अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.15.2007
 
नया धर्म
डॉ. नरेन्द्र कोहली

    कवि जी कुछ अधिक ही मौज में थे। बोले, मैं सोचता हूँ कि एक नया धर्म चलाया जाए।...
     
मैं चौंका,
आप अपने आप को मुगल सम्राट अकबर समझते हैं क्या?
     
इसमें अकबर होने की क्या बात है? उन्होंने मुझे डाँटा।
     
नया दीन-ए-इलाही जो चलाना चाहते हैं आप?
     
मैं दीन-ए -इलाही की बात नहीं कर रहा हूँ। कवि बोले, मैं तो सोचता हूँ कि एक ऐसा धर्म चलाया जाए, जो आदमी को इंसान बना दे।
     
आदमी और इंसान में अंतर क्या है? मैंने स्पष्ट कर लेना उत्तम समझा, जहाँ तक मैं जानता हूँ, ये दोनों शब्द संस्कृत मूल के नहीं हैं और परस्पर पर्याय हैं।
     
इंसान से मेरा तात्पर्य है, जिसमें इंसानियत हो। उन्होंने अपना मंतव्य स्पष्ट किया।
     
इंसान होता ही वही है, जिस में इंसानियत हो। मैंने कहा, मानव वही है, जिसमें मानवता हो। पशु वही है, जिसमें पशुत्व हो। अरबी फारसी शब्दों में कह देने से उसमें कुछ नया नहीं आ जाता।
     
वे चिढ़ गए,
बड़ी मोटी बुद्धि है तुम्हारी। मैं यह कह रहा हूँ कि अब तक के धर्मों ने जो कुछ नहीं किया, वह यह नया धर्म करे।
     
तो आपने आज तक के सारे धर्मों को नकार दिया। उन्हें मानवता के लिए अहितकर घोषित कर दिया। आप उनसे श्रेष्ठ धर्म चलाएँगे। मैंने कहा, मैं जान सकता हूँ कि आपकी समझ में आज तक के धर्मों ने मानव नामक इस प्राणी को क्या पाठ पढ़ाया है?
     
उन्होंने उसे हिंदू या मुसलमान बनाया है।
     
तो हिंदू और मुसलमान इंसान नहीं होते? पशु होते हैं?
     
वे मनुष्यों को बाँटते हैं?
     
बाँटते तो सभी हैं। मैं बोला, प्रदेश के आधार पर, जाति और धर्म के आधार पर, धन के होने और न होने के आधार पर, राजनीतिक विचारधारा के आधार पर, गुणों और दुर्गुणों के आधार पर ... मैंने कवि महोदय की ओर देखा, आप कुछ को इंसान मान रहे हैं और कुछ को इंसान बनाना चाहते हैं। कुछ बनेंगे और कुछ नहीं बनेंगे। मानव जाति तो तब भी वर्गीकृत होगी ही।
     
तुम सदा मूर्खता की ही बात क्यों करते हो?
     
फिर वही बटवारा - कुछ मूर्ख और कुछ बुद्धिमान।
     
मैं देख रहा था कि उस बुद्धिमान को क्रोध आ रहा था और वह बुद्धिमान से मूर्ख बनने ही वाला था।
     
अच्छा, तो आप इंसान में कौन से गुण चाहते हैं? मैंने पूछा, या पहले पूछ लूँ कि आप स्वयं इंसान बन गए?
     
मैं तो इंसान हूँ ही। मैंने जीवन भर अपनी कविताओं में इंसानियत की बात की है।

      की होगी। मैंने कहा।
     
क्या मतलब?
     
भई ! मैं ने आपकी कविताएँ पढ़ी नहीं हैं। इसीलिए पूछ लिया। मैं बोला, क्या इंसानियत वही है, जो आप जीवन भर करते रहे हैं?
     
हाँ! मैं सदा इंसानियत की राह पर चला हूँ।
     
क्या इंसानियत की यात्रा, सुरापान, व्यभिचार और पैसे के लोभ की गलियों से हो कर चलती है? मैंने उनकी ओर देखा, अवसरवादिता? अपने मित्रों की साहित्यिक हत्याएँ? ... यह सब इंसानियत है? धर्म तो यह सब त्यागने को कहता है। त्याग और तपस्या की बात करता है। स्वार्थ त्याग परमार्थ के लिए काम करने को कहता है।
     
बकवास मत करो। वे आपे से बाहर होने होने को ही थे, धर्म मानवता को बाँटता है और लोगों को आपस में लड़वाता है।
     
देखिए कवि महोदय ! मैं आपके समान विद्वान् नहीं हूँ, इसलिए सारे धर्मों की बात नहीं जानता। मैंने कहा, आप बिना क्रुद्ध हुए, केवल इतना बता दीजिए कि हिंदू धर्म के किस ग्रंथ में कहा गया है कि आपस में लड़ो। कहाँ कहा गया है कि जो तुम से कुछ अलग सोचे, उसे मारो। वैश्वानर, वसुधैव कुटंबकम् तथा वेदांत के अनुसार तत्वतः सारे जीवों को ही नहीं, पदार्थों को भी एक ही मानना - क्या यह मानव जाति को बाँटने का प्रयत्न है?
     
क्यों? राम मंदिर को ले कर हिंदू लड़ नहीं रहे?
     
तुम्हारा मकान तुम्हारे किराएदार ने खाली नहीं किया था तो तुम कितने वर्ष मुकदमा लड़ते रहे? ... और अभी तो पिछले कवि सम्मेलन में सुरा के एक गिलास के लिए तुम ने कई कवियों के कपड़े फाड़ दिए थे।...
     
बकवास बंद करो। ककवि ने मुझे झिड़क दिया, हाँ ! मुकदमे वाली बात सत्य है।  कवि के मुख पर गर्व की झलक आई, पंद्रह वर्ष मुकदमा लड़ता रहा मैं, और अंत में मकान खाली करवा कर ही दम लिया। ...! कवि ने रुक कर कहा, पर बाबर तुम्हारा किराएदार नहीं था।
     
यही तो हम भी कहते हैं। वह विदेशी विधर्मी था। उसने बलात् इस देश में घुस कर मंदिर तोड़ कर उसपर आधिपत्य स्थापित किया। किराएदार न बलात् आपके घर में घुसता है, न आपके घर को तोड़ता है। न उसपर अपना मकान बनाता है। मैंने कहा, हम आक्रांताओं का भी विरोध न करें? मैंने तो तुम्हें मुकदमा लड़ने से नहीं रोका और तुम बता रहे हो कि हिंदू धर्म लड़ना सिखाता है।
     
हाँ! लड़ना सिखाता है?
     
तुम जिस प्रकार का इंसान बनाना चाहते हो, क्या वह इंसान आत्मरक्षा नहीं करेगा? वह अपने देश और अपनी संस्कृति की रक्षा नहीं करेगा? अपने समाज और अपने धर्म की रक्षा नहीं करेगा? पाप और अधर्म से लड़ेगा नहीं?
     
उसने कोई उत्तर नहीं दिया।
     
पहले सोच लो कि जब तुम धर्म को गाली दे रहे हो, उसका तिरस्कार कर रहे हो, तो विरोध किसका कर रहे हो? और मनुष्य को ऐसा क्या सिखाना चाहते हो, जो आज तक धर्म ने नहीं सिखाया।
     
पर जब मैं इंसानियत की बात करता हूँ, तो मेरे श्रोता इतने प्रसन्न क्यों होते हैं? इतनी तालियाँ क्यों बजाते हैं? कवि रो दिया।
     
क्योंकि वे समझ नहीं रहे होते कि तुम किस का तिरस्कार कर रहे हो। मैंने कहा, न वे यह समझ रहे होते हैं कि यह आजीवन सुखभोग का स्वार्थी जीवन जीने वाला व्यक्ति धर्म का तिरस्कार करके किन महान् पुरुषों और किन महान् सिद्धांतों का तिरस्कार कर, स्वयं को उन सब से उदात्त और पवित्र बता रहा है।
     
तुम तो मेरी सारी दूकानदारी ही बंद करवा दोगे। उसने अपने आँसू पोंछ लिए और इंसानियत के गीत गाने को तैयार हो गया।  

अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें