेरा ख़त है इत्र की शीशी कोई
लफ़्ज़ सारे ख़ुश्बू ही बिखराते हैं

बूढ़ी माँ है और टपके छप्पर भी
बदरा भी तो दिल दुखाने आते हैं


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