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03.13.2014


अनबन हुई

हुस्न की घूंघट से फिर अनबन हुई
प्यास की पनघट से फिर अनबन हुई

चुप्पियों की ठन गई आवाज़ से
वीरानों की आहट से फिर अनबन हुई

जि़न्दगी की साँस उखड़ी जा रही
चैन की सुकून से अनबन हुई

घाटा लेके आ रही तिज़ारतें
ईमान की बरकत से फिर अनबन हुई

ख़्वाबों ने कर दी बग़ावत रात से
नींद की करवट से फिर अनबन हुई

आस्था शर्मिन्दगी से छिप गई
ख़ल्क की जन्नत से फिर अनबन हुई

पोथियों के वरक कश्ती बन गए
इल्म की बस्तों से फिर अनबन हुई।।


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