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03.13.2014


खुले पंख

बंधक रहे रिवाज़ों में
सकुचे रहे लिहाजों में

परदे से झाँके ज़ीनत
चांद का नूर हिजाबों में

वही रिवायत है जारी
कौमों और समाजों में

महबूबों के ख़त जैसे
दुबके रहे दराज़ों में

झीने नाज़ुक आँचल में
हया पली है नाज़ों में

मलमल बुनते रिश्तों का
मद्धम हुए उजालों में

दफ़्न ख़्वाहिशों के किस्से
शाया हुए किताबों में

मरीज़ जान के साथ गया
नाहक लुटे इलाजों में

नये ज़माने की दस्तक़
तबदीली आग़ाज़ों में

क्षितिज नापने निकले हैं
खुले पंख परवाज़ों में।।


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