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ISSN 2292-9754

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09.25.2017


हाइकु - 3

बर्फ़ से दिन
पिघले पानी हुये
जला पलाश।
*
शीत जाते ही
धूप आँख दिखाये
लगे शेरनी।
*
शाम ने खोले
रात के दरवाज़े
घुसा अँधेरा।
*
शाम अकेली
खोल के एलबम
छुये उजाला।
*
पत्ते झरे तो
हिम्मत देने लगीं
नन्हीं कोपलें।
*
नभ निहारे
धरा को चकोर-सा
धरा चाँद-सी।


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